

भारतीय सिनेमा के इतिहास में बलराज साहनी एक ऐसे विरल अभिनेता थे, जिन्होंने अभिनय को ‘दिखावे’ से मुक्त कर ‘स्वाभाविकता’ की नई परिभाषा दी। इप्टा (IPTA) के संस्कारों में रचे-बसे साहनी के पास वह मानवीय संवेदनशीलता थी, जो उनके हर किरदार को जीवंत कर देती थी। उनकी पुण्यतिथि (13 अप्रैल) के अवसर पर उन्हें याद करते हुए एम.एस. सथ्यू की कालजयी कृति ‘गर्म हवा’ का ज़िक्र अनिवार्य हो जाता है। विभाजन की त्रासदी और उसके बाद उपजी अनिश्चितताओं की पृष्ठभूमि पर बनी यह फिल्म न केवल बलराज साहनी के अभिनय का शिखर है, बल्कि भारतीय सिनेमा का एक ऐसा दस्तावेज़ है जो आज भी अपनी प्रासंगिकता और संवेगात्मक गहराई में बेजोड़ है। सलीम मिर्ज़ा के रूप में उनकी बेबसी, संघर्ष और अंततः अटूट उम्मीद का सफर हमें याद दिलाता है कि एक श्रेष्ठ कलाकार अपनी कला के माध्यम से इतिहास की कड़वाहट को भी कितनी गरिमा के साथ परदे पर उतार सकता है। हिंदुस्तानी सिनेमा में हिन्द-पाक विभाजन की पृष्ठभूमि पर आधारित फिल्में बहुतायत में हैं। बावजूद इसके, जब भी इनमें से कुछ बेहतरीन फिल्मों का चुनाव करना होगा तो निश्चित रूप से एम. एस. सथ्यू की ‘गर्म हवा’ सर ए फेहरिस्त होगी। ऐसा क्या ख़ास है इस फिल्म में.. इस लेख में, इस विषय पर विस्तार से चर्चा कर रहे हैं सौरभ सिंह। सौरभ, पेशे से पत्रकार, स्तम्भकार एवं चुनावी रणनीतिकार हैं, जिन्होंने हिंदुस्तान टाइम्स समेत अन्य तमाम प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। इसके अतिरिक्त सौरभ एक साहित्य अध्येता हैं जिनकी हिन्दी सिनेमा समेत हिन्दी-उर्दू साहित्य में गहरी रुचि है।
“आज किसे छोड़ आये मियाँ?”
“बड़ी बहन को। बहनोई साहब तो पहले ही कराँची जा चुके हैं। आज उनके बाल बच्चे भी चले गए। कैसे हरे भरे दरख़्त कट रहे हैं इस हवा में”।
“बड़ी गरम हवा है मियाँ, बड़ी गरम”।
योगेंद्र पाल ‘साबिर’ की चार लाइनें हैं पार्टीशन के पसमंज़र पर, कि
लकीरें खींच कर तुमने ज़मीं तो बाँट दी लेकिन
अब इस टूटी हुई तस्बीह के दाने कहाँ जाएं
ज़मीं ए गुलिस्तां ठुकरा न इन पजमुर्दा फूलों को
कली बन कर यहां महके तो अब मुरझाने कहां जाएं

मैं खुद से हमेशा एक सवाल पूछता हूँ जिसका जवाब मुझे आज तक नहीं मिला कि मुझे पार्टीशन के पसमंज़र में लिखी गई कहानियां फिल्में, अदब ये सब इतना क्यों फैसिनेट करते हैं। बहरहाल आज बात करते हैं मेरी नज़र में भारत पाकिस्तान के बंटवारे के पसमंज़र में बनी अब तक की सबसे खूबसूरत, यथार्थ और सार्थक फिल्म के बारे में, जिसका नाम है ‘गर्म हवा’।
गर्म हवा: जिसमें दिग्गजों के हाथ लगे
ये फिल्म कई मायनों में आला दर्जे की फिल्म है। 1973 की फिल्म ‘गर्म हवा’ को बनाने में उस वक्त के बड़े-बड़े अदीबों के हाथ लगे थे जैसे कैफ़ी आज़मी, शमा ज़ैदी, इस्मत चुगताई, राजिंदर सिंह बेदी वगैरह। इस फिल्म की स्क्रीनप्ले राइटर शमा ज़ैदी बताती हैं “एक दिन मैं राजिंदर सिंह बेदी के साथ बैठकर उनके नावेल ‘एक चादर मैली सी’ पर कुछ काम कर रही थी तो बेदी साहब ने मुझसे बोला कि तुम उन मुसलमानों के बारे में कोई पिक्चर बनाओ जिनके पास 47 में पाकिस्तान जाने का ऑप्शन था फिर भी वो गए नहीं। मैंने बोला आप लिख दीजिये कहानी, देखते हैं। बेदी साहब बोले नहीं मैं कहानी नहीं लिखूँगा। कहानी के लिए इस्मत चुगताई के पास जाओ, उससे लिखवाओ कहानी। पर हां! उससे स्क्रीनप्ले मत लिखवाना। स्क्रीनप्ले वो बहुत खराब लिखती है।”
पार्टिशन पर बनी फिल्म ‘गर्म हवा’ अपनी तरह की अकेली फिल्म है। अकेली इसलिए भी क्योंकि सारे किरदारों के मुस्लिम होने के बावजूद ये फिल्म अपने कन्धे पर ‘मुस्लिम सोशल’ फिल्म का तमगा लगाकर नहीं चलती। जो कि अच्छी बात है और इस फिल्म के लिए ज़रूरी भी था। वो इसलिए क्योंकि मुस्लिम सोशल फिल्मों में मुसलमानों को अक्सर स्टीरियोटाइप्ड कर दिया जाता है जैसे कि मानो हर मुसलमान अपने वालिद को अब्बा हुजूर ही कहता हो, दूसरा ये कि मुसलमान है तो या तो नवाब हो सकता है या शायर, तीसरा कुछ नहीं। इस तरीके के स्टीरियोटाइप ज़माने से चले आ रहे हैं। ‘निकाह’ और ‘महबूब की मेहंदी’ जैसी फिल्में इसका बेहतरीन उदाहरण हैं। ‘गर्म हवा’ इसके ठीक उलट है। फिल्म की भाषा बिल्कुल वही है जो एक आम हिंदुस्तानी बोलता समझता है।
‘गर्म हवा’ आर्ट फिल्म या ‘मुस्लिम सोशल’ नहीं…
ज्यादातर लोग ‘गर्म हवा’ को आर्ट फिल्म समझते हैं जबकि ये फिल्म प्रॉपर कॉमर्शियल सिनेमा है। कहानी में यूँ तो हर कोई अहम है और इस फिल्म में कई सबप्लॉट्स भी हैं लेकिन गर्म हवा की कहानी घूमती है सलीम मिर्जा’ (बलराज साहनी), जो कि आगरा में एक जूते के कारखाने के मालिक हैं, उनके इर्द गिर्द। बँटवारा हो चुका है, सलीम मिर्जा रोज़ सुनते रहते हैं कि हिंदुस्तान में अब मुसलमानों के लिए कुछ नहीं बचा। ख़ुद उनके दोस्त-अहबाब मुल्क छोड़ छोड़कर लाहौर कराची जा रहे हैं लेकिन सलीम हैं कि रोज़ घर, आगरा और हिंदुस्तान छोड़कर न जाने का कोई न कोई नया बहाना खोज ही लेते हैं। सलीम मिर्जा का एक डायलॉग भी है फिल्म में। जब सलीम मिर्जा की बीवी (शौकत कैफ़ी) कहती हैं “अरे चलते क्यों नहीं पाकिस्तान ! बड़े भाई साहब बताते हैं अच्छी खासी चक्की मिल गयी है उन्हें, कोई परेशानी नहीं है वहाँ। जाने क्या धरा है इनका अब यहाँ। तो सलीम कहते हैं ‘अरे भई, ये उम्र अब वतन छोड़कर जाने की थोड़ी है बल्कि इस दुनिया से उस दुनिया में जाने की है”। एक डायलॉग में जब सलीम को बाजार से उधार नहीं मिल रहा होता है तो वो बोलते हैं “जो भागे हैं उनकी सज़ा उन्हें क्यों दी जाए जो न तो भागे हैं न भागना चाहते हैं”। बकौल एम. एस. सत्यू इस फिल्म में दादी अम्मा के किरदार को करने के लिए बेगम अख़्तर ने हामी भरी थी हालाँकि बाद में कहा कि उनके शौहर नहीं चाहते कि वो फिल्मों में एक्टिंग करें।
इस फिल्म के एक सीन में ताँगे वाला सलीम मिर्जा से आठ आने की जगह एक रुपया मांगता है। सवाल जवाब करने पर ताँगे वाला बोलता है, “आठ आने में जाना है तो पाकिस्तान जाओ”। बड़े बेटा आगे बढ़ा तो सलीम मिर्जा ये कहते हुए उसे रोक लेते हैं
“रहने दो बाक़र ! नई नई आज़ादी मिली है न, सब इसका अपने अपने ढंग से मतलब निकाल रहे हैं”।

वो सीन जिसकी कीमत ज़िंदगी देकर चुकाई…
फिल्म गर्म हवा के एक सीन के बारे में कहा जाता है कि वो बलराज साहनी साहब की मौत का कारण बन गया। दरसल फिल्म एक्टर बलराज साहनी, कद में जिनकी तुलना दिलीप कुमार से की जाती है, उन्होंने इस फिल्म में सलीम मिर्जा का किरदार निभाया है। बलराज साहनी मेथड एक्टिंग में विश्वास रखते थे। मेथड एक्टिंग, एक्टिंग की ही एक विधा है जिसमें अदाकार अपने किरदार की तैयारी के लिए किरदार ही तरह ही बर्ताव करने लगता है। तो इस फिल्म में सलीम मिर्जा के किरदार की तैयारी के लिए बलराज साहनी ने बाकायदे 2-3 हफ्ते चाँदनी चौक के एक मिडिल क्लास फैमली के साथ उसके घर में बिताए थे जहाँ वो चारपाई पर ही सोते थे। यहाँ तक कि जूते बनाना भी सीखा ताकी सीन एक्टिंग नहीं बल्कि रियल लगे। बलराज साहनी एक मेथड एक्टर हैं, ये बात फिल्म के डायरेक्टर सथ्यू साहब बखूबी जानते थे। फिल्म का एक सीन है जिसमें सलीम मिर्जा की बेटी आमना खुदकुशी कर लेती है। दरसल ख़ुद बलराज साहनी साहब की बेटी, जिसे वो दुनिया में सबसे ज्यादा चाहते थे, का इंतकाल कुछ ही दिन पहले हुआ था। सथ्यू साहब ने कहीं कुबूला भी था कि ये सीन फिल्म में था ही नहीं बल्कि बाद में जानबूझ कर जोड़ा गया क्योंकि वो जानते थे कि बलराज साहनी इस सीन पर सबसे अच्छी परफॉर्मेंस देंगे। मेथड एक्टिंग की थियरी ही यही है कि सीन को अपनी ज़िंदगी के किसी किस्से से जोड़कर एक्टिंग की जाती है, इससे एक्ट करने में आसानी हो जाती है। यहाँ तो सब कुछ हुबहू वैसा ही था। अब बलराज साहनी साहब ने सीन करने के लिए अपनी ज़िंदगी के सबसे दर्दनाक हिस्से, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी को खोया था, की याद को फिर से ताज़ा किया। साहनी साहब एक ही सदमे के ज़ख़्म को दो बार अपने दिल ओ दिमाग पर बर्दाश्त नहीं कर पाए और फिल्म कम्प्लीट होने के कुछ ही महीनों बाद बलराज साहनी साहब का इंतकाल हो गया। आखिरी डबिंग भी साहनी साहब ने इसी पिक्चर की की थी। इस फिल्म में उनका आखिरी डायलॉग, जो उनकी ज़िंदगी का भी आखिरी डायलॉग साबित हुआ, वो था, “आखिर इंसान अकेला कब तक ज़िंदा रह सकता है”।
लखनऊ और आगरा का फ़र्क
पहले इस फिल्म की कहानी को लखनऊ के बैकग्राउंड पर सेट किया जाना था। लेकिन बाद में कैफ़ी आज़मी साहब ने कहा कि कहानी में जो बात कहनी है उस हिसाब से कहानी आगरा शहर की हो तो बेहतर रहेगा क्योंकि आखिरकार इसे मुस्लिम सोशल फिल्मों की तरह नहीं बनाना था और अगर लखनऊ में होगी तो खालिस उर्दू, नवाबों और शायरी का एंगल भी ज़ाहिर तौर पर लाना पड़ेगा जो कि इस फिल्म का मुद्दा नहीं था। तो खैर स्क्रिप्ट, स्क्रीनप्ले में दोबारा जो बदलाव करने पड़े, वो कैफ़ी साहब ने खुद किये। फिल्म के ज्यादतर एक्टर्स IPTA (Indian People Theatre Association) से लिए गए थे। इस फिल्म की शुरुआत और अंत कैफ़ी साहब की ही आवाज़ में उन्हीं की नज़्म से होता है। वो नज़्म भी पेश ए खिदमत किये देता हूँ। ये नज़्म हिंदुस्तान पाकिस्तान दोनों के लिए हैं।
तकसीम हुआ मुल्क तो दिल हो गए टुकड़े
हर आंगन में तूफ़ान, वहाँ भी था यहाँ भी
हर घर में चिता जलती थी, लहराते थे शोले
हर शहर में शमशान, वहाँ भी था यहाँ भी
गीता की सुनता ना कुरआँ की सुनता कोई
हैरान सा ईमान वहाँ भी था यहाँ भी
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जो दूर से तूफान का करते हैं नज़ारा
उनके लिए तूफ़ान वहाँ भी है यहाँ भी
धारे में जो मिल जाओगे बन जाओगे धारा
यही वक़्त का ऐलान वहाँ भी है यहाँ भी
इस लेख को पढ़ रहे बहुत से लोगों ने यकीनन ये फिल्म नहीं देखी होगी। यकीन मानिये, अच्छा सिनेमा आपने मिस कर दिया, जाइये देखिये ‘गर्म हवाः ए फिल्म बाई एम. एस. सथ्यू।

