

भारत में सिनेमा के आने के बाद दो दशक के भीतर कई फिल्म स्टूडियो बन गए थे, जिनकी वजह से भारतीय सिनेमा आज इतना बड़ा उद्योग बन पाया है। इनमें भी तीन स्टूडियो का विशेष रुप से ज़िक्र होता है- मुंबई का बॉम्बे टॉकीज़, कोलकता का न्यू थिएटर्स और पुणे की प्रभात फिल्म्स। इस साल 10 फरवरी को न्यू थियेटर्स को बने 95 बरस पूरे हो गए। न्यू थिएटर्स और इसके संस्थापक बीरेंद्रनाथ सरकार के ऊपर एक दिलचस्प आलेख पेश कर रहे हैं कोलकाता में रहने वाले सैयद एस तौहीद। सैयद एस तौहीद जामिया मिल्लिया के मीडिया स्नातक हैं। सिनेमा लेखन की शुरुआत पब्लिक फोरम से करने बाद विगत एक दशक से लिख रहे हैं। फिल्मों पर ई-बुक्स एवं पुस्तकें लिखी हैं। फिल्म-विश्लेषण एवं संस्कृति लेखन में निरंतर सक्रिय हैं।
फरवरी का महीना न्यू थियेटर्स के चाहने वालों के लिए ख़ास दिन लेके आता है.. उस दौर की, उस दुनिया की यादें लेकर आता है, जब भारतीय सिनेमा की नींव पड़ रही थी। तीस के दशक में न्यू थियेटर्स, टॉलीगंज, कलकत्ता में इसी महीने प्रसिद्ध न्यू थिएटर्स की स्थापना हुई थी। न्यू थियेटर्स में बांग्ला, हिंदी तथा कुछ तमिल फिल्में बनाई गईं। बी एन सरकार ने किसी रोज़ सिनेमाघर के बाहर लोगों की लंबी कतार देखी और फिर हमेशा के लिए उसी राह के हो गए। एक सिनेमाघर के निर्माण से शुरू हुआ सफ़र फिल्मों के जुनून तक गया। सरकार परिवार एक प्रतिष्ठित परिवार था। प्यारे चरण सरकार उन्नीसवीं सदी के शिक्षाविद् थे। बेटे जे.एन. सरकारी बैरिस्टर थे। पोते एन.एन. सरकार बंगाल के एडवोकेट-जनरल बने। इसी प्रतिष्ठित सरकार परिवार में एन. एन. सरकार के पुत्र के तौर पर बीरेंद्र नाथ सरकार का जन्म हुआ। कलकत्ता के एलगिन रोड पर बी एन सरकार का जो पुश्तैनी घर था, उसके ठीक बगल में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का घर था, जो आज नेताजी भवन के नाम से एक हेरिटेज साइट और म्यूज़ियम के तौर पर जाना जाता है। बोस और सरकार परिवारों में काफी घनिष्ठता भी थी।

बहरहाल बंगाल के एडवोकेट-जनरल के बेटे बी.एन. सरकार लंदन से इंजीनियरिंग पढ़कर आए थे। लौटने पर उन्हे एक सिनेमाघर बनाने का कॉन्ट्रैक्ट मिला, लेकिन इसे बनाते-बनाते फिल्मों से ऐसा लगाव हुआ कि कलकत्ता में अपना सिनेमाघर बनाने शुरू कर दिए। पहला सिनेमाघर था चित्र सिनेमा (वर्तमान में मित्रा सिनेमा) जिसका 1930 में उद्घाटन सुभाष चंद्र बोस ने किया। आगे चलकर बी एन सरकार ने फिल्म मेकिंग स्टूडियो ही खोल लिया… न्यू थियेटर्स, कलकत्ता के नाम से। बीरेंद्र नाथ टैलेंट को पहचान कर उन्हें खुद को एक्सप्लोर करने का पूरा मौका देते थे। के.एल. सहगल,पी.सी. बरुआ, पृथ्वीराज कपूर और बिमल रॉय जैसे बड़े नाम न्यू थियेटर्स की खोज माने जाते हैं।
न्यू थिएटर्स की फिल्में अपने बड़े स्टार्स और कहानियों के लिए मशहूर हुई। गुरुदत्त न्यू थिएटर्स के शैदाई थे। जब ‘कागज के फूल’ बनी तो उसमें स्टूडियो की फिल्म को श्रद्धांजलि देता हुआ एक खास सीन रखा गया।
न्यू थियेटर्स एवं बांग्ला भद्रलोक

तीस के दशक में फिल्म उद्योग में काम करने को लेकर पूर्वाग्रह थे। कुलीन घरों के लोग फिल्मों में नहीं आना चाहते थे। एक्ट्रेस का रोल एक्टर्स ही निभाते। अन्ना हरि सालुंके भी एक ऐसे ही एक्टर थे, जिन्होने दादा साहब फालके की फिल्म ‘राजा हरिश्चंद्र’ (1913) में रानी तारामती का महिला किरदार निभाया था। ऐसे दौर में बी एन सरकार प्रचलित धारणा को बदलने के लिए सिनेमा में आए। न्यू थिएटर्स नाम से 10 फरवरी 1931 को फिल्म स्टूडियो की स्थापना की, इसके लोगो में बतौर मोटो लिखा ‘जीवतंग ज्योतिरेतु छायाम्’ यानी ‘प्रकाश जो छायाओं में (अंधेरों में) जीवन भर दे’। तब तक आने वाले समय में न्यू थिएटर्स में प्रतिभाओं का ऐसा संगम हुआ जिसने इतिहास बदल कर रख दिया। कई दिग्गजों ने न्यू थिएटर्स में रहकर भारतीय सिनेमा के आरंभिक स्वरूप को गढ़ा। गुरुदेव रविंदनाथ टैगोर को सिनेमा की ओर लाने का बड़ा काम बी.एन. सरकार ने किया था। सरकार उत्तरी कलकत्ता में अपने पहले सिनेमाघर के उद्घाटन पर तत्कालीन कलकत्ता कॉर्पोरेशन के मेयर और लोकप्रिय नेता सुभाष चंद्र बोस को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था। न्यू थिएटर्स की इन हाउस मैगजीन ‘चित्रा’ में स्वदेशी भावनाओं की बात होती थी। इसमें छपे लेख में भारतीय निर्माताओं से पश्चिम से आयातित तकनीक पर निर्भरता कम करने का आह्वान किया गया । यह अपील की गई कि देश के निर्माताओं को साथ आना चाहिए और इस संबंध में अनुसंधान संस्थान कायम करने की पहल लेनी चाहिए। यह लेख रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा शुरू किए गए आंदोलन की याद दिला गया। गुरुदेव का न्यू थिएटर्स से रिश्ता, सिनेमा की एक बहुचर्चित कहानी है। टैगोर दरअसल अपने नाटक के मंचन के लिए कलकत्ता आए थे। नाटक की जबरदस्त सफलता ने न्यू थिएटर्स को इस पर फिल्म बनाने को प्रोत्साहित किया। बीरेंद्रनाथ के अनुरोध पर, फिल्मांकन की अनुमति मिल गई। कलकत्ता में पोस्टर, हैंडबिलों के साथ फिल्म का जोरदार प्रचार किया गया। रिलीज हुई। हालांकि व्यावसायिक उम्मीद पर खरी नहीं उतरी। इस परियोजना को न्यू थिएटर्स के यादगार प्रकरण तौर पर याद किया जाता है।
गुरुदेव ने डायरेक्ट की न्यू थिएटर्स की फिल्म! <—Click this to read more

रवीन्द्रनाथ टैगोर के साथ आने से बी.एन. सरकार की भद्र पुरुष वाली प्रतिष्ठा बनी। न्यू थिएटर्स की पहचान ‘भद्रलोक बंगाल’ के साथ जुड़ी थी, यह तीस दशक के ‘इंडियन सिनेमैटोग्राफ ईयर बुक’ से स्पष्ट हो जाता है। इस पुस्तक में बी एन सरकार की प्रशंसा की गई। इसी तरह बम्बई के प्रमुख फिल्म निर्माताओ से जुड़े व्यक्ति ने कहा… बी.एन. सरकार से व्यक्तिगत रूप से मिलने पर मुझे एहसास हुआ कि वो एक तर्कसंगत व्यक्ति हैं। निष्पक्ष और न्याय के प्रति जागरूक । मेरी फिल्म सिनेमाघर में चल रही है। बी एन सरकार ने मुझे न्यू थियेटर्स की फिल्म से बेहतर शर्तें दी। जिस निर्णायक तत्व ने न्यू थिएटर्स को बंगाल में भद्रलोक का आइकॉन बनाया, वह एक व्यावसायिक संस्था के रूप में इसकी सफलता को बताता है । तीस का दशक भद्रलोक के लिए अन्य कारणों से भी कठिन था। इस क्षेत्र की आर्थिक शक्ति बंगाली उद्यमियों के हाथों से निकलकर मारवाड़ियों के पास चली गई। हालात को देखते हुए भद्रलोक ने सिनेमा की राह पकड़ी। सिनेमा मध्यमवर्गीय बंगालियों की कल्पनाओं में जगह बनाने लगा। सांस्कृतिक अभिजात्यवाद तथा आर्थिक राजनीतिक निराशा के बीच, न्यू थिएटर्स ने बंगाल के भद्रलोक को स्वाभिमान और आत्म विश्लेषण का एक आधार दिया। न्यू थियेटर्स की चर्चा दरअसल बांग्ला भद्र लोक अर्थात् बेहतर जीवन जीने के तरीके की भी चर्चा है।
बंगाल की लाइफ स्टाइल में सिनेमा की एंट्री
न्यू थिएटर्स की कहानी एक ऐसा इतिहास है जो भारतीय सिनेमा, विशेष रूप से बांग्ला सिनेमा के सफर को संजीदगी से दर्ज करता है। बीरेन्द्रनाथ सरकार ने इसे लंबे समय तक संभाला। स्पष्ट था कि सरकार ने एक प्रतिस्पर्धी क्षेत्र में कदम रखा था। दोस्तों के साथ साझेदारी से बीस के दशक के आखीर में इंटरनेशनल फिल्म क्राफ्ट से पहल की। न्यू थिएटर्स को एक पारिवारिक संस्था के रूप में स्थापित किया गया। सरकार परिवार के सदस्य इससे जुड़े। कंपनी के पास इकाइयां थीं। आर्टिस्ट मासिक वेतन अनुबंध पर काम करते थे। फिल्मों के बेहतर वितरण के लिए सरकार कई वितरकों के पास गए, बाजार बढ़ाया। न्यू थिएटर्स की बांग्ला फिल्मों का बाजार गैर भाषी क्षेत्रों में भी था, शानदार संगीत इसकी वजह बना। ‘चंडीदास’ के सुपरहिट गाने बिहार में लड़के-लड़कियों की जुबान पर थे। बंगाल का ‘रवींद्र संगीत’ सरहदें लांघ कर लोकप्रिय हो रहा था। न्यू थिएटर्स ने रवींद्र संगीत को लोकप्रिय बनाया। न्यू थिएटर्स का सबसे बड़ा बाजार पूर्वी भारत था। चालीस दशक में स्टूडियो की फिल्में कलकत्ता के अलावा बंगाल, बिहार, उड़ीसा, असम और पूर्वोत्तर के इलाकों में दिखाई जा रही थीं।
कलकत्ता में संचालित यह केवल स्टूडियो मात्र नहीं था। यह एक व्यवस्था थी, जहां काम करना जीने का एक तरीका हुआ करता था। सरकार ने एक प्रणाली बनाई जो सेल्यूलॉयड के सपने लोगों के सामने रखती थी। बी. एन. सरकार को याद करते हुए कानन देवी ने कहा था… जब मुझे ‘देवदास’ का प्रस्ताव मिला, उत्साह होने के बावजूद उसे स्वीकार नहीं कर सकी। अफसोस। उमा शशि ने भी कहा था…. न्यू थिएटर्स में होकर आर्टिस्ट खुद की तुलना एक सुखी परिवार से करते थे। एक एक्सटेंडेड परिवार का हिस्सा हुआ करता था। स्टूडियो में सद्भावना तथा काम के प्रति सकारात्मक माहौल था। परियोजनाएं हमेशा वक्त पर पूरी होती थीं।
न्यू थिएटर्स ने की प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत
टॉकी दौर भारतीय सिनेमा में बड़ा बदलाव लेकर आया। ऑडियो तकनीक आने के बाद फिल्मों में डायलॉग्स और संगीत की अवधारणा आई। न्यू थियेटर्स ने इसमें प्लेबैक सिंगिंग का अध्याय जोड़ा। यानी गानों पर लिप सिंकिंग करने का सफल प्रयोग किया। नई तकनीक में संगीत को पहले ही स्टूडियो में रिकॉर्ड कर लिया जाता था, और फिर शूटिंग के समय यह सीन एंड सिचुएशंस के साथ ऐसा जोड़ दिया जाता कि इस तरकीब का पता भी नहीं चलता था औ देखने वाला कमाल कह उठता था। इससे पहले सिंगर्स और एक्टर्स को कैमरे के सामने ही गाना पड़ता था । संगीत वहीं साथ में रहता था। लेकिन संगीतकार कैमरे के दायरे से बाहर रहते थे। सो भारतीय सिनेमा में प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत न्यू थिएटर्स की एक बड़ी सौगात है।
भारतीय सिनेमा में पहली बार क्लोज़ अप शॉट का इस्तेमाल! <– Click to read more

तीस के दशक में बंगाल फिल्म इंडस्ट्री का एक बड़ा हिस्सा मादन थिएटर्स के कब्ज़े में था… जिसकी स्थापना जमशेदजी फ्रामजी और उनके साथी कन्हैयालाल कौशिक ने 1919 में की थी। उस समय उनके पास देशभर में 127 थिएटर्स थे और देश के बॉक्स ऑफिस का आधा हिस्सा उसके नियंत्रण में था। मूक सिनेमा के दौर में मादन थिएटर्स की फिल्में खूब लोकप्रिय हुईं और खूब कमाई भी की। 1937 तक मादन थिएटर्स ने कई लोकप्रिय और ऐतिहासिक फिल्मों का निर्माण किया। न्यू थियेटर्स जब आया तो इसके फिल्मों की एक बड़ी ताकत संगीत बना। पंकज मलिक, राय चंद बोराल जैसे दिग्गजों ने ‘रवींद्र संगीत’ को शांतिनिकेतन से निकाल कर जन-जन तक पहुंचा दिया।
बी.एन. सरकार सिनेमा में सम्मान और प्रतिष्ठा लाना चाहते थे। बांग्ला साहित्य के बड़े लेखकों की रचनाओं पर फिल्में बनाने की पहल की। फिल्मों को सामाजिक बदलाव का उपकरण बनाया। न्यू थियेटर्स का सफर खूब शानदार चल रहा था। हालात बदले तो चालीस के दशक में अकाल, युद्ध, सांप्रदायिक दंगों तथा विभाजन की वजह से फिल्म उद्योग प्रभावित हुआ। तीस-चालीस दशक में न्यू थियेटर्स का सितारा बुलंदियों पर था। मगर बंटवारे के बाद फिल्मों का बाजार सिमट गया। कलाकारों का बड़े स्तर पर पलायन भी हुआ। न्यू थियेटर्स की चकाचौंध फीकी पड़ने लगी।
न्यू थिएटर्स और इसके दिग्गज सितारे
विरासत के तौर पर देखें तो न्यू थियेटर्स ने कई सितारे बनाए। सबसे बड़ी खोज, तीस और चालीस दशक के कल्ट सिंगर-एक्टर के एल सहगल थे। सहगल ने अपनी टाइमलेस सिंगिंग स्टाइल को अमर कर दिया। जब उन्हें देखते हैं तो इस विशेषता के साथ सहगल की झोली में कला के रंग देखने को मिलते हैं। सहगल को संगीत ने बचपन से ही प्रभावित किया था, स्कूल जाने की उम्र में रामलीला में जाया करते थे। फिर जम्मू के सूफी संत सलामत यूसुफ से खूब लगाव रहा। बड़े हुए तो पढ़ने-लिखने के बाद रोजगार की तलाश में देश के कई शहरों में घूमे। कलकत्ता और दिल्ली जाने का मौका भी मिला। पहली नौकरी कलकत्ता में लगी थी सहगल की। लेकिन इतिहास कुछ और ही लिखा जाना था। न्यू थियेटर्स और बीएन सरकार ने उनकी जिंदगी बदल दी।

न्यू थियेटर्स ने फिल्म संगीत में सहगल के साथ साथ देवकी बोस, नितिन बोस, पी सी बरुआ, पंकज मलिक, बिमल राय, फ़णी मजुमदार, आर सी बोराल, कानन देवी, जमुना, लीला देसाई और पहाडी सान्याल जैसे कलाकारों की परम्परा शुरू की। देवकी बोस न्यू थियेटर्स के एक सफ़ल निर्देशक रहे, उनके निर्देशन मे सहगल ने कई महतवपूर्ण फिल्मों में काम किया। चंडीदास, पूरन भगत, विद्यापति जैसी फ़िल्मो ने खूब नाम कमाया। देवकी बोस की ‘सीता’ ‘वेनिस फ़िल्म सामारोह’ मे प्रदर्शित की जाने वाली पहली भारतीय फ़िल्म बनी थी।
न्यू थिएटर्स दिग्गजों से भरा संस्थान था। के.एल. सहगल, जमुना देवी, पहाड़ी सान्याल और लीला देसाई जैसे कुछ कलाकार न्यू थिएटर्स की खोज थे। वहीं पी सी बरुआ, कानन देवी,उमा शशि मेन स्टार्स के रूप में उभरे। पृथ्वीराज कपूर रंगमंच और परदे पर नाम बना चुके थे। न्यू थिएटर्स की स्टार्स लिस्ट में नितिन बोस और देवकी बोस, मुकुल बोस, पंकज मलिक, आर सी बोराल, तिमिर बरन तथा के.सी. डे भी शामिल थे। कहने की जरूरत नहीं कि यह एक ऐसा समूह था जहां टकराव के कई मौके आए।
पी सी बरुआ का एक मतभेद हुआ भी। न्यू थिएटर्स में बरुआ की पहली फिल्म ‘रूपलेखा’ थी। फिर ‘देवदास’ को बांग्ला एवं हिंदी में बनाया। बरूआ ने न्यू थियेटर्स के साथ विलय का प्रस्ताव रखा। व्यवहारिक ना होने कारण यह हो नहीं पाया। बरुआ हालांकि फिल्मकार के अनुबंध के साथ न्यू थिएटर्स से जुड़ गए। बरुआ ने बड़ी फिल्मों का निर्देशन किया: ‘मंजिल’ ‘मुक्ति’ ‘अधिकार’ ‘रजत जयंती’ और ‘जिंदगी’ । बाद में बरुआ ने न्यू थिएटर्स छोड़ दिया। अपने-अपने कारणों से कानन देवी और नितिन बोस भी चले गए। कानन देवी ने कहा था… न्यू थिएटर्स क्यों छोड़ा, इस पर टिप्पणी करना संभव नहीं है। मैं अपनी मर्जी से बाहर आई। जब मैं स्टूडियो में थी, तो ऐसा लगता था मानो घर में हूं। पंकज मलिक ने भी अपने कारण से न्यू थिएटर्स से दूरियां बना ली।
न्यू थियेटर्स की ‘मोहब्बत के आंसू’ से अपना फ़िल्मी कैरियर शुरु करने से लेकर अंतिम ‘ज़िंदगी ‘तक सहगल हालांकि न्यू थियेटर्स में रहे और उन्होने न्यू थियेटर्स के साथ लम्बा सफर तय किया। न्यू थिएटर्स से जुड़े कई कलाकारों की तरह सहगल भी बेहद सफ़ल साबित हुए। सहगल की पहली तीन फिल्में ‘मोहब्बत के आंसू’ , ‘सुबह का सितारा’ और ‘ज़िंदा लाश’ हालाकि बहुत कमाल दिखा नहीं पाई, लेकिन बी एन सरकार ने हिम्मत रखी और ‘चंडीदास’ में सहगल को फिर कास्ट किया। ‘चंडीदास ‘ को बड़ी कामयाबी मिली । फिल्म ने सहगल को रातों-रात बड़ा स्टार बना दिया ,जिसकी गूंज ‘यहूदी की लडकी’ और बाद की फिल्मों मे सुनी गई। नितिन बोस की ‘चंडीदास’ तथा सहगल की ‘प्रेसीडेंट’ और ‘धरती माता’ सफल फिल्में थी। ‘प्रेसीडेंट’ की कहानी कारखानों मे काम करने वाले मजदूरों के जीवन पर आधारित थी जबकि ‘धरती माता’ ने खेत-खलिहान-किसान को विषय बनाया।
जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर कुंदन लाल सहगल! <– Click to read more

पूर्वोत्तर से आए पीसी बरुआ भी न्यू थिएटर्स से जुड़े थे। बरुआ ने ‘देवदास’ बांग्ला, हिन्दी एवम असमिया में बनाई। बांग्ला संस्करण में शीर्षक किरदार स्वयं बरुआ ने अदा किया, जबकि हिन्दी में सहगल देवदास बने थे । बरुआ के निर्देशन में बनी देवदास कंपनी की एक टाइमलेस फिल्म है। बरुआ ने ‘देवदास’ को तीन भाषाओ में बना कर इतिहास रच दिया। देवदास के अलावा मुक्ति, अधिकार, ज़िंदगी और मंजिल बरुआ की न्यू थियेटर्स के लिए महत्वपूर्ण फ़िल्मे रहीं।
देवदास के संस्करणों से पी.सी बरुआ एवं सहगल शोहरत की बुलन्दियों पर पहुंच गए । सहगल की ‘देवदास’ से बिमल राय को भी प्रेरणा मिली। अरसे बाद संजय लीला भंसाली ने भी देवदास बनाई। अनुराग कश्यप भी देव-डी के नाम से देवदास का एक आधुनिक वर्जन लेकर आए। शरत चंद्र का कैरेक्टर ‘देवदास’ बरुआ एवं सहगल की एक्टिंग की मिसाल बन गया। इसकी गूंज बाद की हिट फिल्मो प्रेसीडेंट ,स्ट्रीट सिंगर तथा जिंदगी में नज़र आई। बड़े स्टार हो चुके सहगल ने अब कलकत्ता के साथ फिल्म निर्माण के बाकी बड़े केंद्रों मे जाने का मन बनाया। करियर में डेढ़ सौ से ज़्यादा गाने गने वाले सहगल की आवाज में सात सुरों के ‘सरगम’ की गहरी खनक थी। इंद्रधनुष के सात रंगो की बयार को गायकी और भावनाओं में क्या खूब लाते थे।

न्यू थिएटर्स की ‘गंभीर कला’ के 3 अहम पहलू
न्यू थिएटर्स का दौर भारतीय सिनेमा की यात्रा में हमेशा एक मील का पत्थर रहेगा। न्यू थिएटर्स के योगदान को जिन अहम पहलुओं के ज़रिए समझा जा सकता है, उनमें प्रमुख हैं- सिनेमा में साहित्य को स्थान देना, तकनीकी उत्कृष्टता और सामाजिक संदेश। बी.एन. सरकार ने उस दौर में ‘पारसी थिएटर’ की तड़क-भड़क वाली शैली को नकार कर शरतचंद्र चट्टोपाध्याय और बंकिम चंद्र चटर्जी के उपन्यासों को चुना। उनका मानना था कि सिनेमा का स्तर तभी बढ़ेगा जब उसकी जड़ें गंभीर साहित्य में होंगी। ‘देवदास’ (1935) इसका सबसे बड़ा उदाहरण बनी।
न्यू थिएटर्स भारत का पहला ऐसा स्टूडियो था जिसने फिल्म निर्माण को एक ‘संस्थान’ की तरह चलाया। यहाँ कलाकारों को मासिक वेतन मिलता था और उन्हें अभिनय के साथ-साथ संगीत और तकनीक की बारीकियां भी सीखनी पड़ती थीं। मुकुल बोस जैसे साउंड इंजीनियरों ने यहीं ‘प्लेबैक’ तकनीक का आविष्कार कर भारतीय सिनेमा को दुनिया के समकक्ष खड़ा किया।
न्यू थिएटर्स की फिल्में केवल मनोरंजन नहीं थीं। ‘मुक्ति’ (1937) जैसी फिल्मों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समाज के बीच के द्वंद्व को जिस गंभीरता से दिखाया, वह उस समय के सिनेमा के लिए बहुत बड़ी बात थी।
न्यू थिएटर्स पर वक्त का सितम
द्वितीय विश्व युद्ध के साथ ‘न्यू थिएटर्स’ को पहला गंभीर झटका लगा। विभाजन ने मुश्किलें और बढ़ा दीं। कलकत्ता की बांग्ला फिल्मों को पहले स्वाभाविक बाजार मिलता था। विभाजन के बाद स्थिति जटिल हो गई। कलकत्ता में ‘बंगाल मोशन पिक्चर एसोसिएशन’ के अध्यक्ष ने ‘इंडियन टॉकी’ के रजत जयंती स्मारिका में लिखा …रिलीज होने के बाद भी, फिल्मों का उचित दोहन नहीं हो पा रहा क्योंकि उनके अधिकतम उपयोग के लिए पर्याप्त गुंजाइश नहीं है। क्योंकि फिल्मों का बाजार सिमट गया। तालाबंदी की नौबत सामने थी। दरअसल पचास दशक की शुरुआत तक न्यू थिएटर्स के सुनहरे दिन खत्म हो चुके थे। बी. एन. सरकार के पुत्र दिलीप कुमार सरकार के हाथों में बागडोर थी। अदालती मामले एवं वित्तीय संघर्ष के कारण स्टूडियो को तालाबंदी देखनी पड़ी। एक लंबी अदालती लड़ाई के बाद नब्बे के दशक में न्यू थियेटर्स स्टूडियो का संचालन शुरू हुआ। न्यू थिएटर्स की कई दशक पुरानी विरासत रही है। आज यहां बांग्ला फिल्मों का काम होता है। फिलहाल इसकी कमान रामलाल नंदी तथा सौगत नंदी के हाथों में हैं।
