
सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कला, व्यवसाय और दर्शक संवेदना का संगम है। NDFF के ‘Talk Cinema On The Floor’ के फरवरी अध्याय में इसी व्यापक दृष्टि पर गंभीर संवाद हुआ, जहाँ फिल्म व्यवसाय, ऑडियंस रिसेप्शन और बदलते थिएटर मॉडल पर गहन चर्चा की गई। विशेष ऑनलाइन अतिथि उत्पल आचार्य ने मल्टीप्लेक्स की प्राइसिंग से लेकर उभरते मिनिप्लेक्स मॉडल तक पर बेबाक विचार रखे, जबकि अन्य वक्ताओं ने सिनेमा की रचनात्मक और बौद्धिक परतों को विस्तार से समझाया।

सिनेमा के प्रति दर्शकों के बदलते रुझान और ओटीटी युग की चुनौतियों के बीच मल्टीप्लेक्स मॉडल को नए सिरे से सोचने की ज़रूरत है। “मल्टीप्लेक्स का लोकतांत्रीकरण करना पड़ेगा, कीमतें घटानी पड़ेंगी,” यह कहना है जाने-माने मीडियाप्रन्योर और Content Engineers के CEO उत्पल आचार्य का। वे न्यू दिल्ली फिल्म फाउंडेशन (NDFF) द्वारा आयोजित मासिक संवाद श्रृंखला Talk Cinema On The Floor (TCOTF) के फरवरी चैप्टर में मुंबई से विशेष अतिथि के रूप में ऑनलाइन शामिल हुए।
हर महीने श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी (SACAC) के साथ संयुक्त रुप से आयोजित होने वाले इस कार्यक्रम की यात्रा पिछले साल जून के महीने में शुरु हुई थी। IICS और MESC जैसी संस्थाओं के सहयोग से आयोजित होने वाले इस इंटरैक्टिव आयोजन का सातवां संस्करण का ‘फरवरी चैप्टर’ के नाम से सफलतापूर्वक आयोजन किया गया। 22 फरवरी को दिल्ली स्थित श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी में आयोजित यह सत्र सिनेमा को कला, व्यवसाय और दर्शक अनुभव—तीनों दृष्टियों से समझने का एक इंटरैक्टिव मंच बना। कार्यक्रम की शुरुआत NDFF के संस्थापक आशीष के. सिंह ने की। उन्होंने TCOTF की यात्रा और उद्देश्य को रेखांकित करते हुए कहा कि यह मंच सिनेमा पर गंभीर और सार्थक संवाद को निरंतर आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति के रूप में भी समझना आवश्यक है।
हर बार सिनेमा से जुड़े नए एक्सपर्ट और अनुभवी पेशेवर कलाकार-टेक्नीशियन, नए विचार और नई ऊर्जा को एक मंच पर लाने वाला यह आयोजन राजधानी में एक अनूठा community-driven cinema space बन चुका है। जून में शुरू हुई NDFF की इस पहल का उद्देश्य दिल्ली-NCR में एक गंभीर, संवेदनशील और जीवंत रचनात्मक समुदाय तैयार करना है—जहाँ फिल्मकार, लेखक, तकनीशियन, छात्र, क्रिएटिव प्रोफेशनल्स और सिने-प्रेमी एक साथ मिलकर सीख सकें, सहयोग कर सकें और अपनी रचनात्मकता को आगे बढ़ा सकें।

My Journey: दिल्ली के फिल्मकार का सफ़र
फरवरी चैप्टर के साथ ही टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के आयोजन में इस बार से “My Journey” नाम से एक नया सेगमेंट शुरू किया गया, जिसमें दिल्ली के फिल्मकार अपनी रचनात्मक यात्रा साझा करते हैं। इसका मकसद उनकी यात्रा,उनकी आपबीती और उनके संघर्ष के ज़रिए नए और नवोदित फिल्मकारों को प्रेरित करना और ज़मीनी हकीकत से रू-ब-रू कराना है। फरवरी चैप्टर में फिल्मकार इरशाद दिल्लीवाला ने अपनी यात्रा का अनुभव साझा किया। उन्होंने बताया कि मेरठ में किताबों के कवर डिज़ाइनर के रूप में शुरुआत करने से लेकर फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे तक पहुंचने का सफर कैसे तय हुआ। इस अवसर पर उनकी नई फिल्म “Graduate Farzana” का ट्रेलर भी प्रदर्शित किया गया, जिसे दर्शकों ने सराहा। उन्होंने फिल्म निर्माण की प्रक्रिया और आजकल आयोजित हो रहे विभिन्न फिल्म फेस्टिवल्स की वास्तविकताओं पर भीअपने अनुभवों के ज़रिए रोशनी डाली और कुछ चौंकाने वाली हकीकत साझा की। इस मौके पर उनकी फिल्म “Graduate Farzana” के एक्ज़ीक्यूटिव प्रोड्यूसर हरीश शर्मा भी मौजूद रहे।


भारतीय सिनेमा और दर्शक की नज़र
कार्यक्रम की दूसरी अतिथि वक्ता पुणे से आईं फिल्म स्कॉलर विभा झा रहीं। उन्होंने “Indian Cinema Content: Audience Reception” विषय पर अपने विचार रखे। उन्होंने बताया कि आज का दर्शक कंटेंट को किस नज़र से देखता है और फिल्मों की सफलता के पीछे कौन-कौन से मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारक काम करते हैं। हाल ही में प्रदर्शित फिल्म “धुरंधर” का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मजबूत कहानी और भावनात्मक जुड़ाव आज भी किसी फिल्म को बड़ी सफलता दिला सकता है। उन्होने कहा कि सत्तर के दशक में विदेशी फिल्मों की कॉपी करने का चलन बढ़ा जो आज डिजिटल प्लैटफॉर्म के ज़रिए वर्ल्ड सिनेमा कंटेंट की सहज सुलभता के चलते और भी बढ़ गया है। विभा झा ने भारतीय सामाजिक परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में भारतीय दर्शकों के मनोविज्ञान का ज़िक्र किया और भारतीय कला परंपराओं को सिनेमा में समाहित करने की ज़रुरत पर ज़ोर दिया।

कंटेंट और बिज़नेस : उत्पल आचार्य की मास्टरक्लास
फरवरी चैप्टर के विशेष अतिथि वक्ता रहे फिल्म स्टूडियो कंटेंट इंजीनियर्स के सीईओ उत्पल आचार्य जो मुंबई से ऑनलाइन जुड़े। उत्पल आचार्य ने अपने दो दशक से अधिक के अनुभव के आधार पर फिल्म इंडस्ट्री की कार्यप्रणाली, डिस्ट्रीब्यूशन, निवेश और ओटीटी युग में आए बदलावों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने सिंगल स्क्रीन से मल्टीप्लेक्स तक के बदलाव और अब उभरते “मिनीप्लेक्स मॉडल” पर भी बात की। उनके अनुसार आने वाले समय में 100-200 सीटों वाले थिएटर का दौर शुरू हो सकता है, जहाँ टिकट कीमत लगभग 100 रुपये के आसपास रखी जानी चाहिए, ताकि आम दर्शक फिर से सिनेमाघरों की ओर आकर्षित हो।
उत्पल आचार्य को सोनी पिक्चर्स (Sony Pictures), रिलायंस एंटरटेनमेंट (Reliance Entertainment) और यूटीवी (UTV) जैसे बड़े स्टूडियोज में अहम और निर्णायक पदों पर काम करने का 20 साल से ज्यादा का अनुभव है। अपने करियर में उन्होंने ‘सिंघम’, ‘गजनी’, ‘3 इडियट्स’ और ‘स्पाइडर-मैन’ जैसी 800 से अधिक फिल्मों के डिस्ट्रीब्यूशन और प्रोडक्शन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आज उनकी कंपनी, कंटेंट इंजीनियर्स, एक ऐसा मॉडर्न फिल्म स्टूडियो है जिसका मकसद अच्छी कहानियों को सही बिजनेस के साथ जोड़ना है। 50 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ शुरू हुई यह कंपनी, भारत की ज़मीनी और सच्ची कहानियों को पूरी दुनिया के सामने लाने का काम कर रही है।

सवाल-जवाब सत्र में उन्होंने स्पष्ट कहा कि आज कई बार कंटेंट से अधिक उसकी प्राइसिंग फिल्म को नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने उभरते फिल्मकारों को भरोसा दिलाया कि यदि उनके पास सशक्त कहानी है तो Content Engineers जैसे स्टूडियो उनके साथ सहयोग के लिए तैयार हैं। उन्होंने NDFF की पहल की सराहना की और सार्थक फिल्म निर्माण को बढ़ावा देने के प्रयासों में निरंतर सहयोग का आश्वासन दिया।
कार्यक्रम के अंत में NDFF के Branding & Marketing Executive Director वैभव मैत्रेय ने आगामी योजनाओं की जानकारी दी, जिसमें हर महीने दो पेशेवर मीट-अप, रेफरल नेटवर्क और थिएटर समुदाय के साथ प्रस्तावित सहयोग शामिल है। NDFF के संयोजक हरिंदर कुमार ने दर्शकों को धन्यवाद देते हुए आगामी कार्यक्रमों की जानकारी दी। इस पूरे कार्यक्रम का टेक और प्रोडक्शन कृष गुप्ता ने संभाला जबकि मीडिया और कोऑर्डिनेशन प्रासिक मेश्राम और कोऑर्डिनेशन शुभनव जैन ने संभाला। इसके बाद ‘चाय पर बातचीत’ का सेशन हुआ।
नेटवर्किंग टी: कला और व्यवसाय से जुड़े अवसरों पर चर्चा
नेटवर्किंग टी सत्र के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ, जहाँ प्रतिभागियों ने रचनात्मक और व्यावसायिक संभावनाओं पर चर्चा की। प्रतिभागियों ने आपस में और मेहमानों से खुलकर संवाद किया और नए रचनात्मक संपर्क बनाए। TCOTF का यह अध्याय सिनेमा को कला, व्यवसाय और समाज के समन्वित मंच के रूप में आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।

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