

मुख्यधारा के चकाचौंध भरे सिनेमाई विमर्श के बीच संथाली फिल्म ‘आंगेन’ (Invisible) को मिला राष्ट्रीय सम्मान महज एक पुरस्कार नहीं, बल्कि हाशिये की लोक-संवेदनाओं की राष्ट्रीय फलक पर ऐतिहासिक दस्तक है। निर्देशक रवि राज मुर्मू ने सीमित संसाधनों के बावजूद जिस ईमानदारी से अपनी मिट्टी, भाषा और समाज के अंतर्द्वंद्वों को परदे पर उतारा है, वह भारतीय सिनेमा में सच्चे यथार्थवाद की पुनर्स्थापना करता है। यह आलेख सिर्फ एक फिल्म की सफलता की कहानी नहीं कहता, बल्कि यह रेखांकित करता है कि जब अपनी जड़ों से उपजी कहानियां बिना किसी कृत्रिम मेलोड्रामा के कही जाती हैं, तो वे भाषाई सीमाओं को लांघकर सीधे मानवीय चेतना से संवाद करती हैं। जानी मानी सिनेविद् और वरिष्ठ लेखिका डॉ विजय शर्मा का ये आलेख आदिवासी और क्षेत्रीय सिनेमा के बदलते तेवर को समझने के लिए एक विचारोत्तेजक और जरूरी दस्तावेज है।
राष्ट्रीय फलक पर संथाली अस्मिता की गूंज

फ़िल्म बनाना एक खर्चीला काम है, इसके लिए पैसा चाहिए, लेकिन उससे भी बढ़ कर फ़िल्म बनाने केलिए जुनून चाहिए। पैसा न मिले तो भी जुनून के चलते फ़िल्म बनाई जा सकती है, न केवल फ़िल्म बनाई जा सकती है, वरन सर्वोत्तम निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार जीता जा सकता है। और यही किया है, जमशेदपुर के आदिवासी युवक ने। ‘आंगेन’ (अदृश्य) एडिटर-निर्देशक रवि राज मुर्मू ने 7 साल अपने मन की फ़ीचर फ़िल्म बनाने केलिए विभिन्न प्रड्यूसर का चक्कर काटने के बाद फ़िल्म को लघु रूप दिया और सीमित बजट में मात्र 12 मिनट में अपनी फ़िल्म को समेट कर राष्ट्रीय पुरस्कार प्रतियोगिता जीत ली। न केवल जीत ली वरन 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में इतिहास रच दिया।
रवि राज मुर्मू ने अपनी संथाली फ़िल्म ‘आंगेन’ के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का पुरस्कार जीता है। अक्सर बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियाँ रचनाकारों केलिए खाद-पानी का काम करती हैं। पूर्वी सिंहभूम जिले के एक छोटे से आदिवासी गांव में पले-बढ़े रवि राज मुर्मू ने भी बचपन में अपने बुजुर्गों से कहानियाँ सुनी थीं। चूँकि रवि राज आदिवासी समुदाय से आते हैं, तो उन्होंने आदिवासी लोककथाओं, बोंगा (आत्माओं), जंगल, नदियों की मौखिक परम्परा की कहानियाँ सुनी। और जब फ़िल्म बनाई तो अपनी मिट्टी से जुड़ी कहानी को परदे पर उतारा। रेनुआँ ने सत्यजित राय को सुझाव दिया था, हॉलीवुड जैसी फ़िल्म न बनाए, वे अपने आस-पास की फ़िल्म बनाएँ। रवि राज ने अपने आसपास की फ़िल्म बनाई है।
जमशेदपुर की पढ़ाई से सिनेमाई कैनवास तक

गांव में स्कूल से पढ़ाई प्रारंभ कर रवि राज ने जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज के मास कॉम विभाग से पढ़ाई की। मुझे बताते हुए अच्छा लगता है, करीम सिटी कॉलेज खासकर उसके मास कॉम विभाग से मेरा जुड़ाव है। इसके बाद रवि ने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, पुणे का रुख किया। वहाँ 2016- 2019 में फिल्म एडिटिंग में प्रशिक्षण लिया। पुणे से पढ़ाई के बाद उन्होंने मुंबई में रहते हुए नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, जियो सिनेमा और कई विज्ञापन फिल्मों के लिए काम किया। रवि राज ने ‘सुंडी’ (2026) और ‘बुरबोकोर खेल’ (बुड़बक का खेल ‘गेम्स ऑफ फूल’) (2022) बनाई। अभी तक मात्र तीन फ़िल्म बनाई एवं तीन ही एडिट की हैं। दो फ़िल्में प्रड्यूस की हैं।
प्रथम का महत्व विशिष्ट होता है, इसका स्थान कोई नहीं ले सकता है। झारखंड के आदिवासी इसके पहले भी फ़िल्म बनाते रहे हैं, मगर प्रथम पुरस्कृत संथाली फ़िल्म ‘आंगेन’ की सफ़लता यहाँ के सिनेमा, यहाँ की संस्कृति को पहचान दिलाएगी इसमें शक नहीं है।
‘आंगेन’: यथार्थ, लोक-संवेदना और मानवीय द्वंद्व
‘आँगेन’ नाम से एक और लघु संथाली फ़िल्म नेट पर उपलब्ध है। दोनों में फ़र्क है। चरवाहा, बाँसुरी, नदी, जंगल आदिवासी समाज का हिस्सा है। मुंडा जनजाति के गीतों पर जगदीश त्रिगुणायत का ‘बाँसूरी बज रही है’ नामक एक लोक गीत संग्रह प्रकाशित है। निर्देशक रवि राज की संथाली लोककथा पर आधारित ‘आँगेन’ में बाँसुरी बजाने वाला सुक्कू एक चरवाहा है। उसकी बाँसुरी की मधुर धुन से आत्माओं की दुनिया में रहने वाली, देवियाँ खेतों, तालाबों और गाँव की कीचड़ भरी सड़कों पर रहने वाली ‘सात बहनें’ आकर्षित होती हैं। देवियाँ इस लड़के को पानी मार्ग से स्वर्ग ले जाती हैं, पर वापसी की ‘ओडिसी’ कभी आसान नहीं होती है। जब वह वापस लौटना चाहता है, तो उसे कोई रास्ता नहीं मिलता। उसे केवल तालाब दिखाई देते हैं, वह एक में डुबकी लगाकर दूसरे से बाहर निकलता है।

इस कहानी में एक राजनीतिक और दार्शनिक संदेश छिपा है। रवि राज मुर्मु के अनुसार उन्होंने देवियों को प्रतीकात्मक रूप से ‘विकास’ के प्रतीक के रूप में दर्शाने का प्रयास किया है। ‘विकास’ जिसका अंधाधुंध अनुसरण हमें एक ऐसे मोड़ पर ले जा रहा है, जहाँ से वापसी असंभव है।
फिल्म का अंत जानबूझकर खुला छोड़ा गया है, क्योंकि इसी कहानी पर पूरी फीचर फिल्म अभी बननी बाकी है। रवि मुर्मू के अनुसार यह फिल्म एक पौराणिक कथा मात्र नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज और प्रकृति के बदलते रिश्ते की कहानी भी है। तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण जंगल, जल स्रोत और वे स्थान लगातार खत्म हो रहे हैं, जिन्हें आदिवासी समुदाय अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा मानता है। फिल्म में पानी को दो दुनियाओं के बीच पुल के रूप में दिखाया गया है। रवि का कहना है, विज्ञान भी मानता है, जीवन की शुरुआत पानी से हुई थी, इसलिए उन्होंने इसे फिल्म का केंद्रीय प्रतीक बनाया।
सीमित संसाधन, असीमित दृष्टि: आदिवासी सिनेमा का नया सवेरा
पुरस्कार मिलने पर ‘आँगेन’ फिल्म के निर्माता-निर्देशक रवि राज मुर्मू खुश हैं। उन्हें इसकी उम्मीद नहीं थी। इसे उन्होंने 2024 में जमशेदपुर के करीम सिटी कॉलेज के अपने छात्रों के साथ मस्ती-मजाक में बनाया था। जब वे उन्हें फिल्म निर्माण की बारीकियां सिखा रहे थे। वे लोग पास के प्राकृतिक स्थलों पर गए, वहां इसकी शूटिंग की। वे इस लघु फ़िल्म को फीचर फिल्में बनाने के लिए एक लॉन्चिंग पैड मानते हैं। वे आदिवासी कहानियों और एक-दूसरे के साथ उनके अंतर्संबंध दिखाने हेतु आदिवासी भाषाओं- संथाली, हो, मुंडारी आदि का उपयोग करके एक फीचर फिल्म बनाने की योजना बना रहे हैं। रवि राज को अपनी पहली फ़ीचर लिए कम-से-कम 10-15 करोड़ रुपये की आवश्यकता होगी।
उन्हें प्रड्यूसर मिले, उनकी यह इच्छा पूरी हो, इसी शुभकामना के साथ उन्हें ‘आंगेन’ के गैर फ़ीचर फ़िल्म के राष्ट्रीय पुरस्कार की बधाई! इसी महीने की 22 तारीख को गुजरात के केवड़िया में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह आयोजित हो रहा है, जहां उन्हे इस पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।
