

तकनीक और बाज़ार के बढ़ते दबाव के बीच, जब सिनेमा अपनी संवेदनात्मक गहराई से दूर होता प्रतीत होता है, ऐसे समय में न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन द्वारा आरंभ किया गया ‘सत्यजित राय मेमोरियल टॉक’ सिनेमा को उसकी मूल आत्मा—यथार्थ, विचार और मानवीय संवेदना—की ओर लौटने का एक गंभीर प्रयास है। 1 मई 2025 को फिल्म सिटी, नोएडा स्थित मारवाह स्टूडियो में आयोजित इस पहल का पहला संस्करण सिनेमा पर सार्थक संवाद की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हुआ।
आज का सिनेमा और सत्यजित राय की प्रासंगिकता
सिनेमा में इंटेलीजेंस का काम भले आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस से लिया जाने लगा हो, लेकिन जो सिनेमा दिल तक पहुँचता है, उसे बनाने, समझने और बरतने के लिए आज भी सत्यजित राय और उनकी फिल्मों की ओर लौटना पड़ता है।
तकनीक और व्यावसायिक दबाव के इस दौर में, जब सिनेमा अपनी पहचान और सार्थकता के संकट से जूझ रहा है, सत्यजित राय का सिनेमा हमें याद दिलाता है कि सच्ची कला समय से परे होती है—और हमेशा मनुष्य के अनुभव और संवेदना से जुड़ी रहती है।
इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन (NDFF) ने ‘सत्यजित राय मेमोरियल टॉक’ की शुरुआत की। इस पहल का उद्देश्य केवल स्मरण नहीं, बल्कि सिनेमा को लेकर एक गंभीर और रचनात्मक संवाद का वातावरण तैयार करना है—जहाँ विचारशील और संवेदनशील सिनेमा को समझने और उसे आगे बढ़ाने की प्रेरणा मिल सके।
पहला संस्करण: एक सार्थक संवाद की शुरुआत

इस श्रृंखला का पहला आयोजन 1 मई 2025 को फिल्म सिटी, नोएडा स्थित मारवाह स्टूडियो में, एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) के सहयोग से आयोजित किया गया।
कार्यक्रम में मुंबई के फिल्मकार और फिल्म स्कॉलर ओ. पी. श्रीवास्तव को मुख्य वक्ता के रूप में आमंत्रित किया गया। उन्होंने ‘रियलिज़्म इन सिनेमा: लेगेसी ऑफ रे’ विषय पर ऑडियो-विज़ुअल प्रस्तुति के माध्यम से एक गहन और विचारोत्तेजक व्याख्यान दिया, जिसकी शुरुआत NDFF के फाउंडर आशीष कुमार सिंह के साथ संवाद से हुई।
रियलिज़्म की परंपरा: विश्व सिनेमा से भारतीय संदर्भ तक
अपने व्याख्यान में ओ. पी. श्रीवास्तव ने सिनेमा में यथार्थवाद की जड़ों को समझाते हुए विटोरियो डी सिका की प्रसिद्ध फिल्म Bicycle Thieves (1948) से शुरुआत की, जिसे इटैलियन नियो-रियलिज़्म की आधारशिला माना जाता है।

इसके साथ ही उन्होंने फ्रेंच न्यू वेव का संदर्भ देते हुए भारतीय सिनेमा में बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन और सत्यजित राय की पथेर पांचाली जैसी फिल्मों की चर्चा की—जो न केवल अपने समय की सच्चाई को दर्शाती हैं, बल्कि भारतीय सिनेमा में यथार्थवादी दृष्टिकोण की नींव भी रखती हैं।
हालाँकि, जहाँ सत्यजित राय अपने विशिष्ट मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहे, वहीं यह धारा मुख्यधारा सिनेमा में एक व्यापक आंदोलन का रूप नहीं ले सकी। बाद में सत्तर के दशक में मृणाल सेन की भुवन सोम से शुरू हुआ समानांतर सिनेमा आंदोलन 90 के दशक तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराता रहा। इस दौरान बने सिनेमा में ऐसी तमाम फिल्में हैं जो हिंदी सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर के तौर पर दर्ज हैं।

मुख्य वक्ता: सिनेमा और समाज के बीच सेतु
ओ. पी. श्रीवास्तव एक प्रतिष्ठित फिल्मकार और लेखक हैं, जिन्होंने दो फीचर फिल्में और सात डॉक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण किया है। उनकी फिल्मों में विज्ञान, समाज, संस्कृति और स्वास्थ्य जैसे विषयों को गहराई से उठाया गया है।
गिरीश कसरावल्ली पर उनकी डॉक्यूमेंट्री Life in Metaphors: A Portrait of Girish Kasaravalli (2015) को राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनकी हालिया डॉक्यूमेंट्री The Dirty Sky अंतरिक्ष में बढ़ते मलबे के खतरे पर केंद्रित है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रदर्शित की जा रही है। इससे ठीक पहले उन्होने ‘बनवारी की अम्मा’ नाम की फीचर फिल्म बनाई थी, जिसे कई समारोहों में बेस्ट फिल्म का पुरस्कार प्राप्त हुआ।
लेखन के क्षेत्र में भी उनका योगदान महत्वपूर्ण है। उन्होने चार किताबें लिखी हैं, जिनमें गिरीश कसरावल्ली पर लिखी एक किताब के अलावा 70 के दशक में शुरु हुए समानांतर सिनेमा मूवमेंट की फिल्मों पर लिखी ‘पिलर्स ऑफ पैरेलल सिनेमा’ बेहद महत्वपूर्ण है। Pillars of Parallel Cinema, जो भारतीय समानांतर सिनेमा के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण संदर्भ मानी जाती है।
सम्मान और सहभागिता
इस अवसर पर जानी-मानी फिल्म स्कॉलर डॉ. विजय शर्मा द्वारा संपादित दो-खंडीय पुस्तक ‘सत्यजित राय का अपूर्व संसार’ मुख्य अतिथि को पुस्तकनामा के प्रकाशक महेश्वर दत्त शर्मा के सौजन्य से भेंट की गई।

कार्यक्रम में एएएफटी के चेयरमैन डॉ. संदीप मारवाह की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ाया। डॉ. संदीप मारवाह, एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलीविजन (AAFT) के संस्थापक और अध्यक्ष, भारतीय मीडिया एवं सिनेमा शिक्षा के क्षेत्र में एक प्रमुख नाम हैं। फिल्म निर्माण, टेलीविजन और मीडिया प्रशिक्षण के माध्यम से उन्होंने हजारों विद्यार्थियों को प्रशिक्षित किया है और फिल्म सिटी, नोएडा को एक महत्वपूर्ण क्रिएटिव हब के रूप में स्थापित करने में अहम भूमिका निभाई है।

NDFF की आगे की दिशा
NDFF का यह प्रयास केवल एक आयोजन तक सीमित नहीं है। संस्था का उद्देश्य ऐसे सिनेमा की समझ को और गहरा करना, उसकी स्क्रीनिंग और उस पर संवाद को बढ़ावा देना है, ताकि समकालीन सिनेमा के साथ उसका सार्थक संबंध स्थापित किया जा सके।
इसी दिशा में NDFF ने ‘Talk Cinema On The Floor’ जैसे कार्यक्रमों की भी शुरुआत की है, जो सिनेमा को लेकर संवाद और सहयोग (Collaboration) की नई संभावनाएँ खोलते हैं। ‘सत्यजित राय मेमोरियल टॉक’ केवल एक स्मृति आयोजन नहीं, बल्कि सिनेमा की उस विरासत को जीवित रखने का प्रयास है, जो हमें बेहतर देखने, समझने और महसूस करने की क्षमता देती है। NDFF का यह प्रयास सिनेमा को उसकी जड़ों से जोड़ने और नई पीढ़ी तक उसकी संवेदना पहुँचाने की एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।

