आर्यावर्त के अंधेरे में लापता होता हिंदुस्तान

 

 

देवी प्रसाद मिश्र

( यह लेख प्रतिष्ठित हिंदी कवि-कथाकार, फिल्मकार व  टिप्पणीकार  देवी प्रसाद मिश्र के नवभारत टाइम्स के मुंबई संस्करण में छपने वाले स्तंभ ‘असहमत’ से साभार लिया गया  है। देवी  की लघु फिल्म  सतत 2015 में कान फिल्म फेस्टिवल के शॉर्ट फिल्म कॉर्नर में चयनित हुई थी। )

 

सलमान खान की फिल्म भारत हिंदुस्तान की आज़ादी के बाद के अतीत को एक चरित्र के माध्यम से वर्णित करने की कोशिश तो करती है लेकिन वह किसी ऐतिहासिक या सिनेमा अनुभव का हिस्सा नहीं हो पाती। फिल्म के निर्देशक अली अब्बास ज़फ़र इस चरित्र को स्वातंत्र्योत्तर भारत की यंत्रणा यात्रा का ही नही प्रेम और उम्मीद का रूपक भी बनाना चाहते हैं लेकिन न तो वह बंबइया फार्मूले की ज़द से बाहर आते हैं और न सलमान की बॉक्स ऑफिसीय माचो छवि से कोई छेड़छाड़ ही करते हैं । इसके बाद जो कलात्मक नतीजे निकलते हैं वे लोकप्रियतावाद के कोहराम में गुम हो जाते हैं । सलमान खान मनोरंजन के स्टॉक मार्केट का सबसे बड़ा ब्रांड हैं जिसमें काफी निश्चिंत होकर निवेश किया जा सकता है और लाभ कमाया जा सकता है। लेकिन लग यह भी रहा है कि सलमान खान और शाहरुख खान स्टार सिस्टम के आखिरी प्रतीक हैं। दिलचस्प यह पुनर्स्मरण भी होगा कि ये दोनों हिंदी सिनेमा में पारसी थिएटर की ड्रामाई शैली के अंतिम संवाहक भी हैं ।

अली अब्बास की फिल्म भारत में भारतीय अतीत के 70 सालों को सिनेमा में समेटने की कोशिश के संदर्भ में मुझे महान फिल्मकार बर्नार्डो बर्तोलुच्चि की फिल्म 1900 याद आई जिसका इतालवी नाम बीसवीं सदी (NOVE CENTO) था और जिसमें एक लंबे कालखंड को इसलिए समेटा गया था ताकि इतालवी इतिहास में आते बड़े ऐतिहासिक बदलावों , वैचारिक लड़ाइयों और उनके असरात को कुछ चरित्रों के ज़रिए सामने लाया जा सके। बरसों पहले 317 मिनट की इस फिल्म को देखते हुए मुझे इस फिल्म की अतिरिक्त दीर्घता का पता ही नहीं चला। यह फिल्म इस अंतर्वस्तु को रेखांकित करती थी कि विशेषाधिकारों और मेहनत के बीच होती लड़ाई जारी रहेगी। लेकिन सलमान खान और शाहरुख खान वाला खान युग सिनेमा का अनात्म युग है जहाँ प्रबंधित पटकथाओं के ज़रिए 100 करोड़ प्लस क्लब में घुस जाने की कारपोरेट तैयारी के अलावा कुछ नहीं होता।

यह काफी विडंबनामय है कि आधुनिक हिंदुस्तान के अतीत को खंगालने वाली फिल्म भारत जब अपने प्रदर्शन के आखिरी पड़ाव पर थी तो दीपा मेहता की वेब सीरीज़ लैला नेटफ्लिक्स पर शुरू हो रही थी । यह सीरीज़ उस भारत को देखने की कोशिश कर रही है जो तीस साल बाद बन रहा होगा। 2047 में यानी आज़ादी के ठीक 100 साल के बाद के भारत का पूर्वानुमान इस सीरीज़ में किया जाता है। आने वाले इस भारतवर्ष में बहुत अंधेरा है। इसमें लोकतंत्र नहीं है, उसका छल है। यहाँ कला नहीं हैं, कविता नहीं है, प्रश्न नहीं है, नियंत्रण है। यहाँ अभिव्यक्ति की आज़ादी नहीं है, मिश्रित संकर वर्ण नहीं है। यह आर्यावर्त है इसलिए यहाँ रक्त की पवित्रता के शुद्धतावादी आग्रह हैं, निगरानी है, श्रमकेंद्र है, पुरुष वर्चस्व है और विकट प्रचार तंत्र है। शुद्ध आर्य नस्ल का जो विघातक स्वप्न नात्सियों ने देखा था वह इस आर्यावर्त के केंद्र में है। इस सीरीज़ को देखते हुए काफ्काई अंधेरे की याद आती रही। याद उन हॉलीवुड फिल्मों की भी आती रही जो भविष्य में होने वाले महाविनाश का पूर्वानुमान
किया करती हैं । उन फिल्मों की संख्या सैकड़ों में हैं। लेकिन उनमें शायद ही कोई ऐसी फिल्म हो जो अपना कोई असर छोड़ती हो । यह महाविनाश बाहरी ग्रहों के आक्रमणों से हो सकता है या ऐसी सभ्यताओं से जो हमसे ज्यादा विकसित हैं। दीपा की भविष्यवादी वेब सीरीज़ में अँधेरा फैलाने वाली ताकतें किसी और ग्रह से नहीं आतीं । वे इसी भारत में पैदा हुए लोग हैं जो एक कट्टरपंथी तंत्र का निर्माण कर रहे हैं जिसमें एक ओर चेहराहीन पवित्रतावाद का परकोटा है तो दूसरी तरफ समाज के अधिसंख्य हिस्से का स्लमीकरण और निर्बुद्धिकरण ।

प्रयाग अकबर के उपन्यास जो शायद जॉर्ज ऑरवेल की किताब 1984 से प्रेरित जान पड़ता है पर आधारित इस वेब सीरीज़ में दीपा इस बात को बहुत शिद्दत से रेखांकित करती हैं कि बेहद गरीब और मज़लूम, आर्यावर्त का घनघोर विरोधी है जबकि वहाँ का मध्यवर्ग उसका हिमायती। लेकिन आर्यावर्त अगर एक शुद्धि-आधृत अभिजनवाद के निर्माण में लगा है तो ऐसे भी हैं जो इसके प्रतिकार की योजनाएँ लगातार बना रहे हैं । प्रतिरोध की उस तड़प का नाम शालिनी पाठक है जिसका किरदार हुमा कुरैशी ने बला की यातना और शिद्दत के साथ निभाया है। कहना होगा कि कलाएँ बहुत अंधेरे में भी रौशनी के उपाय खोजती और पाती रहती हैं । नेहरू और श्याम बेनेगल की भारत की खोज इसीलिए प्रासंगिक और अर्थवान है जहाँ संस्कृति के एकरूपीकरण और नियंत्रण के लिए कोई जगह नहीं थी। जिन लिबरलों को बहिष्कृत करने और उनके अवैधीकरण की जो कोशिशें हाल में हुईं वे निर्वासित लोग प्रतिरोध की कौन सी कला कब लेकर प्रकट हो जाएँगे लैला इसका मनोमय उदाहरण है ।

(सौजन्य: नवभारत टाइम्स)

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