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याद-ए-साहिर बरास्ते ‘ख़ूबसूरत मोड़’: ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’

वह कहानी जिसको पूर्णता प्रदान करना सम्भव न हो उसे ‘एक ख़ूबसूरत मोड़’ देना बेहतर होता है। ज़ाहिर है जिस रिश्ते को किसी ‘नाम’ के अंजाम तक न पहुँचाया जा सके समाज मे उसकी कोई ‘मान्यता’ नहीं होती, इसलिये उस ‘रिश्ते’ को तोड़ देना ही अच्छा होता है।