“एक आदमी की निजी सोच जब भीड़ की सोच बन जाती है तो सारा समाज सड़ने लगता है। एक दीमक से हजारों दीमक- और सारा जंगल खत्म। “ प्राइम वीडियो पर रिलीज़ वेब...
देश में समानांतर या नव-यथार्थवादी सिनेमा की जब भी बात होगी, ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम फ़िल्मों की इस मुख़्तलिफ़ धारा के रहनुमाओं में गिना जाएगा।...
76वें कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में जॉन अब्राहम की अंतिम फिल्म 'अम्मा अरियन' की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई। भारतीय या वैश्विक...
अपनी फ़िल्मों के बारे में ख़ुद मृणाल सेन का कहना था, ‘‘ग़रीबी, सूखा, अकाल और सामाजिक अन्याय मेरे समय का यथार्थ है, एक फ़िल्म निर्देशक की हैसियत से मेरी...
किसी गंभीर फिल्मकार की परेशानियां सेंसर बोर्ड यानी CBFC की चौखट से शुरू होती हैं। उससे पार पाने के बाद फिल्म फेस्टिवल्स का अथाह सागर उसके आगे हिलोरें...
तरक़्क़ीपसंद तहरीक के अगुआ कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि पर ज़ाहिद खान का लेख: शायरी, सिनेमा और इंक़लाब की दास्तान। 'मकान' से 'आवारा सज्दे' तक।...
The heart of the session was the Craft & Crew segment led by Rucheka Chaudhry—and it quickly moved beyond buzzwords into practical understanding.
She...
“AI फिल्मकारों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन्हें रीडिफाइन करेगा।” इस अहम सार के साथ टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के अप्रैल सत्र आयोजित किया गया, जिसमें...
सत्यजित राय मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। जिन्होंने सेल्युलाइड पर अपनी फ़िल्मों से कई बार करिश्मा किया। उन्होंने हमेशा कलात्मक और यथार्थवादी शैली की...
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