


हंगरी के महान फिल्मकार बेला टार का 6 जनवरी को 70 साल की आयु में निधन हो गया है। उनकी कई फिल्मों का आधार बीते साल के साहित्य के नोबेल पुरस्कार विजेता हंगरी के लेखक लाज़लो क्रासनाहोरकाई की रचनाएं रही हैं। सार्वकालिक महान फिल्मों में गिनी जाने वाली बेला टार की 1994 की फिल्म ‘Sátántangó’ (सेटनटैंगो) भी क्रासनाहोरकाई की रचना पर आधारित थी। बेला टार की साहित्यिक समझ की गहराई और सृजन के इस पहलू पर प्रस्तुत है जानी मानी सिनेविद् और वरिष्ठ लेखिका डॉ विजय शर्मा का आलेख। इस लेख की प्रस्तावना के तौर पर उनका कहना है- मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है, मैंने इस साल (2025)के साहित्य के नोबेल पुरस्कृत हंगेरियन रचनाकार लाज़लो क्रासनाहोरकाई (Laszlo Krasznahorkai) लेखक/कवि (नौ उपन्यास, ढेर सारी कहानियाँ एवं लेख) को बहुत नहीं पढ़ा है। हालाँकि फ़िल्म के माध्यम से मेरा उनसे परिचय हुआ और कुछ किताबें जुटा ली थीं। इनके कई साक्षात्कार देखे-सुने एवं पढ़े। मैंने यह आलेख लाज़लो की कुछ किताबों, उनके साक्षात्कार, फ़िल्म एवं नोबेल साइट को आधार बना कर लिखा है। ‘विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया’ लिखते हुए सिने-निर्देशक बेला टार (Béla Tarr) को जाना।

21 जुलाई 1955 को पैदा हुए हंगरी के सिने-निर्देशक बेला टार ने प्रयोगात्मक फ़िल्में बनाई हैं, वे धीमी गति की फ़िल्म बनाने के लिए जाने जाते हैं। लाज़लो ने छ: स्क्रीनप्ले लिखे (‘सेटनटैंगो’, ‘डैम्नेशन’, ‘द टुरिन होर्स’, ‘द मेलंकली ऑफ रेज़िस्टेंस’, ‘द मैन फ़्रॉम लंडन’ और लघु फ़िल्म ‘द लास्ट बोट-सिटी लाइफ़’), जिन पर बेला टार ने फ़िल्म बनाई हैं। बेला ने लाज़लो के काम पर सात घंटे की ‘सेटनटैंगो’ बनाई। द पेरिस रिव्यू (Issue 225, साल 2018) के लिए एडम थर्वेल से बातचीत करते हुए वे कहते हैं, उन्होंने केवल बेला टार के साथ काम किया है। उन्होंने बेला को सब कुछ दिया और बेला ने सब कुछ लिया। यह सहभागिता से अधिक था। उनकी स्क्रिप्ट भी साहित्यिक होती है, पर वे कहते हैं, सिनेमा बिला शक एक कला है। अगर आप के काम पर निर्देशक फ़िल्म बनाना चाहता है तो आपको यह स्वीकारना होगा, वह निर्देशक की है, फ़िल्म उसकी होगी अन्यथा यह एक गलती होगी। लाज़लो संवाद लिखते हैं, कई बार इसे देख बेला कहते, यह स्क्रिप्ट नहीं है, इसे फ़िल्माया नहीं जा सकता है। लाज़लो स्वयं को फ़िल्मी दुनिया का आदमी नहीं मानते हैं। लाज़लो ने ऑपेरा भी तैयार किया है।

असल में लाज़लो ने बेला टार के साथ पहले ‘डेम्नेशन’ पर फ़िल्म बनाई। ‘सेटनटैंगो’ के प्रकाशन के साथ ही वे बेला टार एवं उनकी पत्नी ऐग्नेस हेरनस्की (कई फ़िल्मों की सह-निर्देशक भी) के साथ इस पर फ़िल्म बनाना चाहते थे। बेला टार हंगेरियन फ़िल्मी दुनिया में पसंद नहीं किए जाते थे, कम्युनिस्ट प्रशासन के अंतर्गत ‘सेटनटैंगो’ पर फ़िल्म बनाने की अनुमति नहीं मिली। लाज़लो ने सोचा बात खत्म। पर ऐग्नेस उन्हें छोड़ने वाली नहीं थीं। उसने कहा, वे एक नई स्क्रिप्ट तैयार करें, यदि ऐसा नहीं किया, तो बेला आत्महत्या कर लेंगे। हालाँकि उनके अनुसार यह उन्हें फ़ाँसने की उसकी एक चाल थी। तो पहले ‘डेम्नेशन’ बनी। फ़िर ‘सेटनटैंगो’ (3 पुरस्कार), द टुरिन होर्स’ (7 पुरस्कार), ‘द मेलंकली ऑफ रेज़िस्टेंस’ (5 पुरस्कार) बनी। बाकी दो फ़िल्मों की उन्होंने केवल स्क्रिप्ट लिखी। ‘द मैन फ़्रॉम लंडन’ जॉर्ज्स सिमेनॉन के काम पर आधारित है। लाज़लो के अनुसार अब वे बेला टार के साथ नहीं हैं, क्योंकि हंगरी में फ़िल्म बनाना आसान नहीं रह गया है, आर्थिक सहायता मिलना मुश्किल है।

अभी हाल में मैंने ‘द टुरिन होर्स’ देखी। इसकी अन्य सिनेमैटिक विशेषताओं के अलावा इसे देखते हुए मुझे प्रेमचंद के ‘कफ़न’, ‘वेटिंग फ़ॉर गोदो’ की झलक मिली। मार्केस के लेखन की याद आई। बेला टार एवं एवं उनकी पत्नी ऐग्नेस हेरनस्की ने मिल कर इसे निर्देशित किया है। छ: दिन निरंतर चल रही तूफ़ानी हवा के बीच चलती फ़िल्म को देखना एक बारगी मार्केस के यहाँ होने वाली लगातार बारिश की याद दिलाता है। अपंग पिता एवं बेटी के लिए कहीं निस्तार नहीं है। फ़िल्म एक तगड़े घोड़े से प्रारंभ होती है, जो स्वयं एक मजबूत किरदार है, पता नहीं क्यों फ़िल्म में उसे बीच रास्ते छोड़ दिया जाता है। एक दिन मालिक से मार खाकर घोड़ा खाना-पीना छोड़ देता है, वह भी उससे काम लेना छोड़ देता है। बेटी उसे घास खाने, पानी पीने का आग्रह करती है, मगर वह टस-से-मस नहीं होता है। वे जानते हैं, इसी के साथ उनकी बर्बादी शुरु हो गई है। बर्बादी देख चिली की फ़िल्म ‘मचूगा’ याद आई। अंत में एक रोशनी जलती देख, ‘राम की शक्ति पूजा’ का स्मरण हो आया, लगा शायद नकारात्मक शक्ति हार जाएगी, तूफ़ान-बर्बादी रुक जाएगी। पर वह भी बुझ गई। लेकिन पात्रों की जिजीविषा माननी पड़ेगी, वे संघर्ष करना नहीं छोडते हैं। ठीक वैसे ही जैसे ‘चेजिंग होमर’ का अंत है। बेला टार सामान्य मनुष्य की गरिमा की बात करते हैं। यही लाज़लो का भी प्रतिपाद्य है।
उनके इंग्लिश अनुवादक जॉर्ज सियरटिस के अनुसार क्रासनाहोरकाई का प्रमुख सार है, कुचक्र, अपराध, बेवफ़ाई, भाग निकलने की आशा और सबसे ऊपर विश्वास एवं निरंतर विश्वासघात। उनके अनुसार ‘सेटनटैंगो’ (जिसे बेला टार का मास्टरपीस कहा जाता है) के केंद्र में शराब पीकर किया गया शैतान का नृत्य है, कभी टैंगो के संदर्भ में, कभी चारडास (हंगेरियन नृत्य) के रूप में है। यह नृत्य स्थानीय सराय में चल रहा है, जहाँ पीकर सब धुत हैं।… ब्रह्मांड के नगण्य, छोटे-से किसी कोने में, कॉमिक तथा ट्रैजिक के बीच खोई हुई, उनकी दुनिया खड़ी है। यहाँ मृत्यु का नृत्य है।’

NDFF के फेसबुक पेज से…
बेला टार के निधन के साथ ही विश्व सिनेमा ने एक ऐसी आवाज़ खो दी है जिसने परदे पर ‘समय’ और ‘दुख’ को एक नयी परिभाषा दी।
हंगरी के फिल्मकार बेला टार की 1994 की फिल्म ‘Sátántangó’ (सेटनटैंगो) को आज के दौर के सिनेमा का ‘माउंट एवरेस्ट’ माना जाता है। 7 घंटे की यह महान कृति मानवीय पीड़ा और हंगरी के ग्रामीण इलाकों में सोवियत युग के पतन की एक ऐसी कहानी है, जिसे हमेशा याद रखा जाएगा। तार्कोवस्की (Tarkovsky) जैसे दिग्गजों की तरह, बेला टार का कैमरा दर्शकों को उस खालीपन और बर्फीली दुनिया के भीतर ले जाता था जहाँ वक्त ठहर सा जाता है।
इंसान के संघर्ष और जीवन की सच्चाई को दिखाने वाली उनकी एक और फिल्म The Turin Horse (2011) पूरी दुनिया में दर्शकों पर असर डाला था।
खुद को अराजकतावादी (anarchist) कहने वाले बेला टार न केवल एक नास्तिक थे, बल्कि वे संकीर्ण राष्ट्रवाद के भी कट्टर आलोचक रहे। वे अपनी बात कहने में कभी नहीं हिचकिचाए—चाहे वह सिनेमा हो या राजनीति। 2016 के एक इंटरव्यू में उन्होंने डोनाल्ड ट्रम्प को ‘अमेरिका के लिए शर्म’ तक कह दिया था।
साल 2022 में अपनी आखिरी भारत यात्रा के दौरान उन्हे केरल (IFFK) में ‘लाइफटाइम अचीवमेंट’ सम्मान प्रदान किया गया था। इस दौरे में उनकी मेंटरशिप में FTII पुणे में युवा फिल्मकारों के लिए मास्टरक्लास का भी आयोजन किया गया था। उनकी सबसे बड़ी सीख यही थी कि फिल्मकार सिर्फ कहानीकार ही नहीं होते बल्कि सिनेमा की भाषा का संरक्षण करने वाले भी होते हैं।
अलविदा बेला टार! आपका सिनेमा और नई पीढ़ी को इन मौकों पर आपसे मिली सीख… समझ, नए दौर का नया सिनेमा रचने में एक प्रकाश स्तंभ की तरह काम करेगा।
