ग्रहण: ‘चौरासी’ के ज़रिए नफरत की राजनीति पर टिप्पणी

Amitaabh Srivastava

डिज़्नी-हॉटस्टार पर रिलीज़ नई वेब सीरीज़ ग्रहण इसलिए चर्चित हो रही है क्योंकि ये नई हिंदी के युवा उपन्यासकार सत्या व्यास के चर्चित उपन्यास चौरासी पर आधारित है। कितना दम है इस सीरीज़ में बता रहे हैं अमिताभ श्रीवास्तव अपनी समीक्षा में। अमिताभ श्रीवास्तव वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक, इंडिया टीवी जैसे न्यूज़ चैनलों से बतौर वरिष्ठ कार्यकारी संपादक जुड़े रहे हैं। फिल्मों के गहरे जानकार और फिल्म समीक्षक के तौर पर ख्यात हैं। न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन से बतौर अध्यक्ष जुड़े हुए हैं। 

अस्सी के दशक में पंजाब में हिंसा की घटनाओं  और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि पर बनी वेब सीरीज़ ‘ग्रहण’ मुख्य रूप से नफ़रत की राजनीति और सांप्रदायिक हिंसा के बीच एक सिख लड़की और हिंदू लड़के की प्रेमकहानी के त्रासद अंत के बारे में है।  डिज़्नी-हाॅटस्टार पर शुरू हुई आठ क़िस्तों की यह सीरीज़ सत्य व्यास के ‘चौरासी’ नाम के उपन्यास पर आधारित बताई गई है। जगह है तत्कालीन बिहार और आज के झारखंड का राँची और बोकारो। कहानी के कालखंड का विस्तार 1984 से वर्तमान समय तक दिखाया गया है। संदेश सांप्रदायिक राजनीति के ख़िलाफ़ है जो इसे वर्तमान संदर्भों से जोड़ता है। सिख विरोधी हिंसा पर सिनेमा में कोंकना सेन शर्मा की फ़िल्म अमू के अलावा कुछ ख़ास गंभीर काम हुआ नहीं है।  

सीरीज़ की शुरुआत अच्छी है। चुस्त, कसी पटकथा, तेज़ी से घटती घटनाएँ और कलाकारों का अभिनय बाँधे रहता है। । अमृता एक तेज़तर्रार, कर्तव्यनिष्ठ , क़ाबिल , ईमानदार और स्वाभिमानी सिख आईपीएस अफ़सर है। सरकारी नौकरी के बावजूद अपने अफ़सरों से सवाल करने में भी नहीं हिचकती । घर पर सिर्फ़ पिता हैं। एक प्रेमी है जो कनाडा में रहता है। अमृता से मिलने हिंदुस्तान आता है लेकिन पुलिस की नौकरी के चलते वह उसे समय नहीं दे पाती। दोनों के बेहद अंतरंग क्षणों के बीच भी फ़ोन की घंटी बजती है और अमृता को सब छोड़कर मौका ए वारदात पर जाना पड़ता है। एक पत्रकार की मौत की गुत्थी सुलझाने के बीच ही राज्य के मुख्यमंत्री चुनावी माहौल में फिर से सिख विरोधी दंगों की जाँच शुरू करवा देते हैं।

जाँच के दौरान अमृता को अपने पिता गुरुसेवक के अतीत के बारे में ऐसी बातें पता चलती हैं जिनसे उसकी नींद उड़ जाती है। वर्तमान में सिख बुज़ुर्ग गुरुसेवक अतीत में ऋषि रंजन नाम का हिंदू नौजवान था जो बोकारो में दंगों और हिंसा में सक्रिय था। शहर की फैक्ट्री का यूनियन लीडर चुन्नू उर्फ़ संजय सिंह शहर में सिखों के बसने  से ख़ुश नहीं है और साथी मज़दूरों में, शहर के लोगों में सांप्रदायिक भावनाएँ भड़काता रहता है। ऋषि को अपने सिख मकानमालिक की बेटी मनजीत उर्फ़ मनु से प्यार हो जाता है। दोनों भागकर शादी करने वाले होते हैं लेकिन इस बीच दंगे शुरू हो जाते हैं। ऋषि और मनु की प्रेमकहानी के बीच सांप्रदायिक नफरत आ जाती है।

कहानी वर्तमान और फ़्लैशबैक में आवाजाही करती रहती है। कल का यूनियन लीडर चुन्नू आज विपक्ष का नेता बन चुका है। कभी वह वर्तमान मुख्यमंत्री का प्यादा था लेकिन आज वह सियासत की शतरंज में उसे पीटकर ख़ुद वज़ीर बनना चाहता है। सांप्रदायिक नफ़रत ही उसकी राजनीति का केंद्रीय तत्व है। उसकी सोच साफ़ है- या तो हमारे साथ हो या हमारे ख़िलाफ़। यह कहीं न कहीं आज की राजनीति पर टिप्पणी भी है। 

सीरीज़ का एक पात्र कहता है- चाहे कोई भी हिंसा हो, दंगे हों, बलात्कार हो, जनसंहार हो,उसकी वजह सिर्फ़ यही है- किसी का अहंकार। 

अमृता अपने पिता के दंगाई अतीत के बारे में जानकर परेशान है, शर्मिंदा भी और नाराज़ भी। अपने साथी पुलिस अधिकारी से भी वह यह बातें छुपाती है। ख़ुलासा होने पर उसकी नौकरी पर बन आती है। उसका अधिकारी उसे सस्पेंड कर देता है। बेटी की इज़्ज़त बचाने के लिए गुरुसेवक दंगों का इल्ज़ाम अपने सिर लेकर ख़ुद को पुलिस के हवाले कर देता है। उस पर मुकदमा चलता है। अब कनाडा जा बसी उसकी प्रेमिका मनु अदालत में आकर खुलासे करती है जिनसे गुरुसेवक उर्फ़ ऋषि की दंगों में सक्रियता के राज से पर्दा हटता है। अमृता को भी अपनी पहचान का पता चलता है। 

उपन्यास पढ़ा नहीं है इसलिए मूल कथ्य के बारे में कहना संभव नहीं है लेकिन सीरीज़ अच्छी शुरुआत के बाद लड़खड़ा गई है। स्क्रिप्ट और निर्देशन की कसावट ढीली पड़ गई है।   कुछ सवालों के जवाब अंत तक नहीं मिलते। हिंदू ऋषि के लिए सिख गुरुसेवक बनने की क्या मजबूरी थी जबकि वह अकेले ही बच्ची को पाल रहा था । अगर मनु और ऋषि में इतना प्यार था कि ऋषि दंगों में मनु के बलात्कार से पैदा हुई बच्ची को मोगा से लाकर पालने के लिए तैयार हो गया था, तो दोनों साथ क्यों नहीं रह पाये । ऋषि के साथ घर से भागने को तैयार मनु उसे छोड़कर कनाडा क्यों चली गई । जो दो हत्यारे शुरू से दिखाये गये हैं, उनके पीछे कौन है- मुख्यमंत्री या संजय सिंह? 

कलाकारों का काम अपनी जगह दुरुस्त है। गुरुसेवक की केंद्रीय भूमिका में पवन मल्होत्रा ने इस वेब सीरीज़ को गरिमा प्रदान की है। अपराध बोध, घुटन, मन की उमड़-घुमड़ को उन्होंने संवादों से ज़्यादा चेहरे के हावभाव से बहुत शानदार तरीक़े से व्यक्त किया है। युवा ऋषि रंजन के किरदार में अंशुमान पुष्कर का काम भी बढ़िया है।काठमांडू कनेक्शन में उन्हें देखकर कोफ्त हुई थी। यहाँ  अस्सी के दशक में लोकप्रिय अमिताभ बच्चन की तरह हेयरस्टाइल के साथ झेंपू प्रेमी की भूमिका में जमे हैं लेकिन चुलबुली युवा सिख युवती मनु के किरदार में वामिका गब्बी भारी पड़ी हैं। बहुत बढ़िया काम किया है उन्होंने। वामिक़ा पंजाबी फ़िल्मों और दक्षिण भारतीय सिनेमा में सक्रिय हैं। अमृता की भूमिका इस सीरीज़ की बहुत अहम भूमिका थी लेकिन अफ़सोस , उसे सबसे कमज़ोर लिखा गया है। इसके बावजूद ज़ोया हुसैन ने किरदार के अंतर्द्वंद्वों को अपनी तरफ़ से अच्छी तरह दर्शाया है। मुक्काबाज़ के बाद यह उनका दूसरा बड़ा काम है ।  हाल ही में आई फिल्म शेरनी में पूर्व विधायक पीके बने सत्यकाम आनंद यहाँ सियासी पैंतरे चलने वाले मुख्यमंत्री की भूमिका में हैं और संजय सिंह के किरदार में है टीकम जोशी । दोनों का अभिनय अच्छा है।  अमृता के सहयोगी दलित पुलिस अधिकारी विकास मंडल के किरदार में सहीदुर रहमान का काम विशेष उल्लेखनीय है। वरुन ग्रोवर के गाने और अमित त्रिवेदी का संगीत बहुत अच्छा है। कैमरे का कमाल भी क़ाबिले तारीफ़ है। स्टील के गिलास में चाय, टेप रिकाॅर्डर, पुराने स्कूटर, एंबेसडर, फ़िएट गाड़ियाँ, पुरानी तरह की नंबर प्लेट, काॅलेज और फैक्ट्री के परिचय पत्र वग़ैरह देखकर लगता है  कि निर्माता- निर्देशक ने उस दौर के माहौल को, परिवेश को , निम्न मध्यवर्गीय रहन-सहन को दिखाने के लिए  मेहनत की है। 

अगर यह कहानी तीन घंटे की चुस्त फिल्म में समेटने की कोशिश होती तो शायद बहुत असरदार होती , लंबे समय तक याद रखने लायक। ग्रहण की जगह नाम गुनहगार रखते तो भी चलता। 

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