‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ दोबारा…

ब्रिटेन के प्रतिष्ठित अखबार The Guardian ने 21वीं सदी की 100 सर्वश्रेष्ठ फ़िल्मों की लिस्ट जारी की है। दुनिया भर की फ़िल्मों को लेकर बनाई गई इस लिस्ट में भारत से सिर्फ़ अनुराग कश्यप की ‘गैंग्स ऑफ़ वासेपुर’ को शामिल किया गया है। इस फ़िल्म के दोनों भाग 2012 में रिलीज़ किए गए थे और बॉक्स ऑफिस सफलता के साथ साथ इसने दर्शकों और समीक्षकों को भी काफी प्रभावित किया था। न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन उस वक्त एक ऑनलाइन प्लैटफॉर्म के तौर पर सक्रिय था और तब हमने ‘बदले की आग और तलछट का कोरस‘ शीर्षक से गैंग्स ऑफ वासेपुर पर अमिताभ श्रीवास्तव (वरिष्ठ पत्रकार और NDFF के वर्तमान अध्यक्ष) की 24 जून 2012 को लिखी एक विस्तृत समीक्षा भी प्रकाशित की थी।  प्रस्तुत है पूरा आलेख।

ज़िन्दगी में चाँद, रोटी, नींद, लोरी की चाहत और उसके लिए जद्दोजहद; सीप का सपना और सिसकी की मजबूरियां और इन सब पर भारी गोलियों की गूँज यानी गैंग्स ऑफ़ वासेपुर. …ये समाज की तलछट के कोरस की कहानी है . वैसे कहानी की ज़मीन बिहार (अब झारखण्ड) है लेकिन ये कहीं की भी हो सकती थी . और क्या ज़बरदस्त अंदाज़े बयां है इस दास्तान का. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में नत्थी है एक समाज , एक कौम , एक राज्य , एक उद्योग और इन सब से बढ़कर इंसानी फितरत के बहुरुपियेपन की तस्वीरें-जिसमे बदला है, नफरत है ,मोहब्बत है, कमीनगी है और कामुकता भी है, रिश्तों में ठगे जाने का दर्द है और कहीं न कहीं खालीपन की छटपटाहट भी.

अनुराग ने फिर कमाल कर दिखाया है. हालाँकि गैंग्स ऑफ़ वासेपुर का कथानक और ट्रीटमेंट कहीं कहीं Godfather की याद भी दिलाता है. Sergio leone और Quentin Tarantino की शैली की झलक भी है. बुनियादी कहानी तो निजी दुश्मनी की है लेकिन उसके इर्द गिर्द बुना गया ताना बाना कोयला खदानों से शुरू होकर राजनीति के अपराधीकरण के रास्ते से मामूली लोगों के माफिया बनने की प्रक्रिया को उघाड़ता है.

मनोज बाजपेयी ने अपने पुराने दमदार अभिनय के दिनों की याद ताज़ा कर दी है- सत्या, शूल और पिंजर वाले मनोज यहाँ मौजूद हैं सरदार खान की खाल में. एक ऐसा किरदार जो अपने बाप की धोखे से हुई हत्या का बदला लेने के लिए किस तरह कमीनेपन और कुटिलता का सहारा लेकर अपने दुश्मन की नाक में दम किये रहता है. मनोज ने ज़बरदस्त काम किया है- सरदार खान की कामुकता को उजागर करने वाले द्रश्यों में तो वो ग़ज़ब हैं. पता नहीं क्यों मुझे सरदार खान की ठसक को देखते हुए कहीं कहीं आधा गाँव के फुन्नन मियां याद आ गए.

हालांकि गैंग्स ऑफ़ वासेपुर अकेले मनोज बाजपेयी की फिल्म नहीं है. निर्देशक के तौर पर अनुराग की कामयाबी ये भी है कि उन्होंने हर किरदार के लिए ठोंक पीट कर एक्टर चुने और उनसे बेहतरीन काम लिया है .शाहिद खान बने जयदीप अहलावत ने बहुत शानदार काम किया है, सुल्तान के किरदार में पंकज त्रिपाठी खूब जमे हैं. अग्निपथ में उनका हकलाते हुए कांचा भाऊ कहना नोटिस किया गया था और अब कुरेशियों और पठानों की खानदानी दुश्मनी की आग में जलता सुल्तान भी भूलने वाला किरदार नहीं है. पियूष मिश्रा ने एक्टिंग तो ज़ोरदार की ही है (इसमें नया क्या है, वो एक बेहतरीन कलाकार हैं जिनको बहुत पहले नोटिस किया जाना चाहिए था ) गाना भी बहुत अच्छा गाया है.

लेकिन जिन लोगों ने चौंकाया है वो हैं- तिग्मांशु धूलिया, ऋचा चड्ढा और नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी. बेहद कुटिल क्रूर ठेकेदार और शातिर नेता के रोल में तिग्मांशु ने बहुत सधा हुआ अभिनय किया है. अगर वो फेंटा कस कर एक्टिंग के मैदान में उतर आये तो अच्छे अच्छे खलीफाओं की छुट्टी कर सकते हैं ये उन्होंने इस फिल्म में दिखा दिया है. सरदार खान की बीवी नगमा के रोल में ऋचा चड्ढा ने शबाना और स्मिता की झलक दिखाई है.अनुराग ने देव डी में माही गिल को पेश किया था, अब ऋचा भी उनकी ही खोज हैं.

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को इस साल का सितारा कहा जा रहा है. कहानी की शोहरत के बाद अब वासेपुर की बदौलत वो हाल ही में कान फिल्म फेस्टिवल तक हो आये हैं. फैज़ल का किरदार इस फिल्म का एक मुश्किल किरदार है- बचपन में बाप को अपने घर पर अपनी माँ के साथ देखने के बजाय दूसरी औरत के साथ देखना, माँ की एक रात की कमजोरी का उसकी पूरी शख्सियत पर डंक मार जाना और उपेक्षा के साये में पलते हुए बड़े होना- इन गुत्थियों को ज़ाहिर करने में नवाज़ ने कमाल किया है. खास तौर पर त्रिशूल फिल्म के सीन के बाद सिनेमा हाल से निकलते हुए कमेन्ट और एक्सप्रेशन ज़बरदस्त है. मिथुन चक्रवर्ती के डांस की तो उन्होंने ग़ज़ब नक़ल की है. हुमा कुरैशी के साथ उनका रोमांस का ट्रैक दिलचस्प है और अगले पार्ट में वो कुछ धमाल करेंगे ऐसा लगता है.

स्नेहा खानविलकर ने क्या म्यूजिक दिया है. वुमनिया बड़ा दिलचस्प गाना है लेकिन मेरा फैवरिट है पियूष मिश्रा का गाया -एक बगल में चाँद होगा एक बगल में रोटियां. यशपाल शर्मा पर फिल्माया गया सलामे इश्क मज़ेदार है .

काफी पहले राजेंद्र यादव ने एक लेख लिखा था- गाली मत दो गोली मार दो – वासेपुर में लोग गाली भी खूब देते हैं और गोली भी खूब मारते हैं. मैं जिस हाल में फिल्म देखने गया था वहां अपने गाली भरे गानों के लिए युवा दिलों की धड़कन बन चुके पॉप सिंगर हनी सिंह भी पहुंचे थे. शायद फिल्म में धड़ल्ले से इस्तेमाल की गयी गालियों से उन्हें कुछ और जोशीले गाली वाले गाने बनाने की प्रेरणा मिले.

चूँकि फिल्म दो हिस्सों में बनायीं गयी है इसलिए कई लोगों को पहला पार्ट थोडा भटका हुआ या झूलता हुआ भी लग सकता है . ढाई घंटे से थोडा ऊपर की फिल्म ख़त्म हो गयी तो लगा कहानी जारी रहनी चाहिए थी. सीक्वेल की इतनी तत्काल तलब शायद ही कभी लगी हो .

(24 जून 2012)

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