
‘मकान’ से ‘आवारा सजदे’ तक — कैफ़ी ने कलम से मोहब्बत भी की और बग़ावत भी। ज़ाहिद खान का ये लेख कैफ़ी आज़मी की ज़िंदगी, उनके प्रगतिशील नज़रिए और अदब में उनके योगदान को समेटता है। पुण्यतिथि पर एक शायर को ख़िराज, जो लफ़्ज़ों से दुनिया बदलना चाहता था। बीसवीं सदी में भारतीय साहित्य में चले प्रगतिशील आन्दोलन पर लेखक ज़ाहिद ख़ान का विस्तृत कार्य है। उनकी कुछ अहम किताबें हैं—‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक का कारवॉं’, ‘तहरीक—ए—आज़ादी और तरक़्क़ीपसंद शायर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’। ‘शैलेन्द्र हर ज़ोर—ज़ुल्म की टक्कर में’, ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ और ‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ ज़ाहिद ख़ान द्वारा सम्पादित किताबें हैं, तो वहीं ‘मख़दूम मोहिउद्दीन सुर्ख़ सवेरे का शायर’, ‘मजाज़ हूँ मैं सरफ़रोश हूँ मैं’ और ‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ का उन्होंने अनुवाद और सम्पादन किया है। ज़ाहिद ख़ान ने कृश्न चन्दर के ऐतिहासिक रिपोर्ताज ‘पौदे’, हमीद अख़्तर की किताब ‘रूदाद—ए—अंजुमन’, अली सरदार जाफ़री का ड्रामा ‘यह किसका ख़ून है !’, कृश्न चन्दर का ड्रामा ‘दरवाज़े खोल दो’,अली सरदार जाफ़री का कहानी संग्रह ‘मंज़िल’ और उर्दू के अहम अफ़साना—निगारों पर केन्द्रित किताब ‘कुछ उनकी यादें कुछ उनसे बातें’ का उर्दू से हिन्दी लिप्यंतरण और अनुवाद भी किया है।
उर्दू अदब के अज़ीम शायर और तरक़्क़ीपसंद तहरीक के सिपहसालार कैफ़ी आज़मी ने अदब को नई दिशा दी। तरक़्क़ीपसंद तहरीक को आगे बढ़ाने और उर्दू अदब को आबाद करने में उनका बड़ा योगदान है। वे इंसान-इंसान के बीच समानता और भाईचारे के बड़े हामी थे। उन्होंने अपने अदब के ज़रिए इंसान के हक़, हुक़ूक़ और इंसाफ़ की लंबी लड़ाई लड़ी। मुल्क की साझा संस्कृति को अवाम तक पहुॅंचाया। मशहूर कथाकार भीष्म साहनी ने कैफ़ी आज़मी की शायरी की ख़ुसूसियत को बयॉं करते हुए एक जगह लिखा है, ”उनकी कविता के गहरे प्रभाव से इंकार नहीं। उसमें बड़ा दर्द है, बड़ी तड़प है। वह दिल की गहराइयों में से निकलने वाली अन्याय का विरोध और गहरी मानवीयता जगाने वाली कविता है।” सय्यद अतहर हुसैन रिज़वी उर्फ़ कैफ़ी आज़मी का जन्म उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ जिले के छोटे से गांव मिजवां में 14 जनवरी, 1919 को एक ज़मींदार परिवार में हुआ। बचपन में ही वे शायरी करने लगे थे। ग्यारह साल की उम्र में लिखी गयी उनकी पहली ग़ज़ल को आगे चलकर ग़ज़ल गायिका बेगम अख़्तर ने अपनी मख़मली आवाज़ दी।
इतना तो ज़िन्दगी में किसी की ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून ना रोने से कल पड़े।
मौलवी बनने चले थे, मज़हब पर फ़ातिहा पढ़ आए
यह ग़ज़ल उस ज़माने में ख़ूब मक़बूल हुई। आगे चलकर कैफ़ी आज़मी ने बेगम अख़्तर की फ़रमाइश पर और भी कुछ ग़ज़लें लिखीं, जिन्हें अपनी आवाज़ से उन्होंने अमर बना दिया। कैफ़ी आज़मी के घरवाले चाहते थे परिवार में एक मौलवी हो, लिहाज़ा घरवालों ने उन्हें लखनऊ के ‘सुल्तान—उल—मदारिस’ भेज दिया। लेकिन कैफ़ी तो कुछ और करने के लिए बने थे। हुआ क्या ? ये अफ़साना निगार आयशा सिद्दक़ी के अल्फ़ाज़ में, ‘‘कैफ़ी साहब को सुल्तान—उल—मदारिस भेजा गया कि फ़ातिहा पढ़ना सीखेंगे। लेकिन कैफ़ी साहब वहॉं से मज़हब पर ही फ़ातिहा पढ़कर निकल आए।’’ मौलवी बनने का ख़याल भले ही उन्होंने छोड़ दिया, लेकिन अपनी पढ़ाई जारी रखी और प्राइवेट इम्तिहानात देकर उर्दू, फ़ारसी और अरबी की कुछ डिग्रियां हासिल की। किसी कॉलेज में सीधे एफ.ए. में दाख़िला लेकर वह अंग्रेज़ी पढ़ना चाहते थे, लेकिन सियासत और शायरी का ज़ुनून उनके सिर इतना चढ़ा कि पढ़ाई पीछे छूट गई।
नज़्म से इंक़लाब तक

अली अब्बास हुसैनी, सय्यद एहतिशाम हुसैन और अली सरदार जाफ़री की संगत में कैफ़ी आज़मी ने मार्क्सवाद का ककहरा सीखा। बाद में ट्रेड यूनियन राजनीति से जुड़ गए। ट्रेड यूनियन की राजनीति के सिलसिले में ही कानपुर जाना हुआ। कपड़ा मिल और चमड़ा कारख़ानों की मज़दूर यूनियनों से जुड़कर कैफ़ी आज़मी ने मज़दूरों-कामग़ारों के शोषण और ग़रीबी को क़रीब से देखा। सरमायेदारों का हक़ीक़ी किरदार जाना। यही तजरबात उनकी शायरी में नुमाया हुए। मज़दूर और किसानों के संघर्ष से प्रेरणा लेकर उन्होंने उस वक़्त कई शानदार नज़्में लिखीं। ‘आख़िरी इम्तिहां’, ‘सुर्ख़ जन्नत’, ‘मौजूदा जंग और तरक़्क़ीपसंद अनासिर’, ‘रूसी औरत का नारा’, ‘जे़ल के दर पर’, ‘किरन’, ‘नए ख़ाके’, ‘औरत’, ‘मकान’, ‘मुगालता’, ‘तुम मुहब्बत को छिपाती क्यों हो ?’ जैसी इंक़लाबी नज़्में और लंबी मसनवी ‘ख़ानाजंगी’ इसी दरमियान लिखी गईं। यह सारी नज़्में उनकी पहली किताब ‘झनकार’ में शामिल हैं। ‘क़ौमी जंग’ और ‘नया अदब’ जैसे पत्र-पत्रिकाओं में कैफ़ी आज़मी की शुरुआती नज़्में और ग़ज़लें प्रकाशित हुईं। रूमानियत और ग़ज़लियत से अलग हटकर, उन्होंने अपनी नज़्मों-ग़ज़लों को समकालीन समस्याओं के सांचे में ढाला। कैफ़ी आज़मी का दौर वह दौर था, जब पूरे मुल्क में आज़ादी की लड़ाई फ़ैसला—कुन मोड़ पर थी। मुल्क में जगह-जगह अंग्रेज़ी हुकूमत के ख़िलाफ़ आंदोलन चल रहे थे। किसानों और कामगारों में एक गुस्सा था, जिसे एक दिशा प्रदान की तरक़्क़ीपसंद तहरीक ने। इस तहरीक से जुड़े सभी अहम शायरों की तरह कैफ़ी आज़मी ने भी अपनी नज़्मों से प्रतिरोध की आवाज़ बुलंद की। किसानों और कामगारों की सभाओं में वे जब अपनी नज़्म पढ़ते, तो लोग आंदोलित हो जाते थे। ख़ास तौर से जब वे अपनी डेढ़ सौ अश’आर की मस्नवी ‘ख़ानाजंगी’ सुनाते, तो हज़ारों लोगों का मजमा इसे दम साधे सुनता रहता।
कैफ़ी आज़मी आगे चलकर पूरी तरह से कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़ गए। एक ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता के तौर पर साल 1943 में जब वे मुम्बई पहुॅंचे, तब उनकी उम्र महज़ तेईस साल थी। उस समय भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की मुम्बई इकाई नई-नई क़ायम हुई थी। वे पार्टी के होल—टाइमर के तौर पर काम करने लगे। पार्टी के दीगर कामों के अलावा उर्दू दैनिक ‘क़ौमी जंग’ और ‘मज़दूर मुहल्ला’ के एडिटोरिअल डिपार्टमेंट में उन्होंने अलग—अलग ओहदे संभाले। इस दरमियान कैफ़ी आज़मी ने उर्दू अदब की मैगज़ीन ‘नया अदब’ का भी सम्पादन किया। मज़दूरों के उन्होंने कई संगठन बनाये। प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा के कार्यक्रमों एवं बैठकों में बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी की। पार्टी कम्यून में कैफ़ी आज़मी का एक कमरे का छोटा—सा घर, ऑफ़िस भी हुआ करता था। जहॉं हमेशा यूनियन लीडरों और पार्टी कार्यकर्ताओं का जमघट लगा रहता। कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल होने के बाद, कैफ़ी आज़मी का आंदोलन से वास्ता आख़िरी सांस तक बना रहा। साम्यवादी नज़रिए का ही असर है कि उनकी सारी शायरी में प्रतिरोध के सुर बुलंद मिलते हैं। उन्होंने बरतानवी साम्राजियत, सामंतशाही, सरमायेदारी और साम्प्रदायिकता के ख़िलाफ़ जमकर लिखा। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भूमिगत जीवन गुज़ार चुके कैफ़ी आज़मी ने साम्राज्यवाद का खुलकर विरोध किया। ‘तरबियत‘ शीर्षक कविता में वे लिखते हैं,
लुटने वाला है दम भर में हुकूमत का सुहाग
लगने ही वाली है जेलों, दफ़्तरों, थानों में आग
मिटने ही वाला है ख़ूॅं—आशाम देवज़र का राज
आने ही वाला है ठोकर में उलट कर सर से ताज।
कैफ़ी आज़मी एक प्रतिबद्ध वामपंथी थे। अपनी ज़िंदगी के आख़िर तक वे साम्यवादी विचारों में रचे-पगे रहे। इस ख़याल से उनका नाता कभी नहीं छूटा। उनकी एक नहीं, कई ऐसी नज़्में हैं, जिनमें उनके साम्यवादी ख़याल नुमायॉं हुए हैं। दीगर तरक़्क़ीपसंद शायरों की तरह कैफ़ी आज़मी ने भी अपनी शायरी की इब्तिदा रूमानी ग़ज़लों से की, लेकिन बाद में वे पूरी तरह से नज़्मों की ओर आ गए। मुल्क की आज़ादी की तहरीक में उन्होंने वतनपरस्ती में डूबी इंक़लाबी नज़्में लिखीं, जिसमें उनका समाजवादी फ़लसफ़ा साफ़ नज़र आता है। तो आज़ादी के बाद मुल्क में बढ़ती फ़िरक़ापरस्ती और साम्प्रदायिक कट्टरता उनके निशाने पर रही। कैफ़ी आज़मी की शायरी के बारे में अफ़साना निगार कृश्न चंदर का ख़याल था, ‘‘वही व्यक्ति ऐसी शायरी कर सकता है, जिसने पत्थरों से सिर टकराया हो और सारे जहान के ग़म अपने सीने में समेट लिए हों।’’ साल 1944 में महज़ छब्बीस साल की छोटी—सी उम्र में कैफ़ी आज़मी का पहला ग़ज़ल मजमूआ ‘झंकार’ प्रकाशित हो गया था। प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक सदस्य सज्जाद ज़हीर ने उनके इस मजमूए की शायरी की तारीफ़ में जो बात लिखी, वह उनके तमाम कलाम की जैसे अक्कासी है, ’‘आधुनिक उर्दू शायरी के बाग़ में नया फूल खिला है, एक सुर्ख़ फूल।’’ ‘आख़िर-ए-शब‘, ‘इबलीस की मजलिस—ए—शूरा’ और ‘आवारा सज्दे‘ कैफ़ी आज़मी के दीगर काव्य संग्रह है।
सिनेमा में भी समझौता नहीं
कैफ़ी आज़मी ने इंक़लाब और आज़ादी के हक़ में ख़ूब लिखा। इसके एवज़ में उन्हें कई पाबंदियॉं और तकलीफ़ें भी झेलनी पड़ीं। लेकिन उन्होंने अपने बग़ावती तेवर नहीं बदले। कैफ़ी आज़मी शायर और नग़मा निगार के अलावा कॉलम निगार भी थे। उनके ये कॉलम उस वक़्त के मशहूर उर्दू वीकली ‘ब्लिट्ज’ में नियमित प्रकाशित होते थे। ‘नई गुलिस्तॉं’ नाम से छपने वाला यह कॉलम राजनीतिक व्यंग्य होता था। जिसमें सम-सामयिक मसलों पर वे तीख़े व्यंग्य करते थे। उनके ये कॉलम ‘नई गुलिस्तॉं’ नाम से ही एक किताब में प्रकाशित हुए हैं। तक़रीबन छह सौ पेज़ की यह किताब दो खंडों में है। शादी होने के बाद आर्थिक परेशानियों और मजबूरियों के चलते कैफ़ी आज़मी ने मुंबई के एक व्यावसायिक अख़बार ‘जम्हूरियत’ के लिए रोज़ाना एक नज़्म लिखी। फ़िल्मों में गीत लिखना शुरू कर दिया। साल 1948 में निर्माता शाहिद लतीफ़ की फ़िल्म ‘बुज़दिल‘ में उन्होंने अपना पहला फ़िल्मी नग़मा लिखा। क़रीब अस्सी फ़िल्मों में गीत लिखने वाले कैफ़ी के गीतों में ज़िंदगी के सभी रंग दिखते हैं। फ़िल्मों में आने के बाद भी उन्होंने अपने नग़मों, शायरी का मेयार नहीं गिरने दिया। ‘कागज़ के फूल‘ जैसी क्लासिक फिल्म के लाजवाब नग़मे उन्ही की क़लम से निकले हैं। ‘अनुपमा‘, ‘हक़ीक़त‘, ‘हॅंसते ज़ख़्म‘, ‘पाकीज़ा‘ वगैरा फ़िल्मों के शायराना नग़मों ने उन्हें फ़िल्मी दुनिया में स्थापित कर दिया। फ़िल्म ‘हीर-रांझा’ में कैफ़ी ने ना सिर्फ़ गीत लिखे, बल्कि शायरी में पूरे डायलॉग भी लिखने का कठिन काम किया। हिन्दी फ़िल्मों में यह अपनी तरह का पहला प्रयोग था। फ़िल्मों से कैफ़ी आज़मी का संबंध आजीविका तक ही सीमित रहा। उन्होंने अपनी शायरी और आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया। कैफ़ी आज़मी ने फ़िल्मों के लिए जो गीत लिखे, वे किताब ‘मेरी आवाज़ सुनो’ में संकलित हैं। साल 1973 में देश के बंटवारे पर केन्द्रित फ़िल्म ‘गर्म हवा‘ की कहानी, संवाद और पटकथा लिखने के लिए उन्हें फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड मिला। यही नहीं इसी फ़िल्म पर संवादों के लिये उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला।
क़ैफी आज़मी जब मुम्बई आए, तो तरक़्क़ीपसंद तहरीक की दाग बेल सज्जाद ज़हीर डाल चुके थे। कैफ़ी आज़मी ने मुम्बई में प्रगतिशील लेखक संघ क़ायम करने की ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ली और यहॉं बहुत बड़ा संगठन बनाया। आगे चलकर तरक़्क़ीपसंद तहरीक के अहम लीडर के तौर पर उन्होंने देश भर में दौरे किए और लोगों को अपने साथ जोड़ा। कैफ़ी आज़मी बंटवारे और साम्प्रदायिकता के कट्टर विरोधी थे। साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता जैसी अमानवीय प्रवृतियों पर प्रहार करते हुए कैफ़ी अपनी नज़्म ‘लखनऊ तो नहीं’ में लिखते हैं,
अज़ा में बहते थे आंसू यहॉं लहू तो नहीं
ये कोई और जगह होगी लखनऊ तो नहीं
यहॉं तो चलती हैं छुरियॉं ज़बान से पहले
ये मीर ‘अनीस’ की, ‘आतिश’ की गुफ़्तगू तो नहीं।
कैफ़ी आज़मी मुम्बई में चाल के जिस कमरे में रहते थे, वहीं उनके आस-पास बड़ी तादाद में मज़दूर और कामगार रहते थे। मज़दूरों-कामगारों के बीच रहते हुये उन्होंने उनके दुःख—दर्द को समझा और क़रीब से देखा। मज़दूरों, मज़लूमों का यही संघर्ष उनकी बाद की नज़्मों में साफ़ दिखाई देता है। मिसाल के तौर पर उनकी नज़्म ‘मकान’ देखिए—
आज की रात बहुत गर्म हवा चलती है
आज की रात न फ़ुट-पाथ पे नींद आएगी
सब उठो, मैं भी उठूॅं, तुम भी उठो, तुम भी उठो
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।
कैफ़ी की यह नज़्म उस वक़्त ख़ूब मशहूर हुई। नज़्म को फ़िल्म डायरेक्टर शाहिद लतीफ़ ने अपनी फ़िल्म ‘सोने की चिड़िया’ में भी इस्तेमाल किया। अली सरदार जाफ़री की तरह कैफ़ी ने भी शायरी को हुस्न, इश्क़ और जिस्म से बाहर निकालकर आम आदमी के दु:ख-दर्द, संघर्ष तक पहुॅंचाया। अपनी शायरी को ज़िंदगी की सच्चाइयों से जोड़ा। कैफ़ी आजमी अत्याचार, असमानता, अन्याय और शोषण के ख़िलाफ़ ता—उम्र लड़े और अपनी शायरी, नज़्मों से लोगों को भी अपने साथ जोड़ा। आज़ादी के बाद कैफ़ी ने समाजवादी भारत का तसव्वुर किया था। स्वाधीनता के पूॅंजीवादी स्वरूप की उन्होंने हमेशा आलोचना की। अपनी नज़्म ‘क़ौमी हुक़्मरॉं‘ में तत्कालीन भारतीय शासकों की आलोचना करते हुए उन्होंने लिखा,
रहजनों से मुफ़ाहमत करके राहबर काफ़िला लुटाते हैं
लेने उठे थे ख़ून का बदला हाथ जल्लाद का बंटाते हैं।
कैफ़ी के यही आक्रामक तेवर आगे भी बरक़रार रहे। उनकी शायरी में समाजी, सियासी बेदारी साफ़-साफ़ दिखाई देती है। सामाजिक समरसता, साम्प्रदायिक सद्भाव को उन्होंने हमेशा अपनी शायरी में बढ़ावा दिया। स्त्री-पुरुष समानता और स्त्री स्वतंत्रता के हिमायती कैफ़ी आज़मी अपनी मशहूर नज़्म ‘औरत‘ में लिखते हैं,
तोड़ कर रस्म का बुत बंदे-क़दामत से निकल
ज़ोफे-इशरत से निकल, वहमे-नज़ाकत से निकल
नफ़्स के खींचे हुये हल्क़ाए-अज़मत से निकल
राह का ख़ार ही क्या, गुल भी कुचलना है तुझे
उठ मेरी जान, मेरे साथ ही चलना है तुझे।
कैफ़ी आज़मी ‘भारतीय जननाट्य संघ’ (इप्टा) के संस्थापक सदस्य थे। उन्होंने ‘आख़िरी शमा’ और ‘ज़हर-ए-इश्क’ जैसे ड्रामे भी लिखे। कैफ़ी आज़मी इप्टा के राष्ट्रीय अध्यक्ष के ओहदे पर कई साल तक रहे। उनके कार्यकाल में इप्टा की शाखाओं का पूरे भारत में विस्तार हुआ। इप्टा को वे आम जन तक अपनी बात पहुॅंचाने का सार्थक और सरल तरीक़ा मानते थे। कैफ़ी आज़मी फ़िरक़ापरस्ती और मज़हबी कट्टरता के हमेशा मुख़ालिफ़ रहे। अपनी नज़्मों ‘सोमनाथ’, ‘सॉंप’, ‘बहुरूपनी’, ‘लखनऊ तो नहीं’ और ‘दूसरा बनवास’ में उन्होंने इन इंसानियत विरोधी प्रवृतियों की खुलकर मुख़ालफ़त की। अपनी एक नज़्म ‘सोमनाथ’ में साम्प्रदायिक लीडरों और कट्टरपंथियों पर निशाना साधते हुये वे कहते हैं,
बुत—शिकन कोई कहीं से भी न आने पाये
हमने कुछ बुत अभी सपने में सजा रक्खे हैं।
कैफ़ी आज़मी महज एक अदीब ही नहीं थे, बल्कि एक्टिविस्ट भी थे। जब भी ज़रूरत पड़ी, वे बिना किसी ख़ौफ़ के सड़कों पर उतरे। साल 1989 में इप्टा ने उत्तर प्रदेश में साम्प्रदायिकता और पुनरुत्थानवाद विरोधी पॉंच दिवसीय सद्भावना यात्रा निकाली। यह वह दौर था, जब राम जन्मभूमि—बाबरी मस्जिद मामला सुर्ख़ियों में था। इस मुद्दे को लेकर पूरे मुल्क में साम्प्रदायिक तनाव चरम पर था। बीमारी के बावजूद कैफ़ी आज़मी इस सद्भावना यात्रा में शामिल हुए। व्हीलचेयर पर बैठकर, उन्होंने यह पूरा सफ़र तय किया। इस यात्रा में उन्होंने जगह—जगह अवाम से सीधा संवाद क़ायम किया। अपनी नज़्मों और ग़ज़लों के मार्फ़त उन्हें समझाने की कोशिश की। एक-दो जगह यात्रा पर हमला भी हुआ, मगर वे हिम्मत नहीं हारे। अपनी साम्प्रदायिकता विरोधी नज़्मों की वजह से कैफ़ी आज़मी हिंदू और मुस्लिम दोनों ही मज़हब के कट्टरपंथियों के निशाने पर रहे। ‘पीर-ए-तस्मा-पा’ नज़्म को पढ़कर, मुस्लिम कट्टरपंथियों ने तो उन्हें दहरिया यानी नास्तिक शायर तक क़रार दे दिया। उन पर ब्लास्फे़मी की तोहमत लगाई। लेकिन उन्होंने अपनी विचारधारा से कभी समझौता नहीं किया। साम्प्रदायिक सियासत और मज़हबी कट्टरता को निशाना बनाते हुए कैफ़ी आज़मी ने अपनी नज़्म—’सॉंप’ में लिखा—
ये साँप आज जो फन उठाए
मिरे रास्ते में खड़ा है
पड़ा था क़दम चाँद पर मेरा जिस दिन
उसी दिन इसे मार डाला था मैंने
ये हिन्दू नहीं है मुसलमाँ नहीं
ये दोनों का मग़्ज़ और ख़ूँ चाटता है
बने जब ये हिन्दू मुसलमान इंसाँ
उसी दिन ये कम-बख़्त मर जाएगा।
साल 1974 में आई ‘आवारा सज्दे’ कैफ़ी की आख़िरी किताब है। यह किताब आज़ादी के बाद के पच्चीस सालों का एक तटस्थ लेखा—जोखा है। सरकारों से उनकी जो अपेक्षाएं और उम्मीदें थीं, उनके टूटने का दर्द इसमें शामिल है। वामपंथी आंदोलन के भटकाव पर भी उनकी नुक़्ता-ए-नज़र है। किताब में शामिल ‘आवारा सज्दे’, ‘दायरा’, ‘दोपहर’, ‘आख़िरी रात’, ‘मेरा माज़ी मेरे कांधे पर’ और ‘इंतशार’ वगैरह नज़्मों में वे बड़ी ही तल्ख़ी से इन सवालों को उठाते हैं। नज़्म ‘इंतिशार’ में उनका अंदाज़—ए—बयॉं है—
कभी जुमूद कभी सिर्फ़ इंतिशार सा है
जहाँ को अपनी तबाही का इंतिज़ार सा है
हुई तो कैसे बयाबाँ में आ के शाम हुई
कि जो मज़ार यहाँ है मिरा मज़ार सा है
कोई तो सूद चुकाए, कोई तो ज़िम्मा ले
उस इंक़िलाब का, जो आज तक उधार-सा है।
कैफ़ी आज़मी की वैसे तो सभी नज़्में एक से एक बढ़कर एक हैं, लेकिन ‘तेलांगना’, ‘बांगलादेश’, ‘फ़रघाना’, ‘मास्को’, ‘औरत’, ‘मकान’, ‘बहूरूपिणी’, ‘दूसरा वनबास’, ‘ज़िंदगी’, ‘पीरे-तस्मा-पा’, ‘आवारा सज्दे’, ‘इब्ने मरियम’ और ‘हुस्न’ नज़्मों का कोई जवाब नहीं। क़ैफी आज़मी को उर्दू अदब मे सबसे ज़्यादा पुरस्कार पाने वाला शायर माना जाता है। ‘पद्मश्री’ कैफ़ी को ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’, महाराष्ट्र उर्दू अकादमी द्वारा ‘संत ज्ञानेश्वर पुरस्कार’, ‘महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार’, उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा ‘युवा भारतीय पुरस्कार’, विश्व भारती यूनिवर्सिटी से ‘डी लिट्’ की उपाधि के अलावा कई अंतर्राष्ट्रीय अवार्डों से भी नवाज़ा गया। मसलन ‘अफ्रो-एशियन पुरस्कार’, ‘सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार’ आदि। बावजूद इसके वे अपने लिए सबसे बड़ा सम्मान, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लाल कार्ड को समझते थे और उसे हमेशा अपनी जेब में रखते थे। वामपंथी विचारधारा में उनका अक़ीदा आख़िर तक रहा। अपने व्यवहार में वे पूरी तरह से वामपंथी थे। लेखन और उनकी ज़िंदगी में कोई फ़र्क़ नहीं था। मुंबई आने के बाद भी उनका अपने गॉंव मिजवॉं से हमेशा नाता रहा। साल 1973 में कैफ़ी आज़मी को लकवा मार गया। लकवे से उनका आधा जिस्म बेजान हो गया, लेकिन उन्होंने अपना हौसला नहीं खोया। ज़िंदगी के आख़िर तक वे अपने लोगों की बेहतरी के लिए काम करते रहे। उत्तर प्रदेश के मिजवॉं गॉंव में जहॉं कैफ़ी की पैदाइश हुई, उन्होंने अपना आख़िरी वक़्त बिताया। इस दौरान गॉंव की बुनियादी ज़रूरतों की तरफ उनका ध्यान गया। कैफ़ी आज़मी की ही वजह से इस छोटे से गॉंव मिजवॉं को पहचान मिलने के साथ-साथ कई सौगातें भी मिलीं। उन्हीं की कोशिशों का ही नतीजा है कि अब इस गॉंव में सड़क, बिजली, शिक्षा और आवागमन के सभी साधन उपलब्ध हैं। लेकिन कैफ़ी आज़मी ने इसके लिए ख़ूब संघर्ष किया। ज़रूरत पड़ी, तो गॉंववालों की मॉंगों को मनवाने के लिए सड़कों पर भी उतरे।
मुल्क में समाजवाद आए, कैफ़ी आज़मी का यह सपना था। वे लोगों से अक्सर यह कहा करते थे, ”मैं ग़ुलाम हिन्दुस्तान में पैदा हुआ, आज़ाद भारत में जिया और समाजवादी भारत में मरूॅंगा।” लेकिन अफ़सोस ! कैफ़ी आज़मी की आख़िरी ख़्वाहिश उनके जीते जी पूरी नहीं हो सकी। उनका सपना अधूरा ही रहा। 10 मई 2002 को कैफ़ी हमसे रुख़सत हुए, मगर उनकी नज़्में आज भी इंसाफ़ की लड़ाई लड़ रही हैं।
सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने
सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने
जहाँ से पिछले पहर कोई तिश्ना-काम उठा
वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने
बहार आये तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने।
