
भारत सरकार ने इस महीने से फिल्म फेस्टिवल्स में अनसर्टिफाइड (बगैर सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट के) फिल्मों की स्क्रीनिंग के लिए नए कड़े नियम लागू कर दिए हैं, जो स्वतंत्र फिल्मकारों के लिए एक नई चुनौती है। ऐसा इसलिए क्योंकि तमाम फिल्म फेस्टिवल्स में शामिल होने वाली अधिकतर स्वतंत्र फिल्में बगैर सेंसर सर्टिफिकेट के होती हैं। इस आदेश के बहाने भारत में शहर-शहर होने वाले फिल्म फेस्टिवल्स पर भी चर्चा शुरू हो गई है। नए आदेश के पीछे सरकारी इरादा ऐसे फेस्टिवल्स पर भी नकेल कसना लगता है। अब सवाल ये है कि ये सिनेमा के लिए कितना अच्छा होगा, कितना बुरा। इसे बेहतर और सिलसिलेवार ढंग से समझने के लिए ये जानना भी ज़रूरी ही कि क्यों अचानक फिल्म फेस्टिवल्स की बाढ़ आ गई है… इन आयोजनों में क्या होता है। दिल्ली के स्वतंत्र फिल्मकार इरशाद दिल्लीवाला ने अपने निजी अनुभवों और रिसर्च के आधार एक विस्तृत आलेख लिखा है, जिसे अगर काला सच कहें तो गलत नहीं होगा। इस लेख को हम दो अंकों में यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। इरशाद दिल्लीवाला एक फिल्ममेकर, वीडियो एडिटर, डिज़ाइनर और लेखक हैं। उन्होंने फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII), पुणे से वीडियो और फिल्म प्रोडक्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया है। अब तक वे 1,500 से अधिक वीडियो एडिट कर चुके हैं, जिनमें डॉक्यूमेंट्री, कमर्शियल्स, पॉडकास्ट, प्रोमो, म्यूज़िक वीडियो और न्यूज़ एपिसोड शामिल हैं। उनकी शॉर्ट फिल्म ‘वापसी – द रिटर्न’ को 2010 में मुंबई फिल्म महोत्सव (MAMI) में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बतौर लेखक और समीक्षक वे लगातार सिनेमा और इसकी दुनिया की अपनी संवेदनशील दृष्टिकोण और तकनीकी गहराई से पड़ताल करते रहते हैं।
भारत में इन दिनों फिल्म फेस्टिवलों की मानो बाढ़ आ गई है। मार्च-अप्रैल आते ही सोशल मीडिया, ईमेल और फिल्ममेकर्स के इनबॉक्स में एक के बाद एक “इंटरनेशनल”, “ग्लोबल”, “नेशनल”, “इंडिपेंडेंट”, “दादा साहेब”, “जयपुर”, “दिल्ली”, “मुंबई”जैसे बड़े नामों से सजे फेस्टिवलों के पोस्टर तैरने लगते हैं। ऊपरी तौर पर यह सिनेमा संस्कृति के विस्तार की तरह दिखाई देता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत कहीं अधिक चिंताजनक है। देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे तथाकथित फिल्म फेस्टिवल सामने आ रहे हैं, जिनका मकसद सिनेमा, संवाद, बाज़ार या प्रतिभा को मंच देना नहीं, बल्कि नये फिल्ममेकर्स से एंट्री फीस के नाम पर पैसा वसूलना प्रतीत होता है। यह सवाल अब सिर्फ असंतोष का नहीं, बल्कि संभावित संगठित शोषण का है।
एंट्री फीस से शुरू होकर ‘अवार्ड कैटेगरी’ तक: कैसे बनता है जाल
एक नए फिल्ममेकर के लिए किसी फिल्म फेस्टिवल में चयन होना सिर्फ सम्मान नहीं, बल्कि उम्मीद होती है— पहचान मिलेगी
- नेटवर्क बनेगा
- निर्माता या वितरक मिल सकते हैं
- अगला प्रोजेक्ट खुलेगा
- फिल्म को स्क्रीन और दर्शक मिलेंगे
यही उम्मीद सबसे बड़ा हथियार बनती है।
मामला अक्सर ऐसे शुरू होता है—
किसी फेस्टिवल की एंट्री फीस 1500 से 3000 रुपये। मान लीजिए किसी युवा निर्देशक ने 2000 रुपये देकर अपनी शॉर्ट फिल्म भेज दी।
फिर कुछ दिन बाद फोन या मेल आता है:

- Best Direction में भी भेजिए
- Best Editing के लिए अलग आवेदन कीजिए
- Best Cinematography के लिए अलग फीस
- Best Screenplay
- Best Story
- Best Debut Filmmaker
- Best Social Message Film
- Best Actor / Actress
- Jury Special Mention
यानी एक ही फिल्म को 8-10 अलग “कैटेगरी” में धकेलकर आयोजक संकेत देते हैं— “अगर जीतना है, तो और पैसा लगाइए।”
यहां से 2,000 रुपये का खर्च आसानी से 15,000 से 25,000 रुपये तक पहुंच जाता है।
कई नए फिल्ममेकर, जिनके पास पहले ही सीमित संसाधन होते हैं, इस भ्रम में फँस जाते हैं कि शायद अधिक कैटेगरी में भेजने से “अवार्ड” की संभावना बढ़ जाएगी।
500 फिल्में, 600 एंट्री, लाखों की कमाई—पर फिल्ममेकर को क्या?
एक औसत छोटे फेस्टिवल में अगर 500–600 फिल्में भी आती हैं, और औसत एंट्री फीस 1500–2500 रुपये है, तो सिर्फ बेसिक सबमिशन से ही लाखों रुपये इकट्ठा हो जाते हैं। यदि अलग-अलग अवार्ड कैटेगरी की फीस भी जोड़ दी जाए, तो यह रकम कई गुना बढ़ सकती है। लेकिन बदले में फिल्ममेकर को क्या मिलता है? अक्सर:
- कोई वास्तविक मार्केट नहीं
- कोई खरीदार नहीं
- कोई वितरण नेटवर्क नहीं
- कोई उद्योग संवाद नहीं
- कोई क्यूरेटेड स्क्रीनिंग संस्कृति नहीं
- कोई प्रेस वैल्यू नहीं
- कोई गंभीर जूरी पारदर्शिता नहीं
- और अंत में “प्रोत्साहन” के नाम पर एक प्रिंटेड सर्टिफिकेट
यही वह बिंदु है जहां सवाल उठता है—
क्या यह फेस्टिवल है या ‘फीस कलेक्शन मॉडल’?
‘नाम’ बड़े, आयोजन छोटे: ब्रांडिंग से भ्रम, सुविधा शून्य
- आजकल कई आयोजक शहरों और प्रतिष्ठित नामों का इस्तेमाल ढाल की तरह कर रहे हैं—
- “जयपुर”, “दिल्ली”, “मुंबई”, “दादा साहेब”, “इंडिया”, “ग्लोबल”, “इंटरनेशनल” जैसे शब्द जोड़ते ही आयोजन विश्वसनीय लगने लगता है। लेकिन कई मामलों में हकीकत यह होती है:
- छोटा-सा किराए का हॉल
- बेहद सीमित दर्शक
- फिल्ममेकर्स के लिए कोई हॉस्पिटैलिटी नहीं
- कोई इंडस्ट्री गेस्ट नहीं
- कोई अभिनेता, निर्माता, वितरक, चैनल या OTT प्रतिनिधि नहीं
- कोई बाजार-संवाद (market linkage) नहीं
- कोई पेशेवर कैटलॉग या मीडिया कवरेज नहीं
यानी फिल्म फेस्टिवल की आत्मा गायब, सिर्फ उसका पोस्टर मौजूद।
एक ही नेटवर्क, दर्जनों ‘थीम फेस्टिवल’
और भी गंभीर बात यह है कि ऐसे आयोजनों के पीछे कई बार एक ही समूह अलग-अलग विषयों के नाम पर अनेक फेस्टिवल चलाता दिखाई देता है।
उदाहरण के तौर पर:
- विकलांगता पर फिल्म फेस्टिवल
- पशु-कल्याण पर फिल्म फेस्टिवल
- दलित सिनेमा फेस्टिवल
- महिला सशक्तिकरण फेस्टिवल
- मानवाधिकार फेस्टिवल
- छात्र फिल्म फेस्टिवल
- माइक्रो शॉर्ट फेस्टिवल
- मोबाइल फिल्म फेस्टिवल
- डॉक्यूमेंट्री अवार्ड्स
इनमें से कुछ आयोजन वास्तविक भी हो सकते हैं, लेकिन समस्या तब है जब विषय सिर्फ ‘भावनात्मक हुक’ बन जाए और संरचना पूरी तरह राजस्व उगाही की हो।
सोशल मीडिया पर 6–8 महीने पहले से प्रचार, पोस्टर, “अर्ली बर्ड”, “फाइनल डेडलाइन”, “एक्सटेंडेड डेडलाइन”, “लास्ट चांस”, “जूरी स्पेशल”, “VIP अवार्ड नाइट”—यह पूरा मॉडल अब एक व्यवस्थित डिजिटल मार्केटिंग मशीन बन चुका है।
फिल्म फेस्टिवल का उद्देश्य क्या होना चाहिए था?

किसी भी स्वस्थ फिल्म फेस्टिवल का उद्देश्य होना चाहिए:
- नई फिल्मों को दर्शक देना
- नए फिल्ममेकर को विश्वसनीय मंच देना
- बिक्री (sales) और वितरण (distribution) की संभावना पैदा करना
- फिल्म बाजार (market access) बनाना
- इंडस्ट्री कनेक्शन देना
- आलोचना और संवाद का स्पेस बनाना
- नई प्रतिभाओं को अगले काम तक पहुँचाना
लेकिन जब फिल्ममेकर को मिलता है:
- रजिस्ट्रेशन डेस्क
- प्लास्टिक ट्रॉफी
- फोटो वॉल
- दो इंस्टाग्राम रील
- और “Congratulations! You are a Winner” वाला मेल
तो यह संस्कृति नहीं, छलावा है। …जारी
Disclaimer अस्वीकरण: इस लेख का मकसद NDFF द्वारा किसी भी विशेष फिल्म समारोह या अन्य फिल्म समारोहों पर उंगली उठाना नहीं है। फिल्म समारोह में प्रविष्टियां मंगवाने के लिए अर्ली बर्ड या एक्सटेंडेड डेडलाइन जैसी बातें कई प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में भी अपनाई जाती है, लेकिनव आयोजन और प्रक्रिया की इन व्यावहारिक औपचारिकताओं को कुछ आयोजक निरंतर दुरुपयोग कर रहे हैं, जिनका निजी तौर पर अनुभव करने के बाद ही लेखक ने ये लेख लिखा है।
अगले भाग में सेंसर बोर्ड के दलाल, फिल्म फेस्टिवल से जुड़े मानक और नए फिल्मकारों के लिए सावधानियां..!
