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इस ‘राख’ के ढेर में हैं समाज और सिस्टम के लिए कई सुलगते सवाल

“एक आदमी की निजी सोच जब भीड़ की सोच बन जाती है तो सारा समाज सड़ने लगता है। एक दीमक से हजारों दीमक- और सारा जंगल खत्म। “ प्राइम वीडियो पर रिलीज़ वेब सीरीज़ ‘राख’ का यह संवाद हमारे देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में बहुत मानीख़ेज़ है। जिस तरह से भीड़तंत्र हावी हो चुका है, वह हमारे समाज में अमन चैन के लिए बहुत बडा खतरा बन गया है।

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ख़्वाजा अहमद अब्बास: जिन्होंने समाजवाद को सिनेमा के पर्दे पर पहुंचाया

देश में समानांतर या नव-यथार्थवादी सिनेमा की जब भी बात होगी, ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम फ़िल्मों की इस मुख़्तलिफ़ धारा के रहनुमाओं में गिना जाएगा। उन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ़ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम क़ायम किए।

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जॉन अब्राहम: बेबाक जन-सिनेमा के अमर विद्रोही फिल्मकार

76वें कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में जॉन अब्राहम की अंतिम फिल्म ‘अम्मा अरियन’ की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई। भारतीय या वैश्विक सिनेमा के इतिहास में ऐसे बहुत कम फिल्मकार हुए हैं जो अपने जीवनकाल के बाद भी जॉन अब्राहम की तरह एक जीवंत किंवदंती बने रहे। इसका कारण केवल उनकी फिल्में नहीं, बल्कि नए सिनेमा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और जुनून था जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया।

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मृणाल सेन: हमें इतिहास को बार-बार नए सिरे से पढ़ना होगा

अपनी फ़िल्मों के बारे में ख़ुद मृणाल सेन का कहना था, ‘‘ग़रीबी, सूखा, अकाल और सामाजिक अन्याय मेरे समय का यथार्थ है, एक फ़िल्म निर्देशक की हैसियत से मेरी फ़िल्में इन्हें समझने और उनके कारण जानने का माध्यम हैं।’’ मृणाल सेन देश में ‘न्यू वेव सिनेमा’ आंदोलन या समानांतर सिनेमा के भी जनक माने जाते हैं। उनकी फ़िल्मों में सामाजिक यथार्थ तो है ही, ग़ौर से अगर इन्हें देखें, तो यह प्रतिबद्ध राजनीतिक फ़िल्में भी हैं।

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फिल्म फेस्टिवल का काला सच (2): फिल्ममेकर्स क्या करें, क्या न करें

किसी गंभीर फिल्मकार की परेशानियां सेंसर बोर्ड यानी CBFC की चौखट से शुरू होती हैं। उससे पार पाने के बाद फिल्म फेस्टिवल्स का अथाह सागर उसके आगे हिलोरें मारता दिखता है। लेकिन यहां डुबकी लगाते समय ये ध्यान रखना ज़रूरी है कि क्या करना है, क्या नहीं करना है।

Kaifi Azmi
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कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि: कलम से इंक़लाब लिखने वाला शायर

तरक़्क़ीपसंद तहरीक के अगुआ कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि पर ज़ाहिद खान का लेख: शायरी, सिनेमा और इंक़लाब की दास्तान। ‘मकान’ से ‘आवारा सज्दे’ तक।

Filmmaking with AI
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AI के दौर में फिल्ममेकिंग: TCOTF में नई सीख, नए सवाल, नई संभावनाएं

“AI फिल्मकारों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन्हें रीडिफाइन करेगा।” इस अहम सार के साथ टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के अप्रैल सत्र आयोजित किया गया, जिसमें सिनेमा और तकनीक के बदलते रिश्ते पर बातचीत के साथ-साथ सीखने-सिखाने का भी दिलचस्प सत्र चला।

Satyajit Ray
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सत्यजित राय: ‘भारतीय फ़िल्मकार को जीवन, यथार्थ की ओर मुड़ना होगा’

सत्यजित राय मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। जिन्होंने सेल्युलाइड पर अपनी फ़िल्मों से कई बार करिश्मा किया। उन्होंने हमेशा कलात्मक और यथार्थवादी शैली की ही फ़िल्में बनाईं। व्यावसायिक फ़िल्मों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। व्यावसायिक फ़िल्मों के बारे में उनका ख़याल था, ‘‘व्यावसायिक फ़िल्मों की कोई जड़ नहीं होती। वे झूठी होती हैं, एकदम ढाली गयीं, किसी गढ़े हुए संसार में लिप्त।’’

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भारतीय सिनेमा के जन कलाकार: बलराज साहनी

पुस्तक ‘बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ में उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को बेहद गहराई से सामने लाया गया है। चाहे उनका शुरुआती जीवन हो या फिर सामाजिक, राजनीतिक आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी। उनके भीतर एक कलाकार के साथ—साथ एक विचारक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भी बसता था।

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