

बासु चटर्जी और हृषिकेश मुखर्जी दो ऐसे नाम हैं, जिन्होने हिंदी सिनेमा में पारिवारिक सिनेमा के लिए एक बिलकुल नई ज़मीन तैयार की.. और ऐसी फिल्में बना दीं जो आजतक गुदगुदाती (महज़ हास्य के संदर्भ में नहीं) हैं। ऐसी ही एक फिल्म थी छोटी सी बात.. निर्देशक बासु चटर्जी थे। 10 जनवरी बासु चटर्जी की सालगिरह होती है और 9 जनवरी के दिन 50 बरस पहले ये फिल्म रिलीज़ हुई थी। इस फिल्म, इसके संगीत और बासु चटर्जी को याद करते हुए सैयद एस तौहीद का ये लेख। सैयद एस तौहीद जामिया मिल्लिया के मीडिया स्नातक हैं। सिनेमा लेखन की शुरुआत पब्लिक फोरम से करने बाद विगत एक दशक से लिख रहे हैं। फिल्मों पर ई-बुक्स एवं पुस्तकें लिखी हैं। फिल्म-विश्लेषण एवं संस्कृति लेखन में निरंतर सक्रिय हैं।
इस जनवरी ‘छोटी सी बात’ ने अपने रिलीज का स्वर्ण जयंती बरस पूरा कर लिया है । पचास साल बाद भी ये फिल्म अपनी सादगी में, अपनी खामोशी में भी क्रांति से कम नहीं जान पड़ती। सत्तर का वो दौर जहां हिंदी सिनेमा तड़क-भड़क वाले ट्रीटमेंट से भरा था, तब बासु चटर्जी ने एक बिल्कुल अलग रास्ता चुना — ‘मिडिल ऑफ द रोड सिनेमा’ की राह बनाई। बासु दा के सिनेमा का कैनवस व्यापक नहीं बल्कि सीमित दायरे का होता था.. छोटे किरदार, रोज़मर्रा की छोटी-बड़ी चुनौतियां… पर कुल मिलाकर एक बड़ी कहानी। बासु दा के किरदार लार्जर दैन लाइफ किरदारों की महिमा बखान ना होकर आम इंसान की जीत की कहानी कहते रहे। उनका बॉम्बे परदे पर केवल एक सेट या बैकग्राउंड भर नहीं था, बल्कि सांस लेता हुआ जीता-जागता शहर सा महसूस होता था।

‘रजनीगंधा’, ‘छोटी सी बात’, ‘पिया का घर’ और ‘बातों बातों में’ जैसी फिल्मों के माध्यम से उन्होने मध्यमवर्गीय संवेदनाओं को परदे पर बखूबी उतारा। वो मध्यमवर्ग जो इस महानगर जैसी देश, काल परिस्थिति के बीच ज़रुरतों और भावनाओं के बीच सामंजस्य की जद्दोजहद कर रहा है। यहां प्यार जादुई रूप से अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे रूप लेता था। जिंदगी का संघर्ष नाटकीय ना होकर वास्तविक था। यह प्रेम महानगर में स्पेस की तंगी, आपाधापी तथा मन के संकोच से उपजा था।
बॉलीवुड की फ़िल्में अक्सर स्टीरियोटाइप रहती हैं। यहां किरदार एवं कहानी अक्सर वास्तविकता से बहुत दूर देखे जाते हैं। लेकिन कभी–कभी कुछ फ़िल्में आम लोगों की कहानियां भी सुनाती हैं। सत्तर के दशक में भी इस तरह की सामाजिक फिल्मों का निर्माण हुआ। इन फिल्मों को इग्नोर नहीं किया जा सकता। पॉपुलर चलन का मानना रहा कि दर्शक कड़वे यथार्थ से बचने अथवा उसे भुलाने के लिए मनोरंजन का रुख करते हैं। लेकिन यह हमेशा सच नहीं।
सत्तर का दशक बदलाव की एक नई लहर लेकर आया। जब रूपहले परदे पर आम चेहरों की कहानियां आई। सिने-प्रेमियों के बीच यह फिल्में काफी सराही गई। बासु चटर्जी, ऋषिकेश मुखर्जी जैसे फिल्मकारों ने सरल सुंदर दिल को छू लेने वाली सामाजिक फ़िल्में बनाई। बासु चटर्जी की बात करें तो ‘छोटी सी बात’ आज भी याद आती है। फिल्म में अमोल पालेकर जैसे नायक को देखना दर्शकों के लिए ताज़गी भरा अनुभव था—जो परदे पर किसी बड़े सितारे के नहीं बल्कि एक आम युवा वाले तेवर ले कर आए थे । लड़कियों से बात करने में संकोच करने वाला, अंतर्मुखी एवं सामान्य युवक। दूसरे शब्दों में कहें तो लार्जर दैन लाइफ़ नायक नहीं था।
विद्या सिन्हा में भी सामान्य युवती के एलिमेंट्स थे। विद्या लेकिन उस दौर की सबसे अलग अभिनेत्री थी। प्रभा का किरदार अरुण जैसी ही दुविधा से जूझ रहा। अमोल पालेकर की तुलना में विद्या के पास हालांकि फ़िल्मी सितारों जैसा सुंदर आकर्षण था। बासु दा ने विद्या सिन्हा के माध्यम से सत्तर दशक के बॉम्बे की एक सरल सुंदर युवती का बिम्ब खींचा।
‘जानेमन जानेमन’ गाने में नायक सिनेमाहॉल में फिल्म देखने गया है। अमोल पालेकर धर्मेंद्र और हेमा मालिनी पर फिल्माए गाने को देखते हुए उसमें डूब सा जाता है। परदे पर किरदारों में पात्र बदल गए। अमोल पालेकर खुद को धर्मेन्द्र की जगह पाते हैं। कल्पना कर रहे कि वही गीत वे विद्या सिन्हा के साथ गा रहे। पूरा गीत अरुण की फैंटसी में चलता है। जो सीक्वेंस ख़त्म होते ही वास्तविकता में लौट आता है। स्थिति यथार्थवादी होने के साथ मनोरंजक भी लगती है। दिल को छू लेने वाले इस गीत को येसुदास और आशा भोंसले ने अपनी आवाजें दी। इसी फ़िल्म से येसुदास की हिंदी फिल्मों में पार्श्व गायन की शुरुआत भी हुई थी, जो शानदार ढंग से सफल रही। ये भी एक अनोखा संयोग है बासु चटर्जी और येसुदास दोनों का ही जन्म 10 जनवरी को हुआ था।
छोटी सी बात के गीतों को योगेश ने लिखा जबकि धुनों से सजाया सलिल चौधरी ने। संभवत: यह सलिल चौधरी की अंतिम फ़िल्म रही। सचमुच बहुत शानदार अंदाज़ में विदाई ली धुनों के एक मसीहा ने। सलिल दा एवं योगेश की जुगलबंदी ने हिंदी फिल्म संगीत को कई यादगार गीत दिए।
गीत – जानेमन जानेमन तेरे दो नयन
गायक – येसुदास, आशा भोंसले
गीतकार – योगेश
संगीतकार – सलिल चौधरी
जानेमन जानेमन तेरे दो नयन
चोरी चोरी ले गए देखो मेरा मन
जानेमन जानेमन जानेमन
तुमसे ही खोया होगा कहीं तुम्हारा मन
जानेमन जानेमन हो जानेमन
सत्तर के दशक मे बड़े बजट की फ़िल्मो के समानांतर कम लागत वाली फ़िल्मों का चलन बढ़ा ,बासु चटर्जी की ‘रजनीगंधा’ और ‘छोटी सी बात’ ऐसी ही फ़िल्मे थी। अमोल पालेकर, विद्या सिन्हा, सलिल चौधरी,योगेश की समानताओं और अन्य एकरुपता के साथ दोनों फ़िल्में एक दूसरे की ‘विस्तार’ सी हैं। योगेश ने ‘न जाने क्यूं होता है यह ज़िंदगी के साथ ’ अभिनेत्री विद्या सिन्हा के उलझन भरे किरदार के लिए लिखा, महानगर मे काम करने वाली महिला की उलझन को इसमे देखा जा सकता है। विद्या उलझन मे हैं कि ‘प्यार’ के रुप मे आए बदलाव का स्वागत किस तरह करे, प्यार को लेकर उन्हे जल्द ही कोई फ़ैसला लेना होगा अन्यथा यह ‘बहार’ गुम हो जाएगी। अमोल पालेकर का अंदाज़-ए-किरदार दीपा के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है, अब दीपा किस तरह अपनी चाहत को अभिव्यक्त करे? योगेश जवाब देते हैं । छोटी सी बात के ‘जानेमन-जानेमन’ मे ‘स्वप्न’ को माध्यम बनाकर विद्या सिन्हा और अमोल पालेकर का ‘रोमांस’ रचा गया… योगेश की एक अन्य सुंदर रचना। बासु दा की रोमांटिक कॉमेडी ‘बातों-बातों मे’ योगेश ने गीतकार अमित खन्ना के साथ काम किया, फ़िल्म के गाने इसका मुख्य आकर्षण रहे। बातों-बातों मे तत्कालीन सिनेमा प्रवाह के ‘मसाला’ से अलग रहकर समुचित गीत, कथावस्तु, चरित्र-चित्रण, निर्देशन के बल पर सफल हुई। फ़िल्म का शीर्षक गीत ‘बातों-बातों मे प्यार हो जाएगा ’ आज भी पुराना नहीं हुआ ।

बासु दा की ‘रजनीगंधा’ योगेश के करियर मे मील का पत्थर रही, लघु बजट मे तैयार हुई यह फ़िल्म सत्तर दशक की ‘कम लागत वाली फ़िल्म थी। रजनीगंधा पर तत्कालीन सिनेमा प्रवाह का कम ही प्रभाव पडा, वह धारा के विपरीत चली और सफ़ल फ़िल्मो की स्टीरियोटाइप ‘परिपाटी’ को ‘सरल कहानी– सरलतम किरदारों से चुनौती दी। ऐसा माना जाता है कि एक ‘बेहतरीन’ फ़िल्म सरल किरदारों की जटिल गाथा एवं जटिल किरदारों की सरल कहानी से बनती है, रजनीगंधा इन ‘मान्यताओं’ मे फ़िट नहीं बैठी मगर फ़िर भी ‘बेहतरीन फिल्में साबित हुई। निर्देशक बासु चटर्जी ने ‘रजनीगंधा’ को अलग पहचान देते हुए सामान्य से दिखने वाले कलाकारों एवं कहानी से प्रेरणा लेकर फ़िल्म बनाई, नवीन प्रस्तुति और विषय-वस्तु से दर्शकों को कोई बहुत आशा नहीं थी।
फ़िल्म जब रिलीज़ हुई तो इसकी क्वालिटी को लोगों ने पहचाना। योगेश के गीतों को भी खूब सराहना मिली, विशेष कर फ़िल्म की कथा सा बयान करता ‘कई बार यूं ही देखा है’ मे उनकी प्रतिभा श्रेष्ठ रही। गायक मुकेश ने योगेश के शब्दों को आवाज़ दी, गायन के लिए उन्हे ‘राष्ट्रीय’ एवं ‘फ़िल्मफ़ेयर’ पुरस्कार’ मिले। सलिल चौधरी ने ‘रजनीगंधा’ के गीतों के साथ नए प्रयोग किया, फ़िल्म के गानों को ‘बैकग्राउंड’ संगीत बनाकर पेश किया। तत्कालीन हिन्दी सिनेमा मे गाने को कहानी के अनिवार्य अंश की तरह लाना नयी बात थी, फ़िल्म के सभी गीतों मे यह तकनीक देखी जा सकती है। सलिल दा यह तकनीक अक्सर अपनाते रहे। सलिल दा के बेहतरीन काम से खुश होकर बासु चटर्जी ने उनके साथ अच्छी जोड़ी बनाई। बासु दा की ‘छोटी सी बात’, ’प्रियतमा’, ’दिल्लगी’, ‘मंज़िल’, बातों-बातों मे’, ‘अपने-पराए’ और ‘शौकीन’ के माध्यम से यह रिश्ता नई मंजिलों तक पहुंचा।
इस दशक में छोटे बजट की पारिवारिक फ़िल्मों का निर्माण शुरू हुआ, जिनमें हिंसा एवं अनावश्यक शोरगुल नहीं था। अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा ऐसी फ़िल्मों के “सितारे” थे। याद करें “रजनीगंधा” और “छोटी सी बात”। दरअसल इन फ़िल्मों को एक–दूसरे का विस्तार के तौर पर देखा गया। इनमें काफी समानता थी। फ़िल्म “छोटी सी बात” का गीत “ना जाने क्यों” तत्कालीन बॉम्बे के सामान्य युवा एवं युवती की प्रेम में पड़ने की मनोस्थिति को दर्शाता है। संकोच एवं झिझक की बात को बताता है।
अमोल पालेकर वही संकोची युवा है। इस गीत में वो अशोक कुमार से प्रेम को एक्सप्रेस करने का क्रैश कोर्स सा ले रहा। किस तरह बिना घबराए किसी लड़की का दिल जीता जा सकता है। दृश्य हास्यास्पद तो है मगर कई पुरुषों की वास्तविक चिंता को भी दर्शाता है। वो अरुण जैसी कमी के कारण लड़कियों से दोस्ती का अवसर खो देते हैं। एक क्लासिक गीत जिसे बार–बार सुना जा सकता है।
गीत – ना जाने क्यों होता है ये ज़िंदगी के साथ बात
गायिका – लता मंगेशकर
गीतकार – योगेश
संगीतकार – सलिल चौधरी
जो अंजान पल
ढल गए कल, आज वो
रंग बदल बदल, मन को मचल मचल
सजे बिना मेरे नैनों में
टूटे रे हाय रे सपनों के महल
ना जाने क्यों, होता है ये ज़िंदगी के साथ
अचानक ये मन
किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद
छोटी छोटी सी बात, ना जाने क्यों
यह छोटी सी बात अरुण की जिंदगी में आई नई चीजों का गीत है। एक बैकग्राउंड गीत जिसे मुकेश ने आवाज़ दी। फिल्मांकन अमोल पालेकर पर हुआ। अरुण ने एक आम युवक की भूमिका निभाई—ऐसा किरदार जिससे आम दर्शक आसानी से जुड़ाव कर लेता है। अरुण से हमेशा उसके साथ वाले आसानी से जीत जाते हैं। अशोक कुमार,एक अनुभवी मेंटर की भूमिका में हैं। मेंटर से मिले ज्ञान सीखने के बाद अरुण अपनी चुनौतियों पर हावी होने का मंत्र जान जाता है। अरुण को आत्मविश्वासी बनते इसी गीत में दिखाया गया है। एक प्यारा गीत जिसे सुंदर ढंग से फिल्माया गया। बार–बार देखने सुनने पर भी उदासीन नहीं होता आदमी।
ये दिन क्या आए
लगे फूल हँसने
देखो बसंती–बसंती
होने लगे मेरे सपने
गीत: यह दिन क्या आए
गायक : मुकेश
गीतकार योगेश
संगीतकार : सलिल चौधरी
फ़िल्म छोटी सी बात का संगीत मिडिल ऑफ द रोड परंपरा का बेहतरीन उदाहरण है। सत्तर के दशक की मसाला फ़िल्मों के भव्य एवं नाटकीय संगीत के विपरीत, फिल्म का संगीत आत्मीय, सहज तथा आम मुंबईकार की रोज़मर्रा से गहराई से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।
ना जाने क्यों गीत फ़िल्म का भावनात्मक केंद्रबिंदु सा लगता है। सलिल चौधरी ने कमाल का अहसास दिया। स्ट्रिंग्स और पियानो का इस्तेमाल करके सरल किंतु अपने दौर की यादगार धुन बनाई। योगेश की कविताई देखें…ना जाने क्यों होता है ये ज़िंदगी के साथ, अचानक ये मन किसी के जाने के बाद, करे फिर उसकी याद, छोटी छोटी सी बात—मानव मनोविज्ञान के एक खास इफेक्ट को बखूबी बयां करता है ।
जानेमन जानेमन गाने की वॉकिंग बेसलाइन दिल की धड़कन की गति से बढ़ता है। चहलकदमी सा करता लयात्मक उछाल। गाना सत्तर दशक के सरल संकोची युवा के प्रेम एवं उसकी अभिव्यक्ति को समझने का एक रिफरेंस बन सा गया।
ये दिन क्या आए गाना अरुण के जीवन में परिवर्तन के उत्सव की तरह आता है। वह एक हतोत्साहित युवक के दायरे से बाहर निकलकर आत्मविश्वासी आदमी बनके उभरता है। अरुण के मेंटर कर्नल जूलियस नागेंद्रनाथ ने प्रेम में सफल होने की बारीकियां सिखा दी हैं। मुकेश का स्वर उदास या भावुक गीतों के लिए होता आया। किंतु इस गाने में सलिल चौधरी ने मुकेश को जीवन की हलचल भरा गीत दिया। दरअसल मुकेश हर किस्म के रेंज के फनकार थे जिसे बासु दा एवं सलिल दा ने यह रेखांकित किया।
