
ज़ोहरा सहगल ने आठ दशक से अधिक के अपने रंगमंच और फिल्म करियर में कई ब्रिटिश फिल्मों , बीबीसी टेलीविजन शो, ब्रिटिश टेलीविजन क्लासिक्स, भारतीय टेलीविजन धारावाहिक, विज्ञापन और फीचर फिल्मों में काम किया। उनके ज़िंदादिल और हंसमुख मिज़ाज की वजह से उन्हें लोग बॉलीवुड की ग्रैंड ओल्ड लेडी कह कर पुकारते थे। उनकी जयंती 27 अप्रैल के मौके पर उन्हे याद कर रहे हैं लेखक ज़ाहिद खान। बीसवीं सदी में भारतीय साहित्य में चले प्रगतिशील आन्दोलन पर लेखक ज़ाहिद ख़ान का विस्तृत कार्य है। उनकी कुछ अहम किताबें हैं—‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक का कारवॉं’, ‘तहरीक—ए—आज़ादी और तरक़्क़ीपसंद शायर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’। ‘शैलेन्द्र हर ज़ोर—ज़ुल्म की टक्कर में’, ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ और ‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ ज़ाहिद ख़ान द्वारा सम्पादित किताबें हैं, तो वहीं ‘मख़दूम मोहिउद्दीन सुर्ख़ सवेरे का शायर’, ‘मजाज़ हूँ मैं सरफ़रोश हूँ मैं’ और ‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ का उन्होंने अनुवाद और सम्पादन किया है। ज़ाहिद ख़ान ने कृश्न चन्दर के ऐतिहासिक रिपोर्ताज ‘पौदे’, हमीद अख़्तर की किताब ‘रूदाद—ए—अंजुमन’, अली सरदार जाफ़री का ड्रामा ‘यह किसका ख़ून है !’, कृश्न चन्दर का ड्रामा ‘दरवाज़े खोल दो’,अली सरदार जाफ़री का कहानी संग्रह ‘मंज़िल’ और उर्दू के अहम अफ़साना—निगारों पर केन्द्रित किताब ‘कुछ उनकी यादें कुछ उनसे बातें’ का उर्दू से हिन्दी लिप्यंतरण और अनुवाद किया है।
यूट्यूब चैनल ‘किताबी दुनिया’ के चर्चित प्रोग्राम ‘तरक़्क़ी—पसंद तहरीक का कारवॉं’ के लिए ज़ाहिद ख़ान ने पच्चीस एपिसोड में स्क्रिप्ट लेखन किया है। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ट लेखन के लिए मुम्बई की एक सामाजिक संस्था ‘पॉपुलेशन फ़र्स्ट’ ने उन्हें सात बार ‘लाडली मीडिया एंड एडवरटाइजिंग अवार्ड फॉर जेंडर सेंसिटिविटी’ पुरस्कार से सम्मानित किया है। यही नहीं ज़ाहिद ख़ान की मक़बूल किताब ‘तरक़्क़ी—पसंद तहरीक के हमसफ़र’ मराठी और उर्दू ज़बान में भी अनूदित हो चुकी है। इस किताब के लिए उन्हें ‘मध्य प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ के ‘वागीश्वरी पुरस्कार’ से नवाज़ा गया है।
बग़ावती मिज़ाज और डांस के जुनून वाली ज़ोहरा

ज़ोहरा सहगल का नाम आते ही ज़हन में एक इंक़लाबी औरत का चेहरा सामने आता है, बग़ावत जिसके मिज़ाज का हिस्सा थी। बीसवीं सदी जिसमें हिन्दोस्तानी औरतों के पैरों में कई बेड़ियॉं और दिल—ओ—दिमाग़ पर अनेक बंधन थे, घरों में रूढ़िवादी और दकियानूसी माहौल था, कोई लड़की मॉडर्न डांस सीखने की चाहत रखे और फिर अपने मुल्क से हज़ारों किलोमीटर दूर जर्मनी के ड्रेसडेन में मैरी विगमैन के बैले स्कूल में दाख़िला ले ले, हैरान कर देने वाली बात है। ज़ाहिर है कि उस दौर के लिहाज़ से यह उनका साहसिक फ़ैसला था। उस वक़्त ऐसा करने वाली वे पहली हिन्दोस्तानी थीं। ज़ोहरा सहगल यहीं नहीं रुक जातीं, डांस की अपनी तालीम मुकम्मल हो जाने के बाद वे प्रसिद्ध भारतीय नर्तक उदयशंकर के बैले डांस ग्रुप के साथ जुड़ जाती हैं, बल्कि दुनिया भर में डांस परफॉर्म भी करती हैं। उदयशंकर ने जब अल्मोड़ा के छोटे—से गॉंव सिमतोला में ‘उदयशंकर इंडिया कल्चरल सेंटर’ खोला, तो वे उसमें डांस की टीचर हो गईं। अपने से आठ साल छोटे कामेश्वर सहगल से धर्म की परवाह किए बिना शादी करती हैं। और उसे आख़िर तक निभाती हैं। साल 1943 में भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा का गठन हुआ, तो ज़ोहरा सहगल इससे शुरुआत से ही जुड़ गईं और कई नाटकों में अभिनय किया। साल 1945 में एक अदाकार के तौर पर वे पृथ्वीराज कपूर के ‘पृथ्वी थिएटर’ से जुड़ीं। 1945 से 1959 तक यानी चौदह साल तक ज़ोहरा सहगल ने भारत के सभी प्रमुख शहरों का दौरा किया। ‘पृथ्वी थिएटर’ में वे अदाकारी करने के साथ—साथ वहॉं डांस डायरेक्टर भी थीं। अदाकारी का यह सिलसिला उनकी उम्र के आख़िरी पड़ाव तक जारी रहा। ज़ोहरा सहगल ने आठ दशक से अधिक के अपने रंगमंच और फ़िल्म करियर में कई ब्रिटिश फ़िल्मों, बीबीसी टेलीविजन शो, ब्रिटिश टेलीविजन क्लासिक्स, भारतीय टेलीविजन धारावाहिक, विज्ञापन और फीचर फ़िल्मों में काम किया। उनमें ग़ज़ब की एनर्जी थीं। अपने ज़िंदादिल और हॅंसमुख मिज़ाज की वजह से वे सभी में बेहद मक़बूल थीं। उन्हें लोग बॉलीवुड की ग्रैंड ओल्ड लेडी कह कर पुकारते थे।
एक्टिंग का सफर, पृथ्वी थिएटर और इप्टा
27 अप्रैल, 1912 को उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के एक रिवायती मुस्लिम परिवार में जन्मी ज़ोहरा सहगल का पूरा नाम ज़ोहरा बेगम मुमताज़ ख़ान था। उन्होंने अपनी इब्तिदाई तालीम ‘क्वीन मैरी कॉलेज’, लाहौर से मुकम्मल की। 1930 में वे यूरोप चली गईं। जहॉं उन्होंने मैरी विगमैन के बैले स्कूल में तीन साल तक मॉडर्न डांस की पढ़ाई की। और आगे चलकर डांस को ही अपना करियर बना लिया। उदयशंकर के बैले डांस ग्रुप के साथ ज़ोहरा सहगल ने साल 1935 से 1940 के दरमियान जापान, मिस्र, यूरोप और अमेरिका में अनेक डांस प्रदर्शन किए। भारत वापस लौटने पर ‘पृथ्वी थिएटर’ और इप्टा का अभिन्न अंग हो गईं। अपनी आत्मकथा ‘क़रीब से’ में वे लिखती हैं, ”1945 में बॉम्बे पहुॅंचने के फ़ौरन बाद इप्टा में शामिल होने के बाद, मैंने इन नाटकों में सक्रिय रूप से भाग लिया। 1946 में कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव पीसी जोशी ने मुझसे इप्टा के सांस्कृतिक दस्ते ‘कल्चरल स्क्वॉड’ का प्रभार लेने के लिए कहा था, लेकिन मुझे मना करना पड़ा, क्योंकि मैं एक साथ ‘पृथ्वी थिएटर’ के साथ काम जारी नहीं रख सकता थी, जो मेरी प्राथमिक प्रतिबद्धता थी।” ज़ोहरा सहगल ने इप्टा के कई नाटकों में अभिनय किया। 1948 में मुम्बई इप्टा ने ‘धानी बाँकें’ नाटक का मंचन किया। मशहूर अफ़साना—निग़ार इस्मत चुग़ताई के लिखे इस ड्रामे में दीना पाठक, उज़रा बट्ट और शौकत कैफ़ी के साथ ज़ोहरा सहगल ने भी अभिनय किया था। नाटक साम्प्रदायिक सौहार्द पर केन्द्रित था। शौकत कैफ़ी, जिन्होंने इस नाटक में पहली बार अभिनय किया, अपनी आत्मकथा ‘याद की रहगुज़र’ में लिखती हैं, ”ज़ोहरा सहगल ने एक चूड़ीवाली की भूमिका की थी, जिसे देखकर मैं सोच में डूब गई कि क्या कोई इतना शानदार अभिनय भी कर सकता है !”

ज़ौहरा सहगल उदयशंकर और पृथ्वीराज कपूर की बहुत इज़्ज़त और एहतिराम करती थीं। अपनी आत्मकथा ‘क़रीब से’ में ‘पृथ्वी थिएटर’ और पृथ्वीराज कपूर से जुड़ी यादों को क़लम—बंद करते हुए उन्होंने लिखा है, ”मुझे पहले से ही थिएटर के नृत्य निर्देशक के रूप में स्थापित किया गया था और मैंने ख़ुद को भूमिका के लिए पेश किया, जिसे मैंने थिएटर के साथ अपने रोजगार के अंत तक निभाया। पृथ्वीजी स्वयं वॉइस प्रोडक्शन की कक्षा लेते थे। अन्यथा संगीत निर्देशक राम गांगुली, पूरे कलाकारों के साथ विभिन्न नाटकों के गाने रिहर्सल करते थे। नृत्य कक्षा मेरे द्वारा ली जाती थी। आधे घंटे कसरत और नृत्य रचना दोनों या तो आगामी नाटक से जुड़ी होती थी या केवल कलाकारों के लिए मंच पर सही व्यवहार सुनिश्चित करने के लिए। इस प्रारंभिक कार्य के बाद हमारे पास लगभग दो घंटे के लिए वास्तविक नाटक पूर्वाभ्यास होते थे। मैंने जो कुछ भी उदय शंकर के साथ सीखा था, उसे मंडली में लाने की कोशिश की। उनकी समय की पाबंदी, हमारे मेकअप लगाने की गंभीरता और प्रदर्शन से पहले व्यायाम करना। एक थिएटर मंडली के लिए हमारे पास स्वाभाविक रूप से कोई नृत्य या शारीरिक कसरत नहीं थी शो से पहले, लेकिन पृथ्वीराज ने नियमित नृत्य कक्षाओं को दिनचर्या में शामिल किया। ताकि जब भी हम किसी नए शहर में जाते, हम सब अपने स्नान और नाश्ते के बाद सुबह एक निश्चित समय पर इकट्ठा होते, और मेरी नृत्य कक्षा के साथ शुरुआत करते।”
सिनेमा का सफ़र
एक तरफ़ ज़ोहरा सहगल रंगमंच से जुड़ी थीं, तो दूसरी ओर उन्होंने फ़िल्मों में भी अभिनय शुरू कर दिया। ख़्वाज अहमद अब्बास द्वारा निर्देशित इप्टा की पहली फ़िल्म ‘धरती के लाल’ (1946) के साथ—साथ उन्होंने चेतन आनन्द निर्देशित फ़िल्म ‘नीचा नगर’ में भी अदाकारी की। 29 सितम्बर, 1946 को कान फ़िल्म फेस्टिवल में ‘नीचा नगर’ रिलीज हुई। इस फ़िल्म को कान फ़िल्म फेस्टिवल के सर्वोच्च सम्मान ‘द पाम डओर’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। इन फ़िल्मों के अलावा उन्होंने ‘अफसर’, ‘फ़रेब’, ‘पैसा’ और ‘हीर’ जैसी फ़िल्मों में अभिनय किया। कई हिन्दी फ़िल्मों के लिए कोरियोग्राफी की, जिनमें गुरु दत्त की ‘बाजी’ (1951) और राज कपूर की सुपर हिट फ़िल्म ‘आवारा’ का क्लासिक ड्रीम सीक्वेंस शामिल है। अपने जीवन साथी कामेश्वर सहगल के साथ उन्होंने लाहौर में कुछ दिन ‘ज़ोरेश डांस इंस्टीट्यूट’ भी चलाया। साल 1960 में नाट्य अकादमी दिल्ली की निदेशक रहीं और 1974 में दिल्ली में राष्ट्रीय लोक नृत्य कलाकारों के एक ट्रूप की स्थापना भी की। ज़ोहरा सहगल ने रंगमंच, फ़िल्म और नृत्य के क्षेत्र में लगातार उल्लेखनीय कार्य किए। अपने काम का और विस्तार करने की ख़ातिर 1962 में एक ड्रामा फेलोशिप मिलने पर लंदन चली गईं। और यहॉं उन्होंने ‘डॉक्टर हू’, ‘द ज्वेल इन द क्राउन’, ‘तंदूरी नाइट्स’, ‘माई ब्यूटीफुल लॉन्ड्रेट’, और ‘द राज क्वार्टेट’ जैसे ब्रिटिश टेलीविजन क्लासिक्स में काम किया। फ़िल्म ‘बेंड इट लाइक बेकहम’ में अहम भूमिका निभाई। 1990 में ज़ोहरा सहगल भारत लौट आईं और अपनी ज़िंदगी के आख़िर तक यहीं रहीं। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों, नाटकों और टीवी सीरियल में अभिनय किया। ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ में निभाए उनके किरदार को भला कौन भूल सकता है। ज़ोहरा सहगल के काव्य पाठ भी बेहद मक़बूल हुए। वे हिन्दी के अलावा उर्दू और पंजाबी में काव्य पाठ करती थीं। ‘एन इवनिंग विद ज़ोहरा सहगल’ प्रोग्राम के लिए उन्होंने पाकिस्तान के अलावा कई देशों की यात्रा की। ज़ोहरा सहगल ने ‘दिल से’, ‘हम दिल दे चुके सनम’, ‘वीर ज़ारा’, ‘सांवरिया’, ‘चीनी कम’ और ‘चलो इश्क़ लड़ाएं’ जैसी सुपर हिट हिंदी फिल्मों में अभिनय किया। और अपनी उम्र के आठवें—नवें दशक में भी अपनी अदाकारी का लोहा मनवा लिया।

102 साल सक्रियता के
रंगमंच, नृत्य और सिनेमा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य के लिए भारत सरकार ने ज़ोहरा सहगल को ‘पद्म श्री’, ‘पद्म भूषण’, ‘पद्म विभूषण’, ‘संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार’ और ‘कालिदास सम्मान’ जैसे बड़े पुरस्कारों और सम्मान से नवाज़ा। संगीत नाटक अकादमी ने उन्हें ‘लाइफ टाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ के तौर पर अपनी फेलोशिप भी दी। ‘क़रीब से’ ज़ौहरा सहगल की आत्मकथा है, तो वहीं उनकी बेटी किरण सहगल ने ‘ज़ोहरा सहगल फैटी’ नाम से एक जीवनी लिखी है। अपनी ज़िंदगी के सौ साल पूरा कर लेने के बाद भी वे बेहद सक्रिय थीं। उनकी इस सक्रियता को देखकर लोग अक्सर हैरान होते थे। जब कोई ज़ोहरा सहगल से उनकी लंबी उम्र का राज़ पूछता, तो उनका जवाब होता, ”लंबे समय तक सक्रिय रहना। अगर आप निष्क्रिय होकर घर पर बैठ गए, तो समझ लीजिए आप खत्म हो गए।” यही नहीं अपने एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, ”ज़िंदगी मेरे साथ बहुत सख़्त रही है और मैं ज़िंदगी के साथ।” 2014 की 10 जुलाई को 102 साल की उम्र में ज़ोहरा सहगल ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। ज़िंदगी के कई हसीन और यादगार दौर देखने वाली ज़ौहरा सहगल नास्तिक थीं। और ज़िंदगी के जानिब उनका नज़रिया बेहद पॉजिटिव था। अपनी वसीयत में उन्होंने स्पष्ट तौर पर लिखा था, ”जब मैं मरूॅं, तो मैं नहीं चाहती कि तब किसी तरह का धार्मिक अनुष्ठान हो। अगर शवगृह के लोग मेरी अस्थियॉं रखने से मना करें, तो मेरे बच्चे उसे घर लाकर टॉयलेट में बहा दें।…”
