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TCOTF का सितंबर चैप्टर: सिनेमा, संगीत और अपनी जड़ों की कहानियां

न्यू दिल्ली फिल्म फाउंडेशन (NDFF) के Talk Cinema On The Floor (TCOTF) के सितंबर चैप्टर में सिनेमा, संगीत और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी कहानियों पर सार्थक संवाद हुआ। FTII के पूर्व विद्यार्थी एवं पटकथा लेखक शिरीष शर्मा ने पहली फिल्म के विचार से पटकथा तक के सफर पर अनुभव साझा किए, जबकि उभरते संगीतकार Bodh ने नए Music Chapter की शुरुआत की।

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गुरु दत्त: ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है….

हिन्दी सिनेमा में गुरु दत्त एक ऐसे अदाकार और डायरेक्टर हुए हैं, जिन्हें बहुत कम ज़िंदगी मिली, लेकिन अपनी इस मुख़्तसर-सी ही ज़िंदगानी में वे फ़िल्मी दुनिया को इतना कुछ दे गये कि लोग उन्हें आज भी बड़ी शिद्दत से याद करते हैं। बहुत कम डायरेक्टरों को अवाम की यह मुहब्बत और चाहत हासिल होती है। गुरु दत्त का नाम हिन्दी सिनेमा के इतिहास में सुनहरे हुरूफ़ में दर्ज है।

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शरतचंद्र के150 साल : भारतीय साहित्य का “आवारा मसीहा” जिसने समाज के भीतर के इंसान को देखा

भारतीय सिनेमा के लिए तो शरत चंद्र जैसे देवदास के रूप में एक ऐसा किरदार थमा गये हैं जो फिल्म बनाने वालों , अभिनेताओं और दर्शकों सबका बहुत चहेता नायक है पिछले लगभग सौ सालों से।  उसकी पीड़ा और छटपटाहट से  हमदर्दी न हो ऐसा हो नहीं सकता।       

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रवि राज मुर्मू की आंगेन: संथाली सिनेमा की वैश्विक दस्तक

रवि राज मुर्मू ने अपनी संथाली फ़िल्म ‘आंगेन’ के लिए सर्वश्रेष्ठ नवोदित निर्देशक का पुरस्कार जीता है। अक्सर बचपन में दादी-नानी से सुनी कहानियाँ रचनाकारों केलिए खाद-पानी का काम करती हैं। पूर्वी सिंहभूम जिले के एक छोटे से आदिवासी गांव में पले-बढ़े रवि राज मुर्मू ने भी बचपन में अपने बुजुर्गों से कहानियाँ सुनी थीं।

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TCOTF July Chapter: Visual Storytelling, Delhi Cinema Culture & Four Generations

Thoughts and tips on visual storytelling by acclaimed cinematographer Koustabh Mukherjee, emerged as one of the key takeaways from the July Chapter of Talk Cinema On The Floor (TCOTF). Veteran cinephile and cinema scholar Sandeep Pahwa, meanwhile, offered a fascinating view of how Indian audiences and cinema-going culture have changed—from the era of single-screen theatres to today’s OTT age, in the Ju;y Chapter of Talk Cinema on the Floor.

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विजुअल स्टोरीटेलिंग से दिल्ली की सिनेमा संस्कृति तक: TCOTF जुलाई चैप्टर

Talk Cinema on the Floor के July Chapter में जाने माने सिनेमैटोग्राफर कौस्तुभ मुखर्जी की विजुअल स्टोरीटेलिंग के बताए तरीके और टिप्स TCOTF के इस सत्र की सबसे बड़ी सीख बनकर उभरी। वहीं वरिष्ठ सिनेविद् संदीप पाहवा ने सिंगल स्क्रीन थिएटरों से लेकर OTT के दौर तक भारतीय दर्शकों की बदलती संस्कृति की ऐसी तस्वीर खींची, जिसने सिनेमा को सिर्फ फिल्मों की नहीं, बल्कि समाज की कहानी बना दिया।

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कन्नड़ फिल्म ‘मिथ्या’: 3 नेशनल अवॉर्ड के पीछे का सफर

बहुत सारी अच्छी फ़िल्में कई कारणों से दर्शक तक पहुँच नहीं बना पाती हैं। हाँ, अगर आप किसी फ़िल्म फ़ेस्टिवल से जुड़े हैं, तो कुछ अच्छी फ़िल्में आप देख पाते हैं। 72वें राष्ट्रीय फ़िल्म में सुमंत भट्ट की फ़िल्म ‘मिथ्या’ को तीन पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। एक बच्चा हादसे एवं तनाव में है। उसके पिता गुजर गए हैं, उसकी माँ ने आत्महत्या की है। बच्चे का शॉक, ट्रॉमा, प्रश्न, प्रतिक्रिया, गुस्सा, दु:ख-दर्द, उनका विभ्रम, मूक खोज, विद्रोह सब बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है।

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नॉर्थ ईस्ट के सिनेमा से रील्स में सिनेमा तक: TCOTF जून चैप्टर में रचनात्मक संवाद का नया अध्याय

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार उत्पल बोरपुजारी और वरिष्ठ फोटोग्राफर श्याम प्रसाद की उपस्थिति में आयोजित Talk Cinema On The Floor (TCOTF) का जून चैप्टर कई मायनों में विशेष रहा। एक ओर उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा की नई पहचान और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा हुई, तो दूसरी ओर “Cinema on Reels” के माध्यम से डिजिटल दौर में सिनेमाई मूल्यों की प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद सामने आया।

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