Remembering Chetan Anand

‘हक़ीक़त’ जैसे माहौल में चेतन आनंद की याद…

चेतन आनंद एक बेहतरीन फ़िल्मकार होने के साथ साथ बेहद ज़हीन और नफ़ीस इनसान थे। 1946 में उनकी बनाई पहली ही फ़िल्म ‘नीचा नगर’ को फ्रांस के पहले कान फ़िल्म फेस्टिवल में ‘पाम डी ओर’ सम्मान से नवाज़ा गया था।

मसान क्यों अलग थी...

साला ये दुःख काहे ख़तम नहीं होता है… : मसान के 5 साल

सिनेमा का यही मज़ा है और यही विस्मय और विडम्बना भी की एक छोर पर बाहुबली और बजरंगी भाईजान हैं तो दूसरी तरफ मसान.

हिंदी सिनेमा के संगीत के इतिहास में जब भी फ़िल्मी ग़ज़लों का ज़िक्र होगा, मदन मोहन का नाम कतार में सबसे आगे के लोगों में गिना जायेगा

आज सोचा तो आंसू भर आए…

महज़ 51 साल की उम्र मिली संगीतकार मदन मोहन को जीने के लिए, लेकिन जो संगीत वो रच गए वो कालजयी है। आज भी उनमें उतनी ही गहराई है, उतनी ही खूबसूरती है। उनके...

Roshan

जिसने संगीत को कर दिया रोशन…

फ़िल्मी संगीत के इतिहास में मदन मोहन के अलावा रोशन एक ऐसे विरल प्रतिभाशाली संगीतकार हैं जिन्हें कम समय मिला जीने के लिए लेकिन उन्होंने कालजयी संगीत रच कर एक ऐसा मुकाम बनाया है अपने लिए जिसे हासिल करना किसी भी संगीतकार का सपना हो सकता है।

साहब, बीबी और गुलाम का ‘एंड’ वाया के आसिफ़

साहब बीबी और गुलाम सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी थी और उधर गुरुदत्त ने फिल्म का अंत बदलने के लिए दोबारा शूटिंग की तैयारी शुरु कर दी थी…

Satyajit Ray

सत्यजित रे… जिसने बदल दिया भारतीय सिनेमा

दूरबीन का क्या काम होता है? दूर के दृश्य को आपके पास ले आना , इतना पास कि लगे जैसे आँख से जुड़ा रखा हो। सत्यजित रे का सिनेमा समय और समाज की हकीकत...