
किसी शहर के लिए सिनेमाघर सिर्फ कंक्रीट की इमारत नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक धड़कन और सामूहिक यादों का एक संदूक होता है। जब एक पुराना सिनेमाघर टूटता है, तो शहर की शख्सियत का एक हिस्सा हमेशा के लिए खामोश हो जाता है। काबुल का मशहूर सिनेमाघरआरियाना सिनेमा इस महीने बे-वजूद हो चुका है। आरियाना का तोड़ा जाना केवल एक इमारत का गिरना नहीं है, बल्कि अफ़गानिस्तान की उस सामूहिक स्म़ृति (Collective Memory) का मिट जाना है जो उसे उसकी अपनी जड़ों और बाहरी दुनिया से जोड़ती थी। प्रस्तुत है आशीष के सिंह का एक आलेख, जो एक पत्रकार और फिल्म समीक्षक हैं। वो गैरलाभकारी संस्था न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन के फाउंडर-जनरल सेक्रेटरी भी हैं।

Cinema has created a huge record of time, memories of people of many nations, many communities. Cinema is garland of memories. – Goutam Ghose
कला-कलाकारों, रचनात्मकता और संस्कृति को लगातार हतोत्साहित कर रहे देश अफगानिस्तान में अब कला और मनोरंजन की निशानियां भी निशाने पर हैं। इसी महीने की 16 तारीख काबुल के लिए एक युग के अंत की शुरुआत लेकर आई…। जब बुलडोजरों ने मध्य काबुल की ऐतिहासिक इमारत ‘आरियाना सिनेमा’ की दीवारों पर प्रहार किया, तो वह केवल ईंट और गारे का ढहना नहीं था। वह उन हज़ारों यादों, ठहाकों और नम आँखों का मलबे में तब्दील होना था, जिन्होंने साठ के दशक से उस अंधेरे हॉल में एक साथ साँस ली थी।
आरियाना, जो एक सिनेमाघर था…
1960 के दशक में जब आरियाना सिनेमा नाम के इस सिनमा हॉल ने पहली बार अपने दरवाज़े खोले थे, तब काबुल को ‘मध्य एशिया का पेरिस’ कहा जाता था। वह एक ऐसा अफ़गानिस्तान था जो आधुनिकता की नई इबारत लिख रहा था। आरियाना सिनेमा उस दौर की प्रगतिशील चेतना का मंदिर था। वहाँ की मखमली लाल कुर्सियों पर बैठकर अफ़गान युवाओं ने न केवल हॉलीवुड का एक्शन देखा, बल्कि भारतीय सिनेमा के किरदारों में अपनी ज़िंदगी के अक्स भी तलाशे.. एक जज़्बाती राब्ता कायम किया। अमिताभ बच्चन की आवाज़ और बॉलीवुड के गानों ने उस दौर के काबुल को वह सुकून दिया, जो युद्ध की कड़वाहट कभी नहीं दे पाई।

आरियाना का यह अंत किसी प्राकृतिक आपदा या युद्ध की देन नहीं, बल्कि नई सत्ता की सोच का नतीजा है। 2021 में अफ़गानिस्तान की सत्ता पर दोबारा काबिज़ होने के बाद, तालिबान सरकार ने इस्लामी कानूनों की अपनी सख्त व्याख्या लागू की, जिसमें मनोरंजन के अधिकांश साधनों पर पाबंदी लगा दी गई। यह पहली बार नहीं था; 1996 से 2001 के अपने पिछले शासन के दौरान भी तालिबान ने सिनेमाघरों पर ताले जड़ दिए थे और कलात्मक अभिव्यक्ति को पूरी तरह कुचल दिया था। आज के दौर में भी, सत्ता संभालते ही उन्होंने सिनेमाघरों को जारी रखने पर रोक लगा दी। अधिकारियों का कहना है कि शानदार लाल सीटों वाले सिनेमाघर की जगह पर एक नया ‘शॉपिंग कॉम्प्लेक्स’ बनाया जाएगा। एक कला केंद्र का व्यावसायिक परिसर में बदलना यह बताता है कि नए शासन में रचनात्मकता और सामुदायिक मनोरंजन के लिए कोई जगह नहीं बची है।

सिनेमाघर: शहर की संस्कृति और संवेदना की धड़कन
किसी भी शहर के लिए एक सिनेमा हॉल महज़ एक व्यापारिक केंद्र नहीं होता। यह एक ऐसी जगह होता है, जहां मनोरंजन और पर्दे की सपनीली दुनिया दर्शकों से सामूहिक संवाद करते हुए एक अलग तरह का लोकतंत्र, एक सामूहिक स्मृति रचती है… जो उन्हे सांस्कृतिक और भावनात्मक रूप से समृद्ध भी करती है और जोड़ती भी है। सो जब एक सिनेमा हॉल टूटता है, तो शहर की वह साझा संवेदना भी बिखर जाती है।

फिल्मकार फेडरिको फेलिनी ने कभी कहा था कि “सिनेमा एक जादुई दर्पण है।” आरियाना वह दर्पण था जिसमें काबुल ने खुद को मुस्कुराते हुए देखा था। आज वह दर्पण टूट चुका है। काबुल की हवाओं में अब उस मलबे की धूल है, जिसमें दशकों का संगीत, तालियाँ और हज़ारों कहानियाँ दफ़्न हो चुकी हैं। शॉपिंग मॉल की चमचमाती दीवारें शायद कभी वह गर्माहट न दे पाएँ, जो आरियाना की उन पुरानी कुर्सियों में थी।
मशहूर ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी ने कभी कहा था- ‘सिनेमा एक ऐसी इबादतगाह है जहाँ रोशनी और साये मिलकर सच बोलते हैं। जब हम एक थिएटर में साथ बैठते हैं, तो हमारी धड़कनें एक ही लय में बजती हैं। यह वह जगह है जहाँ इंसान अपनी इंसानियत को दोबारा खोजता है।‘
बदलती तकनीक, बदलती जीवनशैली और बदलते साधनों वाली दुनिया में हो सकता है ये सिर्फ एक तेज़ी से बीत रहे युग भर का सच रह जाए… लेकिन जब हर शहर, हर समाज कमोबेश एक जैसे नहीं हुआ करते थे… तब छोटे शहरों में सिनेमा हॉल ही वह पहली जगह हुआ करता था जो बच्चों और युवाओं को यह बताता था कि दुनिया उनके शहर की सीमाओं से कहीं बहुत बड़ी और सुंदर है।
‘सिनेमा पैराडिसो’ की राह पर ‘आरियाना’
ये बातें करते-लिखते ज़ेहन में कहीं इटैलियन फिल्मकार जुसेपे टोरनाटोर (Giuseppe Tornatore) की कालजयी फिल्म ‘सिनेमा पैराडिसो’ (Cinema Paradiso) के दृश्य बरबस कौंध जाते हैं, जिसमें एक सिनेमा हॉल और एक बच्चे के रिश्ते की एक खूबसूरत दास्तान है।
फिल्म ‘सिनेमा पैराडिसो’ में सिनेमाघर के डिमोलिशन का दृश्य पर्दे से उतर कर… काबुल शहर के बाशिंदों के जीवन में प्रवेश कर चुका है। काबुलवालों की अनगिनत खट्ठी-मीठी यादों को समेटे आरियाना सिनेमा की इमारत अब मलबे में बदल चुकी है..। लेकिन इसकी यादें काबुल की सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा बनकर हमेशा ज़िंदा रहेंगी। इतिहास गवाह है कि इमारतें गिराई जा सकती हैं, पर वह ‘अहसास’ नहीं मिटाया जा सकता जो बीते छह दशकों में पली-बढ़ी पीढ़ियों ने उस सुनहरे पर्दे के सामने बैठकर जिया था।
