‘सीज़न गेम’ में चूक रहे भारतीय वेब सीरीज़

(नई नई उभरी भारतीय वेब सीरीज़ की दुनिया की परख करता पारुल बुधकर का विश्लेषणात्खमक लेख। पारुल एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। पिछले दो दशकों के दौरान उन्होने कई जाने माने अखबारों और न्यूज़ चैनलों के लिए काम किया है। इस दौरान उन्होने राजनीति समेत कला-संस्कृति के तमाम पहलुओं पर रिपोर्टिंग की है।)

सेक्रेड गेम्स का सीज़न 2 आ भी गया और लोगों ने इसे नकार भी दिया। सीज़न 1 के बाद सीज़न 2 से लोगों को बहुत उम्मीदें थी लेकिन लंबे इंतज़ार के बाद जो मिला वो पसंद नहीं आया। ऐसा पहली बार नहीं हुआ। मतलब ये पहली बार नहीं है जब किसी वेब सीरीज़ के सीज़न 1 के सफल होने के बाद उसका दूसरा ही सीज़न मुंह के बल गिरा। भारत में वेब सीरीज़ का कॉन्सेप्ट नया है और इससे जुड़े लोग अभी सीखने की प्रक्रिया में हैं, इसलिए गलतियां तो होंगी। लेकिन ‘इंस्टैंट कंटेंट’ के इस दौर में दर्शकों की उम्मीदें अगर ज्यादा हैं तो उनका क्या कसूर! हां सवाल उन पर ज़रुर उठेंगे जो इन उम्मीदों का फायदा उठाने की होड़ में हैं।

भारत में पहली वेब सीरीज़ द वायरल फीवर (TVF) ने 2014 में ‘परमानेंट रुममेट्स’ के नाम से बनाया। ये सीरीज़ सुपरहिट रही। यूथ ने इसे हाथों-हाथ लिया और TVF भी चमक गया। इस वेब सीरीज़ का टारगेट ऑडियंस वो युवा थे जो अपने मां-बाप ही नहीं बल्कि बड़े भाई-बहनों से भी ‘जनरेशन गैप’ की जंग लड़ रहे थे। उनके लिए गाली देना, गर्लफ्रेंड-बॉयफ्रेंड को घर में लाना, लिव-इन रिलेशनशिप रखना और बिना लिंग भेद यानि लड़का-लड़की देखे बिना नज़दीकी दोस्त बनाना चलन नहीं जीने का तरीका था। इन युवाओं के पास कंटेंट देखने की सुविधा तो आसानी से थी लेकिन अपनी पंसद का कंटेंट नहीं था। टीवी पर सास बहू साजिश से भरे या सूरज बड़जात्या टाइप फिल्मों पर आधारित सीरियलों का बोलबाला था। फिल्मों में भी ‘दिल चाहता है’ के बाद ऐसी कोई फिल्म नहीं आई जिसने कंटेंट, ट्रीटमेंट और भाषा सभी स्तर पर अपने दौर के युवाओं की ज़िंदगी को छुआ हो। ऐसे में ‘परमानेंट रुममेट्स’ ने न सिर्फ उनकी ज़िंदगी की जद्दोजहद को पेश किया बल्कि भाषा, भावनाओं और भेष में भी इन युवाओं को एकदम सटीक तरीके से स्क्रीन पर ज़िंदा कर दिया। इसके अगले साल ही TVF एक और वेब सीरीज़ लेकर आया- ‘द पिचर’, करियर को लेकर संघर्ष कर रहे युवाओं को इस सीरीज़ में भी बहुत सलीके से पेश किया गया। हर नौजवान को ये अपनी ही कहानी लगी। इसके बाद TVF  को युवाओं की नब्ज़ पकड़ने में देर नहीं लगी। युवाओं की ही इस छोटी सी कंपनी को ये समझ में आ गया कि अगर मोबाइल हाथ में लिए लड़के लड़कियों के दिल में बसना है तो रास्ता ऐसे ही कंटेंट से जाता है। इंटरनेट पर सेंसरशिप के ना होने ने ये रास्ता और आसान कर दिया। बात-बात पर गाली देने वाली यंग जनरेशन के लिए ये ‘कूल लैंग्वेज’ किसी की बेइज्जती का जरिया नहीं बल्कि अपनी बात दिल से ज़ाहिर करने का तरीका था और टीवी सीरियल, फिल्मों से उलट वेब सीरीज़ में ये दिखाना बेहद आसान था। कोई सेंसर तो इन सीरीज़ पर आज भी नहीं है इसलिए भाषा की मर्यादा इनकी अपनी है जिसकी कोई सीमा है ही नहीं। अगर ये कहा जाए कि स्क्रीन पर वही दिखता है जो कमोबेश असल में होता है तो गलत नहीं होगा। ये अलग बात है कि आज लगभग सभी वेबसीरीज़ के लिए ‘गालीगलौज वाली भाषा’ कंटेंट का बुनियादी व्याकरण बन गई लगती है।

बहरहाल, जब सब कुछ ठीक हो रहा है तो क्या वजह है कि सुपरलाइक किए जाने वाली इन वेब सीरीज़ के दूसरे सीज़न धड़ाम हो रहे हैं? लोगों को जिस बेसब्री से दूसरे सीज़न का इंतज़ार रहता है उतनी ही तेजी से उन उम्मीदों पर पानी फिर जाता है। चलिए थोड़ा रिवाइंड करके देखते हैं।

‘परमानेंट रुममेट्स’ का सीज़न-1 29 अक्टूबर 2014 को आया था। इसके बाद सीज़न-2 इसके करीब डेढ़ साल बाद यानि 14 फरवरी 2016 को आया। TVF की ही दूसरी हिट वेब सीरीज़ ‘ट्रिपलिंग’ का सीज़न-1 28 अगस्त 2016 को आया था जबकि सीज़न-2 इसके तीन साल बाद 5 अप्रैल 2019 को रिलीज़ हुआ। ‘सेक्रेड गेम्स’ का सीज़न-1 28 जून 2018 को आया था जबकि सीज़न-2 हाल ही में 15 अगस्त 2019 को रिलीज़ हुआ है। अमेज़न प्राइम की वेब सीरीज़ ‘मिर्जापुर’ की पहली सीरीज़ 16 नवंबर 2018 को आई थी और इसके दूसरे सीज़न की घोषणा हाल ही में हुई जो 2020 में रिलीज़ होगा। डाइस मीडिया की वेब सीरीज़ ‘द लिटिल थिंग्स’ का पहला सीज़न अक्टूबर 2016 में आया। लिव-इन में रह रहे एक कपल की ये कहानी लोगों ने इतनी पसंद की कि Netflix ने डाइस मीडिया से इसके दूसरे सीज़न के अधिकार खरीद लिए और अक्टूबर 2018 यानि ठीक दो साल बाद Netflix पर इसका दूसरा रिलीज़ किया गया।

यानि हर वेब सीरीज़ के दूसरे सीज़न ने आने में हमेशा देर की है। डेढ़ से दो या तीन साल का समय दूसरे सीज़न को आने में लगा है। ये बहुत लंबा वक्त है किसी कहानी को लेकर दर्शकों की उत्सुकता बनाए रखने के लिए। तो जब तक दूसरा सीज़न रिलीज़ होता है दर्शकों की दिलचस्पी लगभग खत्म हो चुकी होती है या खत्म होने की कगार पर होती है। इसके बाद पहले सीज़न के बाद जो उम्मीदें दर्शकों को मिलती हैं वो दूसरे सीज़न पर खरी नहीं उतरती। वेब सीरीज़ में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ कंटेंट ही होता है यानि कहानी और उसे पेश करने का तरीका। अगर हम हर वेब सीरीज़ के पहले और दूसरे सीज़न का आंकलन करें तो पाएंगे कि पहले सीज़न की कहानी जहां बेहद सुलझी, कसी हुई और दिलचस्प होती थी किसी भी वेब सीरीज़ के दूसरे सीज़न में वो बात आ ही नहीं पाई। ऐसा लगा कि पहला हिट होने के बाद उसी को भुनाने के चक्कर में दूसरा सीज़न भी बस बना दिया गया।

बॉलीवुड होता तो शायद अक्षय कुमार या किसी खान का सहारा देकर फिल्म हिट करवाई जा सकती थी। या टीवी भी होता तो भी सुपरहिट टीवी एक्टर्स का सहारा कहानी को मिल जाता। लेकिन इंटरनेट पर मामला फिल्मों से थोड़ा अलग है। यहां अगर कंटेंट कमज़ोर हुआ तो लुटिया डूबनी तय है और यही इन सभी वेब सीरीज़ के दूसरे सीज़न के साथ हुआ। इसीलिए सैफ़ अली खान की स्टार वैल्यू के साथ साथ इन दिनों अपना लोहा मनवा रहे नवाजुद्दीन सिद्दिकी और आजकल के बेहद चर्चित और टैलेंटेड पंकज त्रिपाठी की बेहतरीन एक्टिंग भी सेक्रेड गेम्स-2 में वो बात नहीं पैदा कर पाई।

अब मन में ये सवाल उठना भी लाज़िमी है कि जब पहले सीज़न के हर एपिसोड में एक कसे हुए प्लॉट पर कहानी पेश की गई तो ऐसा क्या हुआ कि दूसरे सीज़न के एपिसोड्स में वो बात नहीं आ पाई? दरअसल इन सीरीज़ की शुरूआत कुछ मुट्ठी भर युवाओं ने यूट्यूब से की। किसी ने भी बहुत दूर की नहीं सोची। कंटेंट देखकर पता लगता है कि किसी ने भी पहली वेब सीरीज़ बनाते हुए ये नहीं सोचा होगा कि इसको आगे बढ़ाएंगे और दूसरा सीज़न भी लाएंगे। लेकिन सीरीज़ हिट हो गई तो दर्शकों में डिमांड बढ़ी और निर्माताओं को लगा कि अब फायदा हो सकता है। लेकिन पहले से कोई तैयारी न होने की वजह से सबसे पहली देर तो दूसरा सीज़न रिलीज़ करने में हुई और फिर कहानी, स्क्रीन प्ले, एक्टिंग, स्टार कास्ट पर भी शायद ज्यादा मेहनत नहीं की गई।

जैसे ‘परमानेंट रुममेट्स’ के पहले सीज़न में एक यंग कपल के प्यार मोहब्बत, लिव-इन की कहानी को दिखाया गया लेकिन दूसरा सीज़न प्रेगनेंसी की मुश्किल, शादी की तैयारी और परिवारों की सोच में खत्म कर दिया। यानि पहला सीज़न जहां सीधे तौर पर यंग कपल की जिंदगी से जुड़ा था दूसरे में शायद ज्यादा दर्शकों तक पहुंचने के चक्कर में युवा जोड़े को किनारे ही कर दिया गया। इसी तरह ‘ट्रिपलिंग’ में तीन बहन भाइयों की कहानी है..पहले में जहां इन तीनों के रिश्ते को डिफाइन किया गया वहीं दूसरे सीज़न में दुनिया भर के कैरेक्टर उसमें डालकर पूरी कहानी बहन के पति को ढूंढने में निकाल दी। शायद पहले एपिसोड्स बनाते वक्त ही उसकी आगे की कहानी के बारे में भी सोच लिया जाता तो ये गलती न होती। लोगों के पास कंटेंट की कमी नहीं है इसलिए नकारने में वक्त भी नहीं लगता।

हालांकि अब वेब सीरीज़ इंडस्ट्री काफी बड़ी हो गई है और कोई भी ओटीटी प्लैटफॉर्म जब किसी वेब सीरीज़ के लिए प्रपोज़ल लाने वाले प्रोड्यूसर से कम से कम 3 सीज़न की थीम और प्लान, ट्रीटमेंट भी साथ में मांगता है। ये अलग बात है कि दूसरे, तीसरे सीज़न का प्रोडक्शन और उस पर काम तभी शुरु होता है, जब पहले सीज़न का नतीजा साफ़ हो जाता है। लेकिन ये तय है कि आगे के सीज़न की वैसी तैयारी नहीं होती। इसीलिए दूसरा सीज़न आने में टाइम भी लगता है और पहले सीज़न वाली क्वालिटी की गारंटी भी नहीं रहती। और जैसा कि कहा गया कि वेब सीरीज़ के लिए सबसे बड़ा पैमाना कंटेंट है, सो कंटेंट, कसावट और नयापन नहीं होने पर ये धड़ाम हो जाता है।

भारत में तो ये सीज़न दर सीज़न का सिलसिला इंटरनेट कंटेंट से ही शुरू हुआ है। टीवी सीरियल दस साल भले ही चल जाएं लेकिन उनमें कभी ब्रेक नहीं आता था। अब कुछ टीवी धारावाहिक भी ‘सीज़न’ प्रक्रिया से जरूर गुज़र रहे हैं जिसकी शुरूआत ‘24’ से 2013 में हुई थी। लेकिन विदेशों में ये चलन काफी पुराना है। अमेरिका में टीवी सीरियल ही सीज़न के तौर पर आते रहे हैं। वहां ये सिलसिला 2000 के बाद ही शुरू हो गया था। इनमें से कई बेहद कामयाब रहे हैं और इसी का नतीजा है कि इनमें से ज्यादातर सीरियल अब वेब सीरीज़ की शक्ल में इंटरनेट पर भी मौजूद हैं। लेकिन इसके पीछे उनकी प्लानिंग और तैयारी को लेकर प्रोफेशनल अंदाज़ एक बड़ी वजह है। एचबीओ का मशहूर टीवी सीरियल ‘गेम ऑफ़ थ्रोन्स’ इसका सबसे सटीक उदाहरण है। 2011 में शुरु हुए इस सीरियल के भारत समेत दुनिया भर में लोग दीवाने हैं। हाल ही में आए इसके सीज़न 8 ने भी पहले की तरह ज़बरदस्त कामयाबी हासिल की है।

इसी तरह अमेरिका के सबसे ज्यादा लोकप्रिय धारावारिकों में से एक ‘ग्रे’ज़ एनाटॉमी’ भी है, जिसकी शुरूआत मार्च 2005 में हुई थी। आज तक इसके 15 सीज़न आ चुके हैं। पंद्रहवा सीज़न तो हाल ही में रिलीज़ हुआ है। यानि 14 साल में 15 सीज़न। औसतन हर साल इसका नया सीज़न रिलीज़ किया गया। इसी तरह एक दूसरा लोकप्रिय सीरियल ‘डेस्परेट हाउवाइव्स’ का पहला सीज़न अक्टूबर 2004 में आया था और 2012 तक इसके 8 सीज़न प्रसारित हुए। यानि ये भी हर साल नया सीज़न। अक्टूबर 2012 में रिलीज़ हुए ‘द अफेयर’ के तो दो ही साल में पांच सीज़न रिलीज़ किए गए। यानि पहली बात तो ये कि वहां किसी भी कहानी को लंबे समय तक दिखाना नई बात नहीं है। कहानी में नयापन कैसे लाया जाता है ये भी शायद वहां के निर्माताओं को अच्छी तरह पता है। यही वजह है कि वहां की वेब सीरीज़ भी दूसरे ही सीज़न में ढेर नहीं होती। अमेरिकन वेब सीरीज़ ‘हाउस ऑफ कार्ड्स’ के 6, ‘हेमलॉक ग्रोव’ के 3, ‘ऑरेंज इज़ द न्यू ब्लैक’ के 7, ‘मार्को पोलो’, ‘ब्लडलाइन’, ‘सेंस 8’, ‘नार्कोज़’, ‘द क्राउन’ आदि के दो या तीन सीज़न आ चुके हैं और इनमें से ज्यादातर सीरीज़ लोग पसंद भी कर रहे हैं। एक और बड़ा अंतर जो भारत की और दूसरे देशों की वेब सीरीज़ में है वो है सब्जेक्ट का। हमारे यहां अब भी ये परिवार और निजी संबंधों के दायरे से बाहर जाने का रिस्क मेकर्स नहीं उठा पाते जबकि अगर अमेरिका की ही वेब सीरीज़ को देख लें तो उनके पास सब्जेक्ट्स की भरमार है। क्राइम, थ्रिलर, लव, टीनएज, मेडिकल जैसे कितने ही सब्जेक्ट प्रभावशाली ढंग से उनकी सीरीज़ में पेश किए गए हैं।

फिलहाल तो हम उम्मीद ही कर सकते हैं कि वेबसीरीज़ में अच्छा और बेहतर कंटेंट मिले जो लंबे समय तक याद भी रखा जाए और जिससे लंबे समय तक ऐसी उम्मीदें भी बांधी जा सके जिन पर पानी न फिरे। उम्मीद ये भी करें कि वेब सीरीज़ फिल्म और टीवी की सीमाओं से परे जाकर अपनी नई ज़मीन की भी तलाश करे और कंटेंट या ट्रीटमेंट को लेकर उस भेड़चाल का शिकार न हो जो बॉलीवुड को हमेशा से नुकसान पहुंचाता रहा है।

  • पारुल बुधकर

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