

भारतीय प्रगतिशील सिनेमा और निडर पत्रकारिता के पुरोधा ख्वाजा अहमद अब्बास ने साहित्य, सेल्युलाइड और सामाजिक सक्रियता की दुनिया को एक सूत्र में पिरोया। यह लेख एक ऐसे महान कथाकार की विरासत को सामने लाता है जिसने असमानता के खिलाफ अपने हुनर को हथियार बनाया, यथार्थवादी सिनेमा को नई दिशा दी और भारतीय सिनेमा को सामाजिक रूप से जागरूक और कालजयी कहानियाँ सौंपीं। जून के महीने में उनकी जयंती होती है और पुण्यतिथि भी। ज़ाहिद खान ये लेख उनके काम को एक रचनात्मक श्रद्धांजलि है। लेखक ज़ाहिद ख़ान का विस्तृत कार्य है। उनकी कुछ अहम किताबें हैं—‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक का कारवॉं’, ‘तहरीक—ए—आज़ादी और तरक़्क़ीपसंद शायर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’। ‘शैलेन्द्र हर ज़ोर—ज़ुल्म की टक्कर में’, ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ और ‘ऋत्विक घटक: नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ ज़ाहिद ख़ान द्वारा सम्पादित किताबें हैं। ज़ाहिद ख़ान ने कृश्न चन्दर, हमीद अख़्तर, अली सरदार जाफ़री, मख़दूम मोहिउद्दीन की कृतियों के साथ-साथ मजाज़ और मंटो पर भी महत्वपूर्ण काम किया है।
ख़्वाजा अहमद अब्बास मुल्क के उन गिने—चुने लेखकों में शामिल हैं, जिन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ़ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम क़ायम किए। तरक़्क़ी—पसंद तहरीक से जुड़े हुए क़लमकारों और कलाकारों की फ़ेहरिस्त में ख़्वाजा अहमद अब्बास का नाम बहुत अदब से लिया जाता है। तरक़्क़ी—पसंद तहरीक के वे रहबर भी थे और राही भी। भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा के वे संस्थापक सदस्यों में से एक थे। मुंबई में जब 25 मई, 1943 को इप्टा का स्थापना सम्मेलन हुआ, तो उन्हें संगठन के कोषाध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी सौंपी गई, जिसे उन्होंने कई बरसों तक बख़ूबी निभाया। हरफ़नमौला शख़्सियत के धनी अब्बास साहब फ़िल्म निर्माता, निर्देशक, कथाकार, पत्रकार, उपन्यासकार, नाटककार, पब्लिसिस्ट और देश के सबसे लंबे समय तक़रीबन बावन साल तक चलने वाले नियमित स्तंभ ‘द लास्ट पेज’ के स्तंभकार थे। देश में समानांतर या नव-यथार्थवादी सिनेमा की जब भी बात होगी, अब्बास का नाम फ़िल्मों की इस मुख़्तलिफ़ धारा के रहनुमाओं में गिना जाएगा।

छात्र जीवन से ही कलम को बनाया हथियार
ख़्वाजा अहमद अब्बास का जन्म 7 जून, 1914 को हरियाणा के पानीपत में हुआ। उनके दादा ख़्वाजा ग़ुलाम अब्बास 1857 स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानियों में से एक थे और वह पानीपत के पहले क्रांतिकारी थे, जिन्हें तत्कालीन अंग्रेज़ हुकूमत ने तोप के मुॅंह से बॉंधकर शहीद किया था। इस बात का भी शायद ही बहुत कम लोगों को इल्म हो कि ख़्वाजा अहमद अब्बास मशहूर और मारूफ़ शायर मौलाना अल्ताफ़ हुसैन हाली के परनवासे थे। यानी वतन के लिए कुछ करने का जज़्बा और जोश उनके ख़ून में ही था। अदब से मुहब्बत की तालीम उन्हें विरासत में मिली थी। ख़्वाजा अहमद अब्बास की शुरुआती तालीम हाली मुस्लिम हाई स्कूल में और आला तालीम अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में हुई। उनके अंदर एक रचनात्मक बैचेनी नौजवानी से ही थी। वे भी देश के लिए कुछ करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने क़लम को अपना हथियार बनाया। छात्र जीवन से ही वे पत्रकारिता से जुड़ गए। उन्होंने ‘अलीगढ़ ओपिनियन’ नाम की देश की पहली छात्र-प्रकाशित पत्रिका शुरू की। जिसमें उन्होंने उस वक़्त देश की आज़ादी के लिए चल रही तहरीक से मुताल्लिक़ कई लेख प्रकाशित किए।
बेबाक पत्रकारिता और ‘द लास्ट पेज’
ख़्वाजा अहमद अब्बास ने उस समय लिखना शुरू किया, जब देश अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था। पराधीन भारत में लेखन से समाज में अलख जगाना, उस वक़्त सचमुच एक चुनौतीपूर्ण कार्य था, पर उन्होंने यह चुनौती मंज़ूर की और ज़िंदगी के आख़िर तक अपनी क़लम को विराम नहीं लगने दिया। अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद अब्बास जिस सबसे पहले अख़बार से जुड़े, वह ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ था। इस अख़बार में बतौर संवाददाता और फ़िल्म समीक्षक उन्होंने साल 1947 तक काम किया। अपने दौर के मशहूर साप्ताहिक ‘ब्लिट्ज’ से उनका नाता लंबे समय तक रहा। इस अख़बार में प्रकाशित उनके कॉलम ‘लास्ट पेज’ ने उन्हें देश भर में काफ़ी शोहरत दिलाई। अख़बार के उर्दू और हिंदी संस्करण में भी यह कॉलम क्रमशः ‘आज़ाद क़लम’ और ‘आख़िरी पन्ने’ के नाम से प्रकाशित होता था। अख़बार में यह कॉलम उनकी मौत के बाद ही बंद हुआ। ‘बॉम्बे क्रॉनिकल’ और ‘ब्लिट्ज’ के अलावा ख़्वाजा अहमद अब्बास ने कई दूसरे अख़बारों के लिए भी लिखा। मसलन ‘क्विस्ट’, ‘मिरर’ और ‘द इंडियन लिटरेरी रिव्यूव’। एक पत्रकार के तौर पर उनकी राष्ट्रवादी विचारक की भूमिका और दूरदर्शिता का कोई सानी नहीं है। अपने लेखों के जरिए उन्होंने समाजवादी विचार लगातार लोगों तक पहुॅंचाए। उनके लेखन में समाज के मुख़्तलिफ़ पहलुओं की तफ़सील से जानकारी मिलती है। अपने दौर के तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर उन्होंने अपनी क़लम चलाई। ख़्वाजा अहमद अब्बास को अपने समय की मशहूर शख़्सियतों के साथ रहने और बात करने का मौक़ा भी मिला। मसलन अख़बारों के लिए उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूज़वेल्ट, चार्ली चैपलिन, यूरी गागरिन आदि से लंबी बातचीत की।
इप्टा के सांस्कृतिक आंदोलन को मज़बूती दी
अपनी स्थापना के कुछ ही दिन बाद इप्टा का सांस्कृतिक आंदोलन जिस तरह से पूरे मुल्क में फैला, उसमें ख़्वाजा अहमद अब्बास का अहम हाथ है। उस वक़्त इप्टा के जो भी बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम बने, उसमें उनका अमूल्य योगदान है। अब्बास ने इप्टा के संगठनात्मक कामों के अलावा उसके लिए ख़ूब नाटक भी लिखे। यही नहीं कई नाटकों का निर्देशन भी किया। ‘यह अमृता है’, ‘बारह बजकर पॉंच मिनिट’, ‘ज़ुबैदा’, ‘लाल गुलाब की वापसी’ और ‘चौदह गोलियॉं’ उनके मक़बूल नाटक हैं। अब्बास उन नाटककारों में शामिल हैं, जिनके नाटकों की वजह से भारतीय रंगमंच में यथार्थवादी रुझान आया। यथार्थवादी रंगमंच को प्रतिष्ठा मिली। अब्बास के नाटकों में उन सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक हालात के ख़िलाफ़ संघर्ष करने की राह मिलती है, जिसकी वजह से इंसान ग़ुलाम बना हुआ है। वे अब्बास ही थे, जिन्होंने मशहूर अभिनेता, लेखक बलराज साहनी को इप्टा और फ़िल्मों से जोड़ा। अपनी किताब ‘बलराज साहनी : एक आत्मकथा’ में बलराज ने ख़ुद इस बात को माना है कि ‘‘बंबई में, कलाकारों की पंक्ति में खड़े होने की जगह मुझे अब्बास ने ही दिलाई थी।’’ अब्बास के नाटक ‘ज़ुबैदा’ के जब निर्देशन की बारी आई, तो उन्होंने ही इसके निर्देशन के लिए बलराज का नाम सुझाया था। कहना ना चाहिए, इस नाटक के निर्देशन के बाद बलराज साहनी की जैसे ज़िंदगी ही बदल गई। नाटक कामयाब रहा और बलराज साहनी इप्टा के हो गए।

सेल्युलाइड पर यथार्थ: भारतीय सिनेमा को दी नई दिशा
इप्टा द्वारा साल 1946 में बनाई गई पहली फ़िल्म ‘धरती के लाल’ ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ही निर्देशित की थी। कहने को यह फ़िल्म इप्टा की थी, लेकिन इस फ़िल्म में मुख्य भूमिका अब्बास ने ही निभाई थी। फ़िल्म के लिए लायसेंस लेने से लेकर तमाम ज़रूरी संसाधन जुटाने का काम उन्होंने ही किया था। बंगाल के अकाल पर बनी यह फ़िल्म कई अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में समीक्षकों द्वारा सराही गई। इस फ़िल्म में जो प्रमाणिकता दिखलाई देती है, वह अब्बास की कड़ी मेहनत का ही नतीजा है। बंगाल के अकाल की वास्तविक जानकारी इक्कट्ठा करने के लिए उन्होंने उस वक़्त बाक़ायदा अकालग्रस्त इलाक़ों का दौरा भी किया। ‘धरती के लाल’ को भारत की पहली यथार्थवादी फ़िल्म होने का तमगा हासिल है। इस फ़िल्म की कहानी और संवाद ख़्वाजा अहमद अब्बास ने ही लिखे थे। बिजन भट्टाचार्य के दो नाटक ‘जबानबंदी’, ‘नबान्न’ और कृश्न चंदर के काव्यात्मक उपन्यास ‘अन्नदाता’ को आधार बनाकर अब्बास ने इसकी शानदार पटकथा लिखी, जो यथार्थ के बेहद क़रीब थी। हिंदी फ़िल्मों के इतिहास में ‘धरती के लाल’ ऐसी फ़िल्म थी, जिसमें देश की मेहनतकश अवाम को पहली बार केन्द्रीय हैसियत में पेश किया गया है। पूरे सोवियत यूनियन में यह फ़िल्म दिखाई गई और कई देशों ने अपनी फिल्म लाइब्रेरियों में इसे स्थान दिया है। इंग्लैंड की प्रसिद्ध ग्रंथमाला ‘पेंग्विन’ ने अपने एक अंक में उसे फ़िल्म-इतिहास में एक महत्वपूर्ण फ़िल्म कहा। सच बात तो यह है ‘धरती के लाल’ फ़िल्म से प्रेरणा लेकर ही बिमल रॉय ने अपनी फ़िल्म ‘दो बीघा ज़मीन’ और सत्यजित राय ने ‘पथेर पांचाली’ में यथार्थवाद का रास्ता अपनाया।
मिट्टी से जुड़ी कहानियाँ: सामाजिक सरोकार वाले सिनेमा का जन्म

ख़्वाजा अहमद अब्बास फ़िल्मों में पार्ट-टाइम पब्लिसिस्ट के रूप में आए थे, लेकिन बाद में वे पूरी तरह से इसमें रम गए। साल 1936 से उनका फ़िल्मों में आग़ाज़ हुआ। सबसे पहले वे हिमांशु राय और देविका रानी की प्रोडक्शन कम्पनी बॉम्बे टॉकीज से जुड़े। आगे चलकर साल 1941 में उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म पटकथा ‘नया संसार’ भी इसी कंपनी के लिए लिखी। साल 1945 में फ़िल्म ‘धरती के लाल’ से ख़्वाजा अहमद अब्बास का करियर एक निर्देशक के रूप में शुरू हुआ। साल 1951 में उन्होंने ‘नया संसार’ नाम से अपनी ख़ुद की फ़िल्म कंपनी खोल ली। ‘नया संसार’ के बैनर पर उन्होंने कई उद्दश्यपूर्ण और सार्थक फ़िल्में बनाईं। मसलन फ़िल्म ‘राही’ (1953) मशहूर अंग्रेज़ी लेखक मुल्कराज आनंद की एक कहानी पर आधारित थी। जिसमें चाय के बागानों में काम करने वाले श्रमिकों की दुर्दशा को दर्शाया गया था। मशहूर निर्देशक वी. शांताराम की चर्चित फ़िल्म ‘डॉ. कोटनिस की अमर कहानी’ अब्बास के अंग्रेज़ी उपन्यास ‘एंड वन डिड नॉट कम बैक’ पर आधारित है। वही फिल्म ‘धरती के लाल’ में उन्होंने देश की सामाजिक विषमता का यथार्थवादी चित्रण किया है। फ़िल्म प्रत्यक्ष रूप से ज़मींदारों, पूॅंजीपतियों, व्यापारियों की और अप्रत्यक्ष रूप से अंग्रेज़ी हुकूमत की आलोचना करती है। ‘अनहोनी’ (1952) सामाजिक विषय पर एक विचारोत्तेजक फ़िल्म थी। फ़िल्म ‘शहर और सपना’ (1963) में फुटपाथ पर जीवन गुजारने वाले लोगों की समस्याओं का वर्णन है, तो ‘दो बूँद पानी’ (1971) में राजस्थान के रेगिस्थान में पानी की विकराल समस्या को दर्शाया गया है। गोवा की आजादी पर आधारित ‘सात हिंदुस्तानी’ भी उनकी एक उल्लेखनीय फ़िल्म है।
राज कपूर की कालजयी फिल्मों का लेखन
ख़्वाजा अहमद अब्बास की यथार्थवाद में गहरी जड़ें थीं। उनके लिए सिर्फ़ फ़िल्म ही महत्वपूर्ण थीं, न कि उससे जुड़े आर्थिक फ़ायदे। अब्बास के लिए सिनेमा समाज के प्रति एक कटिबद्धता थी और इस लोकप्रिय माध्यम से उन्होंने समाज को काफ़ी कुछ देने की कोशिश की। वे सिनेमा को बहुविधा कला मानते थे, जो मनोवैज्ञानिक और सामाजिक वास्तविकता के सहारे लोगों में वास्तविक बदलाव की आकांक्षा को जन्म दे सकती है। मशहूर निर्माता-निर्देशक राज कपूर के लिए ख़्वाजा अहमद अब्बास ने जितनी भी फ़िल्में लिखीं उन सभी में हमें एक मज़बूत सामाजिक मुद्दा मिलता है। चाहे यह ‘आवारा’ हो, ‘जागते रहो’ (1956), या फिर ‘श्री 420’। पैंतीस वर्षों के अपने फ़िल्मी करियर में अब्बास ने तेरह फ़िल्मों का निर्माण किया। लगभग चालीस फ़िल्मों की कहानी और पटकथाएँ लिखीं, जिनमें ज़्यादातर राज कपूर की फ़िल्में हैं। उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर में मल्टीस्टार, रंगीन, गीतयुक्त, वाइड स्क्रीन फ़िल्म, बिना गीत की फ़िल्म और सह निर्माता के रूप में एक विदेशी फ़िल्म का निर्माण भी किया। फ़िल्मों में उन्हें जब कभी मौक़ा मिलता, वे नव यथार्थवाद को मज़बूत करने से नहीं चूकते थे। अब्बास की ज़्यादातर फ़िल्में सामाजिक व राष्ट्रीय चेतना की महान दस्तावेज़ हैं। उनके बिना हिंदी फ़िल्मों में नेहरू के दौर और रूसी लाल टोपी का तसव्वुर नहीं किया जा सकता।

सिनेमा को बनाया आम आदमी की आवाज़
अब्बास को भले ही फ़िल्मकार के रूप में अंतरराष्ट्रीय पहचान मिली हो, लेकिन बुनियादी तौर पर वे एक अफ़साना—निगार थे। अब्बास एक बेहतरीन अदीब थे। उन्होंने साहित्य की लगभग सभी विधाओं कहानी, उपन्यास, नाटक, रिपोर्ताज में जमकर लिखा। अब्बास की कहानियों की तादाद कोई एक सैकड़े से ऊपर है। उन्होंने अंग्रेज़ी, उर्दू और हिंदी तीनों भाषाओं में जमकर लिखा। अब्बास उर्दू में भी उतनी ही रवानी से लिखते थे, जितना कि अंग्रेज़ी में। दुनिया की तमाम भाषाओं में उनकी कहानियों के अनुवाद हुए। अब्बास की कहानियों में वे सब चीज़ें नज़र आती हैं, जो एक अच्छी कहानी में बेहद ज़रूरी हैं। सबसे पहले एक शानदार मानीख़ेज़ कथानक, किरदारों का हक़ीक़ी चरित्र-चित्रण और ऐसी क़िस्सागोई कि कहानी शुरू करते ही, ख़त्म होने तक पढ़ने का जी करे। एक अहम बात और, उनकी कहानियों में कई बार ऐसे मोड़ आते हैं, जब पाठकों को लाजवाब कर देते हैं। वह एक दम हक्का-बक्का रह जाता है। कहानी संग्रह ‘नई धरती नए इंसान’ की भूमिका में अब्बास लिखते हैं, ‘‘साहित्यकार और समालोचक कहते हैं, ‘ख़्वाजा अहमद अब्बास उपन्यास या कहानियॉं नहीं लिखता। वह केवल पत्रकार है। साहित्य की रचना उसके बस की बात नहीं।’ फ़िल्मवाले कहते हैं, ‘ख़्वाजा अहमद अब्बास को फ़िल्म बनाना नहीं आता। उसकी फ़ीचर फ़िल्म भी डॉक्यूमेंट्री होती है। वह कैमरे की मदद से पत्रकारिता करता है, क़लम की रचना नहीं।’ और ख़्वाजा अहमद अब्बास खुद़ क्या कहता है ? वह कहता है-‘मुझे कुछ कहना है..’ और वह मैं हर संभावित ढंग से कहने का प्रयास करता हूॅं। कभी कहानी के रूप में, कभी ‘ब्लिट्ज’ या ‘आख़िरी सफ़्हा’ और ‘आज़ाद क़लम’ लिखकर। कभी दूसरी पत्रिकाओं या समाचार-पत्रों के लिए लिखकर। कभी उपन्यास के रूप में, कभी डॉक्यूमेंट्री फ़िल्म बनाकर। कभी-कभी स्वयं अपनी फ़िल्में डायरेक्ट करके भी।’’
एक अमर विरासत: आज के दौर में क्यों प्रासंगिक हैं के.ए. अब्बास?

ख़्वाजा अहमद अब्बास का लेखन किसी सरहद का मोहताज नहीं था, उनका लेखन सरहदों से पार भी पहुॅंचा। उनकी कई किताबों का अनुवाद भारतीय और विदेशी भाषाओं मसलन रूसी, जर्मन, इतालवी, फ्रेंच और अरबी में किया गया है। ख़्वाजा अहमद अब्बास के महत्वपूर्ण लेखों का संकलन हमें उनकी दो किताबों ‘आई राइट एज आई फील’ और ‘ब्रेड, ब्यूटी एंड रिवोल्यूशन’ में मिलता है। अब्बास ने अपनी आत्मकथा भी लिखी, जो कि ‘आई एम नॉट एन आईलैंड : एन एक्सपेरिमेंट इन आटोबायोग्राफी’ नाम से साल 1977 में प्रकाशित हुई। अपने बेमिसाल काम के लिए ख़्वाजा अहमद अब्बास कई सम्मानों और पुरस्कार से नवाज़े गए। ‘शहर और सपना’ के अलावा अब्बास साहब की दो फ़िल्मों, ‘सात हिंदुस्तानी’ (1969) और ‘दो बूॅंद पानी’ (1972) ने राष्ट्रीय एकता पर बनी सर्वश्रेष्ठ फ़ीचर फ़िल्म के लिए ‘नरगिस दत्त पुरस्कार’ जीते। ‘सात हिंदुस्तानी’ में ही उन्होने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन को पहला ब्रेक दिया था। वहीं उनकी लिखी पटकथा वाली (सह-लेखक हयातुल्ला अंसारी) एक और फ़िल्म ‘नीचा नगर’ (1946) को ख़ूब अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिली और इसने पहले कान फ़िल्म समारोह में सर्वोच्च ‘पाम डी’ओर’ (तब ग्रां प्री के नाम से) पुरस्कार भी जीता। इस फिल्म के निर्देशक चेतन आनंद थे और संगीत पंडित रविशंकर ने दिया था। रूस के सहयोग से बनी फ़िल्म ‘परदेसी’ (1957) इस पुरस्कार के लिए नामित होने वाली उनकी दूसरी फ़िल्म थी। फ़िल्मों के अलावा ख़्वाजा अहमद अब्बास की साहित्यिक उपलब्धियों के लिए भी कई पुरस्कार मिले। उन्हें भारत सरकार ने साल 1969 में ‘पद्मश्री’ से सम्मानित किया। फ़िल्मों और साहित्य के क्षेत्र में उनके शानदार योगदान को सलाम करते हुए सोवियत संघ सरकार ने उन्हें साल 1984 और 1985 में दो बार सम्मानित किया। जिसमें उन्हें मिला ‘लेनिन शांति पुरस्कार’ भी शामिल है।
सच्चे वतनपरस्त, सेकुलर और समाजवाद के पैरोकार
ख़्वाजा अहमद अब्बास एक सच्चे वतनपरस्त और सेक्युलर इंसान थे। उनकी दोस्ती का दायरा काफ़ी विस्तृत था, उनके सबसे क़रीबी दोस्तों में शामिल थे—इन्दर राज आनन्द, मुनीष नारायण सक्सेना, वी.पी. साठे, करंजिया, राज कपूर, कृश्न चंदर, अली सरदार जाफ़री आदि। अपनी वसीयत में उन्होंने लिखा था, ‘‘मेरा जनाज़ा यारों के कंधों पर जुहू बीच स्थित गॉंधी के स्मारक तक ले जाएं लेज़िम बैंड के साथ। अगर कोई ख़िराज-ए-अक़ीदत पेश करना चाहे और तक़रीर करे, तो उनमें सरदार जाफ़री जैसा धर्मनिरपेक्ष मुसलमान हो, पारसी करंजिया हों या कोई रौशन-ख़याल पादरी हो वगैरह, यानी हर मज़हब के प्रतिनिधि हों।’’ ख़्वाजा अहमद अब्बास के लिए समाजवाद केवल किताबों और अध्ययन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने तमाम दुख-परेशानियां और ख़तरे झेलते हुए इसे अपनी ज़िंदगी में भी ढालने की कोशिश की। वह दूसरों के लिए जीने में यक़ीन करते थे। समाजवाद उनके जीने का सहारा था और आख़िरी समय तक उन्होंने इस विचार से अपनी आस नहीं छोड़ी। ‘देश में समाजवाद आए’, इस बात का उनके दिल में हमेशा ख़्वाब रहा। ख़्वाजा अहमद अब्बास ने अपनी आख़िरी सांस मायानगरी मुंबई में ही ली। 1 जून, 1987 को वे इस दुनिया से दूर चले गए। उन्होंने अपने आख़िरी दिनों तक अख़बारों के लिए लिखा। मौत से पहले लिखे अब्बास के वसीयत—नामे को उनकी आख़िरी इच्छा के मुताबिक़ फ़िल्म कॉलम के रूप में प्रकाशित किया गया।
