

भारत में शहर-शहर होने शुरू हो गए फिल्म फेस्टिवल्स को लेकर हमने फिल्मकार इरशाद दिल्लीवाला की इस सीरीज़ फिल्म फेस्टिवल्स का काला सच के पहले भाग में बताया कि किस तरह कुछ लोग फ़र्ज़ी फेस्टिवल्स का जाल बिछाते हैं जिसे देखकर नए फिल्मकार अपनी फिल्म को एक बेहतर प्लैटफॉर्म पर दिखाने, पहचान पाने की उम्मीद लिए उनके झांसे में आ जाते हैं। इस सीरीज़ के दूसरे और अंतिम भाग में इरशाद दिल्लीवाला बता रहे हैं कि ऐसे फिल्म फेस्टिवल्स की पहचान कैसे करें, इनसे कैसे बचें…। साथ ही ये भी बता रहे हैं कि इन पर शिकंजा क्यों नहीं कसा जा पा रहा है या फिर सरकारी तंत्र की क्या कमी है और क्या सीमाएं हैं। दुनियाभर के प्रमुख फिल्मकार भी इस नए ट्रेंड को लेकर चेतावनी देते रहे हैं, सावधान करते रहे हैं। ये पूरा आलेख दिल्ली के स्वतंत्र फिल्मकार इरशाद दिल्लीवाला ने अपने निजी अनुभवों और रिसर्च के आधार एक विस्तृत आलेख लिखा है, जिसे अगर काला सच कहें तो गलत नहीं होगा। इस लेख को हम दो अंकों में यहां प्रस्तुत कर रहे हैं। इरशाद दिल्लीवाला एक फिल्ममेकर, वीडियो एडिटर, डिज़ाइनर और लेखक हैं। उन्होंने फिल्म एंड टेलीविज़न इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया (FTII), पुणे से वीडियो और फिल्म प्रोडक्शन में प्रशिक्षण प्राप्त किया है। अब तक वे 1,500 से अधिक वीडियो एडिट कर चुके हैं, जिनमें डॉक्यूमेंट्री, कमर्शियल्स, पॉडकास्ट, प्रोमो, म्यूज़िक वीडियो और न्यूज़ एपिसोड शामिल हैं। उनकी शॉर्ट फिल्म ‘वापसी – द रिटर्न’ को 2010 में मुंबई फिल्म महोत्सव (MAMI) में प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बतौर लेखक और समीक्षक वे लगातार सिनेमा और इसकी दुनिया की अपनी संवेदनशील दृष्टिकोण और तकनीकी गहराई से पड़ताल करते रहते हैं।
सरकारी सिस्टम भी कम परेशान नहीं करता: CBFC की दीवारें और दलाल संस्कृति
दूसरी तरफ, अगर कोई फिल्ममेकर अपनी फिल्म को किसी गंभीर या सरकारी आयोजन में भेजना चाहता है, तो अक्सर उसे CBFC (Central Board of Film Certification) की बाधाओं से गुजरना पड़ता है।
CBFC की आधिकारिक जानकारी के अनुसार, भारत में किसी फिल्म के सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए प्रमाणन आवश्यक है, और यह प्रक्रिया Cinematograph Act, 1952 तथा संबंधित नियमों के तहत संचालित होती है। CBFC के अनुसार भारत में सार्वजनिक प्रदर्शन हेतु फिल्में प्रमाणित होना अनिवार्य है।
सिद्धांत रूप में यह व्यवस्था सार्वजनिक हित और कानूनी जवाबदेही के लिए है।
व्यवहार में कई स्वतंत्र फिल्ममेकर्स का अनुभव इससे बिल्कुल उलट है:
- पोर्टल/सर्वर की दिक्कतें
- तारीख पर तारीख
- अनावश्यक देरी
- अस्पष्ट आपत्तियाँ
- तकनीकी बाधाएँ
- और कार्यालयों के बाहर सक्रिय “मददगार” दलाल
CBFC की वेबसाइट पर अब e-Cinepramaan / ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन व प्रक्रिया का उल्लेख है, लेकिन स्वतंत्र फिल्ममेकर्स लगातार शिकायत करते रहे हैं कि डिजिटल व्यवस्था का लाभ ज़मीन पर हमेशा सहज रूप में नहीं दिखता। CBFC की आधिकारिक साइट पर ऑनलाइन पंजीकरण और आवेदन प्रक्रिया उपलब्ध है।
यानी एक तरफ फर्जी या संदिग्ध फेस्टिवल बिना किसी वास्तविक जाँच के फिल्में स्वीकार कर रहे हैं,
दूसरी तरफ वैध प्रक्रिया अपनाने वाला फिल्ममेकर सिस्टम में पिस रहा है।
‘फेसबुक’ शब्द पर आपत्ति: रचनात्मकता बनाम प्रशासनिक मानसिकता

फिल्म प्रमाणन की प्रक्रिया में कई स्वतंत्र रचनाकारों के अनुभव बताते हैं कि आपत्तियाँ कई बार सामग्री की गंभीरता या सार्वजनिक प्रभाव के बजाय बेहद सतही स्तर पर अटक जाती हैं।
उदाहरण के तौर पर, यदि किसी फिल्म में सिर्फ किसी प्लेटफॉर्म या ब्रांड का नाम आ जाए, तो उस पर आपत्ति दर्ज कर दी जाती है—भले उसका संदर्भ कलात्मक, कथात्मक या सामाजिक हो।
जब मैं अपनी शॉर्ट फिल्म को सेंसर कराने गया (अगर आपको सरकारी फेस्टिवल में फिल्म भेजनी है तो सेंसर अनिवार्य होता है) तो लंबे इंतजार के बाद जब स्क्रीनिंग का समय आया तो तीन पर्यवेक्षक आएं ही नहीं उनमें केवल एक ही आया उसने फिल्म देखी और फिजूल की बातें करने लगा बोला इसमें आपने एक जगह फेसबुक का नाम लिया है वो हटा दrजिये
मैंने पूछा इससे क्या नुकसान होगा किसी भावनाएं आहत होगी वो बोले कि इससे फेसबुक के मालिक को ऑब्जेक्शन हो सकता है,
मैंने कहा आप उन्हें जानते है उन्होंने कहा नहीं मैं नहीं जानता लेकिन मैंने कहा मैं उन्हे जानता हूं उनका नाम मार्क जुकरबर्ग है भला उन्हें इससे क्या आपत्ति होगी आप कृपया इसे पास कर दीजिये। लेकिन वो नहीं माने और मजबूरन मुझे अपनी फिल्म से फेसबुक शब्द काटना पड़ा। यह कैसा मजाक है इन लोगों की समझ किस प्रकार की है। यह आप अच्छे से समझ गए होगे।
सबसे बड़ा सवाल: फर्जी फेस्टिवलों पर नियंत्रण कौन करेगा?
यदि किसी आयोजन में फिल्म भेजने के लिए प्रमाणपत्र अनिवार्य है, तब भी असली समस्या वहीं की वहीं है—
फर्जी या संदिग्ध फेस्टिवल तो बिना किसी गंभीर सत्यापन के फिल्में स्वीकार कर लेते हैं।
उन्हें चाहिए:
- एंट्री फीस
- अतिरिक्त कैटेगरी फीस
- अटेंडेंस फीस
- अवार्ड नाइट टिकट
- फोटो-ऑप
- सोशल मीडिया कंटेंट
उन्हें आपकी फिल्म की यात्रा से अधिक मतलब आपके भुगतान से होता है।
यहीं सबसे बड़ा नीति-संबंधी प्रश्न खड़ा होता है:
क्या भारत में फिल्म फेस्टिवलों के लिए कोई न्यूनतम मानक होने चाहिए?
जैसे:

- अनिवार्य पंजीकरण/ मान्यता प्रणाली
- पिछले संस्करणों की सार्वजनिक रिपोर्ट
- जूरी का खुला विवरण
- स्क्रीनिंग वेन्यू और दर्शक डेटा की पारदर्शिता
- फीस स्ट्रक्चर की स्पष्टता
- “अलग कैटेगरी” फीस पर सीमा या खुला खुलासा
- पुरस्कार राशि/ वास्तविक लाभ की जानकारी
- फिल्ममेकर शिकायत निवारण तंत्र
- झूठे ‘इंटरनेशनल’ या‘सरकारी’ दावों पर कार्रवाई
- Misleading branding पर दंडात्मक प्रावधान
दुनिया भर के फिल्ममेकर्स भी दे रहे हैं चेतावनी
यह समस्या सिर्फ भारत तक सीमित नहीं मानी जाती। अंतरराष्ट्रीय फिल्ममेकिंग समुदायों—विशेषकर ऑनलाइन मंचों और फिल्ममेकर्स फोरम्स—पर भी लगातार यह चर्चा होती रही है कि कई तथाकथित फेस्टिवल “laurel mills” या “pay-to-win” मॉडल पर चलते हैं। Reddit जैसे समुदायों में फिल्ममेकर्स बार-बार चेतावनी देते रहे हैं कि अत्यधिक फ्लैटरी वाले ईमेल, अस्पष्ट जूरी, नकली रिव्यू, लगातार फीस-आधारित “इनवाइट” और कमज़ोर डिजिटल विश्वसनीयता बड़े रेड फ्लैग हो सकते हैं।
यानी खतरा वास्तविक है—और नया फिल्ममेकर सबसे आसान शिकार।
नये फिल्ममेकर्स के लिए 10 जरूरी सावधानियां
अगर आप शॉर्ट फिल्म, डॉक्यूमेंट्री या इंडी फीचर बना रहे हैं, तो किसी भी फेस्टिवल में भेजने से पहले ये बातें ज़रूर जाँचें:

- 1. पिछले साल के विजेता कौन थे?
- क्या वे वास्तविक फिल्में हैं? क्या उनके निर्देशक मौजूद हैं?
- 2. क्या फेस्टिवल का कोई वास्तविक डिजिटल फुट प्रिंट है?
- सिर्फ पोस्टर नहीं—वीडियो, फोटो, मीडिया कवरेज, जूरी इंटरव्यू, प्रेस नोट?
- 3. जूरी कौन है?
- क्या नाम, प्रोफाइल, कार्यक्षेत्र स्पष्ट हैं?
- 4. क्या फेस्टिवल सिर्फ‘अवार्ड’ बेच रहाहै?
- अगर हर चीज़ “Best ___” है, तो सावधान।
- 5. क्या बार-बारअलग कैटेगरी में फीस मांगी जा रही है?
- यह बड़ा संकेत हो सकता है।
- 6. क्या कोई वास्तविक स्क्रीनिंग है?
- ऑनलाइन PDF अवार्ड या Zoom “ceremony” ही सब कुछ तो नहीं?
- 7. क्या कोई मार्केट/ नेटवर्किंग/ इंडस्ट्री वैल्यू है?
- वितरक? प्रोग्रामर? OTT? फिल्म सोसाइटी? प्रेस?
- 8. क्या लोकेशन और वेन्यू स्पष्ट है?
- सिर्फ “दिल्ली”, “मुंबई” लिख देना काफी नहीं।
- 9. क्या‘इनविटेशन’ के साथ फीस मांगी जा रही है?
- बिना fee waiver वाला “we love your film” मेल अक्सर सिर्फ मार्केटिंग हो सकता है।
- 10. क्या फिल्ममेकर समुदाय में उसकी साख है?
- दो-चार भरोसेमंद लोगों से पूछना हमेशा बेहतर है।

सरकार क्या करे?
अगर सरकार सच में भारतीय सिनेमा और स्वतंत्र फिल्ममेकर्स को बढ़ावा देना चाहती है, तो उसे सेंसर और नियंत्रण से आगे बढ़कर यह करना होगा:
- राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल रजिस्ट्री बनाए
- फेस्टिवल आयोजकों के लिए कम्प्लायंस फ्रेमवर्क लाए
- एंट्री फीस पारदर्शिता मानक तय करे
- फर्जी/भ्रामक ब्रांडिंग पर कानूनी कार्रवाई करे
- स्वतंत्र फिल्ममेकर्स के लिए ग्रिवांस पोर्टल खोले
- सरकारी व निजी फेस्टिवलों की अलग श्रेणियाँ बनाए
- CBFC प्रक्रिया को समयबद्ध, पारदर्शी और भ्रष्टाचार-मुक्त करे
- फिल्म सोसाइटी, FTII/SRFTI/राज्य फिल्म बोर्ड्स और स्वतंत्र विशेषज्ञों के साथ मिलकर विश्वसनीय फेस्टिवल इंडेक्स जारी करे
निष्कर्ष: सिनेमा नहीं, भरोसा लूटा जा रहा है
आज भारत में सिर्फ फिल्मों का शोषण नहीं हो रहा,
नये फिल्ममेकर के भरोसे का शोषण हो रहा है।
वह अपनी जेब काटकर फिल्म बनाता है।
उम्मीद से फेस्टिवल में भेजता है।
फिर उसे कहा जाता है—और फीस दो, और कैटेगरी लो, और रुकिए, और आइए, और खर्च कीजिए।
बदले में उसे न बाज़ार मिलता है, न मंच, न सम्मान का वास्तविक मूल्य।
यह सिर्फ आर्थिक ठगी नहीं—
यह रचनात्मक सपनों की व्यवस्थित लूट है।
जिस व्यक्ति को पुलिस की सलाखों के पीछे होना चाहिए, वह अगले साल के फेस्टिवल के पोस्टर के साथ सोशल मीडिया पर फिर सक्रिय है।
और जो युवा फिल्ममेकर अपने पहले काम के साथ आया था, वह एक और निराशा लेकर लौट रहा है।
अगर अभी भी इस पर बात नहीं हुई,
तो आने वाले वर्षों में भारत में “फिल्म फेस्टिवल” शब्द का अर्थ ही बदल जाएगा—
सिनेमा का उत्सव नहीं, एंट्री फीस का कारोबार।
Disclaimer अस्वीकरण: इस लेख का मकसद NDFF द्वारा किसी भी विशेष फिल्म समारोह या अन्य फिल्म समारोहों पर उंगली उठाना नहीं है। फिल्म समारोह में प्रविष्टियां मंगवाने के लिए अर्ली बर्ड या एक्सटेंडेड डेडलाइन जैसी बातें कई प्रतिष्ठित फिल्म समारोहों में भी अपनाई जाती है, लेकिनव आयोजन और प्रक्रिया की इन व्यावहारिक औपचारिकताओं को कुछ आयोजक निरंतर दुरुपयोग कर रहे हैं, जिनका निजी तौर पर अनुभव करने के बाद ही लेखक ने ये लेख लिखा है।
