

प्रोसित रॉय की राख Amazon Prime Video पर 12 जून 2026 को रिलीज़ हुई 8-एपिसोड की इन्वेस्टिगेटिव थ्रिलर है। ये सीरीज़ 1978 के कुख्यात रंगा-बिल्ला कांड से प्रेरित है, जब दिल्ली में दो किशोर भाई-बहन लापता हुए थे और ये केस पूरे देश को हिला गया था। सीरीज़ की ताकत इसकी संवेदनशील अप्रोच है — ये अपराध से ज़्यादा, उसके बाद टूटते परिवारों और एक शहर के डर को दिखाती है। साथ ही इसमें समाज और सिस्टम से पूछे जाने वाले कई सुलगते सवाल भी हैं। इस दिलचस्प सीरीज़ पर एक समीक्षात्मक टिप्पणी लिखी है वरिष्ठ पत्रकार और लेखक-फिल्म समीक्षक अमिताभ श्रीवास्तवने। अमिताभ श्रीवास्तव आजतक, इंडिया टीवी जैसे न्यूज़ चैनलों में बतौर वरिष्ठ कार्यकारी संपादक कार्य कर चुके हैं। वह हाल ही में गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित पुस्तक ऋत्विक घटक: नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक के सहयोगी लेखक भी हैं। NDFF से शुरू से ही जुड़े रहे हैं और ‘टॉक सिनेमा ‘ सीरीज़ के लाइव सत्रों का संचालन करते रहे हैं। इन दिनों सत्य हिंदी पोर्टल पर नियमित रुप से ‘सिनेमा संवाद’ सत्र का संचालन कर रहे हैं, जिसने आज के दौर में सिनेमा और उसके सामाजिक सरोकारों को लेकर एक गंभीर संवाद के मंच के तौर पर प्रतिष्ठा अर्जित की है।
“एक आदमी की निजी सोच जब भीड़ की सोच बन जाती है तो सारा समाज सड़ने लगता है। एक दीमक से हजारों दीमक- और सारा जंगल खत्म। “
प्राइम वीडियो पर रिलीज़ वेब सीरीज़ ‘राख’ का यह संवाद हमारे देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में बहुत मानीख़ेज़ है। जिस तरह से भीड़तंत्र हावी हो चुका है, वह हमारे समाज में अमन चैन के लिए बहुत बडा खतरा बन गया है।

वेब सीरीज़ मोटे तौर पर दिल्ली में 1978 में हुए गीता चोपड़ा-संजय चोपड़ा हत्याकांड से प्रेरित है जिसकी याद लगभग पचास साल बाद भी किसी संवेदनशील व्यक्ति को समाज के अपराधीकरण और इंसान के जानवर बनते जाने की हक़ीक़त अपने इर्दगिर्द घटते देखकर डरा सकती है, अपने बच्चों, परिवार को लेकर बेहद चिंतित और परेशान कर सकती है क्योंकि उस दिल दहला देने वाली वारदात के बाद और उन खूंखार अपराधियों रंगा-बिल्ला को फाँसी पर लटका देने के बाद भी दिल्ली समेत पूरे देश में दरिंदगी कम नहीं हुई, बल्कि खतरनाक अनुपात में बढ़ी ही है। दिल्ली का निर्भया कांड ही ले लीजिये। बस में बलात्कार के बाद देश भर में हंगामा हुआ, बलात्कारी पकड़े गये, फाँसी भी हो गई लेकिन क्या समाज में उस तरह की घटनाएँ रुक गईं? नहीं। सड़ते हुए समाज में अपराध रोकने के लिए पुलिस, अदालतों के अलावा भी बाक़ी मोर्चों पर बहुत समझदारी, संवेदनशीलता और सतर्कता की ज़रूरत है जिसमें अभी हम काफी पीछे हैं क्योंकि समाज और सियासत दोनों की प्राथमिकताओं में कुछ और ही मुद्दे हैं। इसलिए सिनेमा और मीडिया उन सुलगते सवालों को विमर्श में बनाए रखे ये ज़रूरी है।
वेब सीरीज़ में पात्रों के नाम बदल दिये गये हैं लेकिन स्क्रिप्ट में तमाम घटनायें असली वारदात के नजदीक हैं। बहुत कसी हुई पटकथा है और आठ क़िस्तों में फैली होने के बावजूद ज्यादातर पकड़ मज़बूत है। कहानी सुमन अरोड़ा( दिव्या शर्मा) और साहिल अरोड़ा ( विवान शर्मा) नाम के भाई-बहन से शुरू होती है जो फ़ौजी पिता अशोक अरोरा ( आमिर बशीर) और टीचर माँ मोना अरोरा ( सोनाली बेंद्रे) की संतान हैं, किशोरावस्था में हैं। सुमन एक दिन रेडियो स्टेशन पर प्रोग्राम के लिए भाई साहिल के साथ घर से निकलती हैं लेकिन पहुँच नहीं पाती। रास्ते में ही दो दरिंदे बाबू और रज्जो उन्हें कार में लिफ़्ट देते हैं और बाद में उनकी लाशें बरामद होती हैं।

केस की तफ्तीश करने वाला सब इंस्पेक्टर जय प्रकाश ( अली फज़ल) सिविल सर्विस के इम्तिहान की तैयारी कर रहा है। जयप्रकाश के किरदार के बहाने ‘राख’ में दलित विमर्श भी है। नायक जयप्रकाश जाटव है- दलित । पिता घनश्याम( राकेश बेदी) पुलिस में हवलदार थे। अपनी सामाजिक स्थिति के प्रति सचेत हैं और बेटे को सबसे बनाये रखने की हिदायत देते रहते हैं। खुद सब अफसरों को खुश रखने के लिए घर से मटन बना कर ले जाते हैं जो उनके नौजवान बेटे को बिल्कुल पसंद नहीं आता। वह कहता भी है- खुश करने में और खुशामद करने में फर्क होता है।
घर में बाबा साहब भीमराव अंबेडकर की तस्वीर लगी है। फ़्लैश बैक में अंबेडकर नायक के बचपन के एक दृश्य में दिखाये भी गये हैं एक पात्र की तरह एक सम्मेलन में लोगों को प्रेरित करते हुए।कहानी में दलित-मुस्लिम दोस्ती भी है। एक मुस्लिम पत्रकार निसार रिज़वी ( अंशुल चौहान) उसकी क़रीबी दोस्त या प्रेमिका है और थाने में उसका विश्वस्त सहकर्मी है जावेद ।
पाताल लोक वाले प्रोसित रॉय के निर्देशन में कहानी का बहाव और सभी प्रमुख कलाकारों का शानदार अभिनय बांधे रखता है। लेखक अनूशा नंदकुमार और संदीप साकेत सहनिर्देशक भी हैं। अली फ़ज़ल ने जयप्रकाश की भूमिका में कमाल का काम किया है। उनके अब तक के करियर का सबसे यादगार। चर्चित वेब सीरीज़ ‘मिर्ज़ापुर’ के गालीबाज़ उजड्ड सरगना गुड्डू पंडित के ठीक उलट यहां अपने सारे तनावों, दबावों, उपेक्षा, तकलीफ़ों, झुँझलाहटों, गुस्से और नाकामियों को बहुत नियंत्रित तरीके से अभिव्यक्त किया है उन्होंने। यही बात आमिर बशीर और सोनाली बेंद्रे के लिए भी कहनी होगी। बच्चों की लाशें देखने के बाद आमिर बशीर के विलाप का दृश्य कलेजा चीर देने वाला है। सोनाली बेंद्रे ने हादसे से गुमसुम हो गई माँ का बहुत प्रभावी अभिनय किया है। ‘धुरंधर’ के जमील जमाली से नये सिरे से शोहरत पाये राकेश बेदी यहां बिल्कुल शरीफ से दुनियादार बाप बने हैं जिन्हें समाज में दलित होने की हैसियत का एहसास है और वह अपने नौजवान बेटे को भी वही समझदारी देना चाहते हैं। लेकिन बेटे के खयाल अलग हैं। राकेश बेदी और अली फजल के बीच बाप-बेटे के तनाव वाले दृश्य अच्छे हैं।

बाबू और रज्जो के किरदारों में आकाश मखीजा और रमनदीप यादव का काम ऐसा जबरदस्त है कि उनसे घिन सी आ जाए। ख़ास तौर पर , बाबू बने आकाश मखीजा की आँखों में हमेशा मौजूद वहशी, शैतानी चमक उनके मनोरोगी, उन्मादी किरदार को बख़ूबी उभारती है। ज़रा से शक में वह न तो अपनी मां और नन्हीं बहन को ज़िंदा छोड़ता है, न प्रेमिका को। खलनायक के रूप में याद रखने लायक काम है आकाश का। रज्जो के किरदार में रमनदीप यादव ने करुणा और क्रूरता के बीच झूलते अपराधी का मनोवैज्ञानिक पक्ष अपने हाव-भाव और संवाद अदायगी के ज़रिये बख़ूबी ज़ाहिर किया है। दोस्त और जानने वाले उसे नसबंदी का शिकार बता कर चिढ़ाते हैं तो वह अपनी मर्दानगी साबित करने के लिए क्रूरता पर उतर आता है।
कैमरा का काम बहुत बढ़िया है। सत्तर के दशक के उत्तरार्ध की दिल्ली का माहौल रचने में निर्देशक की मेहनत दिखती है। जिस बस स्टॉप पर दोनों बच्चों ने हत्यारों बाबू और रज्जो से लिफ्ट ली थी, वहां दीवार पर ‘हम दो हमारे दो’ का विज्ञापन वारदात के बाद बड़े विडंबनात्मक ढंग से परिस्थिति की मार्मिकता को उभारता है। एडिटिंग चुस्त है । दोनों अपराधियों बाबू और रज्जो( आकाश मखीजा और रमनदीप यादव) के निजी जीवन बारे में फैलाव को थोड़ा समेट लेते तो और कसावट दिखती। आयुष त्रिवेदी के संवाद बहुत अच्छे हैं। जैसे अंत में कही गई यह बात- असली लड़ाई उम्मीद न हारना है।
राख देखते हुए इससे पहले की वेब सीरीज़ दिल्ली क्राइम, ट्रायल बाई फ़ायर और ब्लैक वॉरंट भी याद आती हैं। अपने दोनों बच्चे खो चुकी मां के किरदार में सोनाली बेंद्रे का अंदर ही अंदर घुटते रहना अनायास ही ट्रायल बाई फ़ायर की राजश्री देशपांडे के शानदार अभिनय की याद दिलाता है जिन्होंने दिल्ली के उपहार सिनेमा अग्निकांड में अपने दोनों बच्चे ग॔वा देने वाली नीलम कृष्णमूर्ति का किरदार निभाया था। नीलम कृष्णमूर्ति उपहार कांड के बाद दिल्ली की एक चर्चित जुझारू सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में चर्चित हुई हैं। उपहार कांड के कुछ दिन बाद ही आज तक के रिपोर्टर के तौर पर मैंने नीलम कृष्णमूर्ति और उनके पति शेखर कृष्णमूर्ति से उनके घर जाकर बातचीत की थी। अपना सब कुछ खो चुके उन दोनों के ग़मज़दा चेहरे, डबडबाई आंखें और वह पीड़ा अब भी याद है। अफसोस होता है यह देखकर कि इतने हादसे हुए जिनमें अपना सब कुछ गंवा देने वालों की तकलीफ समझने की संवेदना और उसके निवारण की तत्परता अभी तक हमारे समाज और सरकारी सिस्टम में नहीं आ पाई है। इनमें अदालतें भी शामिल हैं। ये सीरीज़ समाज और सिस्टम से पूछे जाने वाले सुलगते सवालों को मुखर ढंग से उभारती है।
‘राख’ देखते हुए गुस्सा आता है , ख़ून उबलता है। ‘राख’ प्रतीक है हमारी नष्ट होती इंसानियत, हमारी सामूहिक सामाजिक चेतना और संवेदना का। गुनाहों की राख तले बहुत से सुलगते सवाल हैं और शोलों में बदल सकने वाली चिंगारियां भी। समाज के तौर पर हमारे चेहरों पर भी कहीं न कहीं ऐसी ‘राख’ चिपकी हुई है।
राख’ अपने स्तर पर दर्शकों को झिंझोड़ने और उन्हें ज्यादा संवेदनशील, सतर्क बनने के लिए प्रेरित करती है। इसे इस वेब सीरीज के लेखकों, और निर्माता-निर्देशक की सफलता मानना चाहिए।
