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गोविंद निहलानी के बहाने ‘अर्धसत्य’ की बात

कहीं हम सब जिसे सत्य मानते रहे हैं, सत्याभाष अथवा अर्धसत्य तो नही? किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले एक बार जरूर सोच लेना चाहिए, क्योंकि इधर असत्य का मायाजाल इस कदर बिछ चुका है कि सत्य तो क्या अर्धसत्य तक पहुंच पाना कठिन है।