फिल्म फेस्टिवल का काला सच (1): ‘एंट्री फीस’ स्कैम और सरकारी इरादे

देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे तथाकथित फिल्म फेस्टिवल सामने आ रहे हैं, जिनका मकसद सिनेमा, संवाद, बाज़ार या प्रतिभा को मंच देना नहीं, बल्कि नये...

फिल्म फेस्टिवल का काला सच (2): फिल्ममेकर्स क्या करें, क्या न करें

किसी गंभीर फिल्मकार की परेशानियां सेंसर बोर्ड यानी CBFC की चौखट से शुरू होती हैं। उससे पार पाने के बाद फिल्म फेस्टिवल्स का अथाह सागर उसके आगे हिलोरें...

कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि: कलम से इंक़लाब लिखने वाला शायर

तरक़्क़ीपसंद तहरीक के अगुआ कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि पर ज़ाहिद खान का लेख: शायरी, सिनेमा और इंक़लाब की दास्तान। 'मकान' से 'आवारा सज्दे' तक।...

When Cinema Meets AI: Rethinking Storytelling at Talk Cinema On The Floor

The heart of the session was the Craft & Crew segment led by Rucheka Chaudhry—and it quickly moved beyond buzzwords into practical understanding. She...

AI के दौर में फिल्ममेकिंग: TCOTF में नई सीख, नए सवाल, नई संभावनाएं

“AI फिल्मकारों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन्हें रीडिफाइन करेगा।” इस अहम सार के साथ टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के अप्रैल सत्र आयोजित किया गया, जिसमें...

सत्यजित राय: ‘भारतीय फ़िल्मकार को जीवन, यथार्थ की ओर मुड़ना होगा’

सत्यजित राय मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। जिन्होंने सेल्युलाइड पर अपनी फ़िल्मों से कई बार करिश्मा किया। उन्होंने हमेशा कलात्मक और यथार्थवादी शैली की...

भारतीय सिनेमा के जन कलाकार: बलराज साहनी

पुस्तक 'बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन' में उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को बेहद गहराई से सामने लाया गया है। चाहे उनका शुरुआती जीवन हो या...

इरफ़ान की यादें: वाया अनूप सिंह की ‘जहाँ ले चले हवा’

किताब में एक जगह इरफ़ान के हवाले से दर्ज है, ''मौत के बहुत सारे चेहरे हैं, अनूप साब। वे मेरा मन बहलाते रहते हैं, और मैं बेहतर ढंग से सांस लेने लगता...

सत्यजित राय मेमोरियल टॉक: आज के सिनेमा में यथार्थ और संवेदना की पुनर्स्मृति

‘सत्यजित राय मेमोरियल टॉक’ केवल एक स्मृति आयोजन नहीं, बल्कि सिनेमा की उस विरासत को जीवित रखने का प्रयास है, जो हमें बेहतर देखने, समझने और महसूस करने...

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