


भारतीय समानांतर सिनेमा की स्वर्णिम फेहरिस्त में कुछ नाम ऐसे हैं, जिन्हें इतिहास ने एक ‘फुटनोट’ बनाकर छोड़ दिया। अवतार कृष्ण कौल उन्हीं में से एक थे—एक ऐसा फिल्मकार जिसने महज़ एक फिल्म ’27 डाउन’ से सिनेमाई भाषा को बदल दिया, लेकिन सफलता का स्वाद चखने से पहले ही काल के गाल में समा गए। विनोद कौल की पुस्तक ‘अवतार कौल: द (इन)कम्प्लीट स्टोरी’ केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उस खोई हुई सिनेमाई विरासत की तलाश है, जिसे आज की पीढ़ी को जानना और समझना अनिवार्य है। प्रस्तुत है इस पुस्तक की समीक्षा लेखक ज़ाहिद खान की कलम से। ज़ाहिद ख़ान की कुछ अहम किताबें हैं—‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक का कारवॉं’, ‘तहरीक—ए—आज़ादी और तरक़्क़ीपसंद शायर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’। ‘शैलेन्द्र हर ज़ोर—ज़ुल्म की टक्कर में’, ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ और ‘ऋत्विक घटक: नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ ज़ाहिद ख़ान द्वारा सम्पादित किताबें हैं। ज़ाहिद ख़ान ने कृश्न चन्दर, हमीद अख़्तर, अली सरदार जाफ़री, मख़दूम मोहिउद्दीन की कृतियों के साथ-साथ मजाज़ और मंटो पर भी महत्वपूर्ण काम किया है।
एक प्रतिभा जिसे काल ने समय से पहले बुला लिया

हिंदी सिनेमा के गलियारों में कुछ चेहरे सितारों की तरह चमककर ओझल हो जाते हैं, और कुछ ऐसे होते हैं जिनकी एक ही दस्तक सालोंसाल गूँजती है। ये वो डायरेक्टर हैं, जो सिर्फ़ एक फ़िल्म से फ़िल्मी दुनिया में अपनी अविस्मरणीय छाप छोड़ गए। आज भी उन्हें उनकी इन ऑल टाइम क्लासिक फ़िल्मों से जाना जाता है। इनमें पहला नाम, अवतार कौल और दूसरा रबीन्द्र धर्मराज है। ‘चक्र’ फ़िल्म के निर्देशक रबीन्द्र धर्मराज को महज़ 33 साल की उम्र मिली। और उनकी बद—क़िस्मती देखिए, जिस साल 1981 में उनकी फ़िल्म रिलीज हुई, उसी साल उनकी मौत हो गई। यानी फ़िल्म की कामयाबी देखने से पहले ही वे इस दुनिया से रुख़्सत हो गए। इसी फ़िल्म के लिए बाद में स्मिता पाटिल को सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार और फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड से नवाज़ा गया, तो नसीरुद्ददीन शाह को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता और बंसी चन्द्रगुप्त को सर्वश्रेष्ठ कला निर्देशन का फ़िल्मफेयर अवार्ड हासिल हुआ। ठीक यही कहानी इससे पहले अवतार कौल के साथ घटित हुई थी। और साल था 1974। जिस साल उनकी फ़िल्म ’27 डाउन’ को दो राष्ट्रीय पुरस्कारों—सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार और सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफ़ी के पुरस्कार से सम्मानित किए जाने का एलान हुआ, ठीक उसी दिन अपनी महिला दोस्त को समंदर में डूबने से बचाने के चक्कर में उनकी बेवक़्त मौत हो गई। अवतार कौल की उस वक़्त उम्र जानें, तो महज़ 35 साल थी। यह होनहार डायरेक्टर, जो काफ़ी जद्दोजहद कर इस मुक़ाम तक पहुॅंचा था, अपनी कामयाबी नहीं देख पाया।
संघर्ष, सफर और न्यूयॉर्क का वो सबक
अवतार कौल की ज़िंदगी देखें, तो उनकी इब्तिदाई ज़िंदगी बेहद तकलीफ़देह रही। अवतार के पिता अक्सर उनके साथ बद-सुलूकी करते थे और उन्हें बचपन में ही घर से निकाल दिया था। बचपन में अवतार ने एक चाय की दुकान और होटल पर भी काम किया। संघर्षों के बाद विदेश मंत्रालय में उन्हें एक छोटी—सी नौकरी मिल गई और उनका तबादला अमेरिका में हो गया। न्यूयॉर्क में नौकरी के दौरान उन्होंने वहॉं फ़िल्म निर्माण सीखा। भारत लौटने पर कौल ने मर्चेंट आइवरी प्रोडक्शंस की ‘बॉम्बे टॉकी’ में असिस्टेंट डायरेक्टर के तौर पर काम किया। और दो साल बाद अपनी पहली फ़िल्म ’27 डाउन’ शुरू की।
’27डाउन’: जब पटरियों पर सिनेमा उतर आया

बहरहाल, ’27 डाउन’ जब रिलीज हुई, तो इसको न सिर्फ़ दर्शकों का बेशुमार प्यार मिला, बल्कि लीक से हटकर बनी इस आर्ट फ़िल्म की फ़िल्म क्रिटिक और एक्सपर्ट ने भी दिल से सराहना की। ख़ास तौर से फ़िल्म के निर्देशन, फोटोग्राफ़ी और राखी की अदाकारी को ख़ूब तारीफ़ मिली। फ़िल्म को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोहों में भी सराहना और अवार्ड हासिल हुए, जिनमें ख़ास तौर पर ‘लोकार्नो फ़िल्म फेस्टिवल’ और जर्मनी का ‘आईएफएफएमएच’ क़ाबिले—ग़ौर है। इतनी सारी उपलब्धियाँ हासिल करने के बावजूद ’27 डाउन’ और अवतार कौल दोनों को एक लंबे दौर तक गुमनामी का सामना करना पड़ा। समानांतर सिनेमा आंदोलन में उनको वह मुक़ाम हासिल नहीं हुआ, जिसके वह वास्तविक हक़दार थे। यही सब वजह हैं कि अवतार कौल के भांजे विनोद कौल ने उनके ऊपर एक शोधपरक किताब ‘अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ लिखी, जो अवतार कौल के संघर्षमय जीवन और उनके फ़िल्मी सफ़र ख़ास तौर पर ’27 डाउन’ पर तफ़सील से नज़र डालती है।
विनोद कौल, ‘राज्यसभा टीवी’ के कार्यकारी निदेशक पद पर रहे हैं। ‘अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ तक़रीबन 280 पेज की है और दो हिस्सों में बॅंटी हुई है। किताब के पहले और अहम हिस्से में अवतार कौल की ज़िंदगानी के सफ़र को दस्तावेज़, मौखिक इतिहास, अभिलेखों और नायाब तस्वीरों के मार्फ़त पेश किया गया है। चौदह गहन शोधपरक अध्याय अवतार कौल के बचपन, नौजवानी, शिक्षा, संघर्षों और उनकी अमेरिकी पत्नी ऐन कौल की कहानी को तटस्थता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करते हैं। वहीं किताब का दूसरा हिस्सा अवतार कौल को एक शख़्सियत और एक डायरेक्टर के तौर पर समझने की कोशिश है, जिसे उनके साथ काम करने वाले साथियों, क्रू मेम्बरों, जर्नलिस्ट, विद्वानों और फ़िल्म क्रिटिक के तजुर्बों और ख़यालात से बुना गया है। मसलन सिनेमेटोग्राफर ए.के.बीर, साउंड रिकॉर्डिस्ट अरुणोदय शर्मा, एफटीआईआई फैकल्टी पंकज सक्सेना, स्टूडेंट अर्पित गोयल, राइटर—जर्नलिस्ट अविजित घोष और फ़िल्म क्रिटिक ए.के.अरुण, जय अर्जुन सिंह के ख़यालात के मार्फ़त अलग—अलग नज़रिए पेश किए गए हैं। ताकि अवतार कौल की पूरी शख़्सियत और उनके डायरेक्शन का ढंग और तरीक़ा पाठकों को पता चले।

किताब उस दौर के भारत के सिनेमाई परिवेश, गवर्नमेंट पॉलिसी और उन हालात पर भी रोशनी डालती है, जिनके दरमियान अवतार कौल ने अपनी फ़िल्म बनाने का हौसला किया। यही वजह है कि यह महज़ एक जीवनीपरक किताब नहीं, बल्कि उस समय के सिनेमा, समाज और रचनात्मक संघर्षों का भी एक दिलचस्प दस्तावेज़ है। अवतार कौल के ननिहाल, उनकी पैइाइश, परवरिश, तालीम और तर्बियत की अक्कासी अध्याय ‘Gash Bab and Taat’s Unbound Affection’ में विनोद कौल ने इस तरह की है कि 1940 के दशक के श्रीनगर, कश्मीरी पंडित परिवारों की जीवनशैली, परंपराएँ और घरेलू परिवेश पाठक के मन में मानो एक सिनेमा की तरह साकार हो उठते हैं। ‘27 Down on the Track’ अध्याय, फ़िल्म की टीम के सिलेक्शन की पूरी प्रक्रिया को सामने लाता है। यह अवतार कौल की सिनेमा की गहरी समझ, दूरदृष्टि और क़ाबिलियत को पहचानने की अद्भुत क्षमता को उजागर करता है। कुछ चुनिंदा मेम्बर मसलन आर्ट डायरेक्टर बंसी चंद्रगुप्त को छोड़ दें, तो तक़रीबन पूरी टीम नई थी; कई लोगों के लिए तो यह पहली फ़िल्म ही थी। बाद के सालों में यही लोग इंडियन फ़िल्म इंडस्ट्री के प्रतिष्ठित और सम्मानित नामों में गिने जाने लगे। इनमें बॉंसुरी वादक हरिप्रसाद चौरसिया, साधु मेहर, रेखा सबनिस, ओम शिवपुरी, नरेन्द्र सिंह और एम.के.रैना जैसे नाम शामिल हैं। इसी तरह फ़िल्म के कैमरामैन पच्चीस वर्षीय ए.के. बीर के लिए भी ’27 डाउन’ पहली फीचर फ़िल्म थी, और इसी फ़िल्म के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया। बाद में वह ही नहीं, साधु मेहर और राखी भी पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़े गए। फ़िल्म के हीरो एम.के.रैना और उनके पिता बने ओम शिवपुरी रंगमंच के बड़े सितारे के तौर पर चमके।
किताब का नाम: अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी
लेखक : विनोद कौल
प्रकाशक : पब्लिकेशन डिवीजन, मिनिस्ट्री ऑफ़ इनफार्मेशन एंड ब्रॉडकास्टिंग गवर्नमेंट ऑफ इंडिया
पेज : 280
मूल्य : 365
राखी का वो साहसिक फैसला और सादगी का जादू
फ़िल्म निर्माण के समय सबसे चर्चित फ़िल्म की हीरोइन राखी थीं, जो यह जानते हुए भी कि यह अवतार कौल की पहली फ़िल्म है और ’27 डाउन’ में उन्हें बिना ग्लैमर के पेश किया जाएगा, फ़िल्म को करने के लिए राज़ी हो गईं। पूरी फ़िल्म में राखी बिना मेकअप के एक ही सूती साड़ी में नज़र आती हैं। फ़िल्म में उन पर कोई गीत नहीं फ़िल्माया गया। पर्दे पर वे जहॉं—जहॉं नज़र आई हैं, उनका अभिनय काफ़ी सयंत नज़र आता है। डायरेक्टर अवतार कौल ने उन्हें बड़े ही ख़ूबसूरती से कैमरे में कैप्चर किया है। बाद में राखी का यह फ़ैसला सच साबित हुआ। स्क्रीन पर उनके शानदार प्रेजेंस और रोल की ख़ूब तारीफ़ हुई। एक अहम बात और, जिस साल फ़िल्म की शूटिंग चल रही थी, उसी साल राखी ने गुलज़ार से शादी कर ली। अक्सर किसी शख़्सियत पर लिखते वक़्त उनके सफ़र के हमसफ़र या बैकग्राउंड में मौजूद लोगों को कोई अहमियत नहीं दी जाती। उनका कोई ज़िक्र नहीं किया जाता। लेखन का केन्द्र हमेशा उनकी उपलब्धियों, संघर्षों और रचनात्मक योगदानों तक ही महदूद रह जाता है, क्योंकि यह धारणा रही है कि ऐसे ब्यौरे कथा के प्रवाह को सीधे तौर पर समृद्ध नहीं करते। लेकिन लेखक विनोद कौल किताब में इस स्थापित नज़रिए को चुनौती देते हैं। वे अवतार कौल की अमेरिकन बीवी ऐन कौल को सिर्फ़ एक सहायक किरदार के तौर पर नहीं देखते, बल्कि उन्हें उनकी ज़िंदगी और क्रिएटिव जर्नी का एक लाज़िमी और केंद्रीय हमसफ़र मानते हैं। यही वजह है कि वे उन्हें पूरे एक अध्याय ‘Anne Remaining in the Shadows, Completing Awtar’ में जगह देते हैं और इस किताब को ऐन कौल को समर्पित करते हैं।

सिनेमाई इतिहास का एक अधूरा, पर मुकम्मल दस्तावेज़
’20th July 1974′ अध्याय अवतार कौल की ज़िंदगी के दो बेहद मुख़ालिफ़ और फ़ैसलाकुन लम्हों—उनकी रचनात्मक उपलब्धियों और उनकी बेवक्त मौत को एक साथ छूता है। एक ओर जहाँ यह उनके राष्ट्रीय पुरस्कार और सिनेमा में मिली मान्यता जैसे गौरवपूर्ण पलों को रेखांकित करता है, वहीं दूसरी ओर उनकी अचानक और अफ़सोसनाक मौत के ब्यौरे को भी सामने लाता है। अवतार कौल अपनी ज़िंदगी में ’27 डाउन’ के उस कम्प्लीट इफेक्ट को नहीं देख पाए, जो समय के साथ सामने आया। न ही उन्हें वह व्यापक पहचान मिल सकी, जो एक लंबे रचनात्मक ज़िंदगी से हासिल हो सकती थी। एक डायरेक्टर के तौर पर उनकी क़ाबिलियत का एक बड़ा हिस्सा असमय ही अप्रकट और अप्राप्त रह गया। लेखक ने उनकी मौत से संबंधित घटनाक्रम को बिना किसी जज़्बाती, अतिनाटकीयता के बिना पेश किया है। वे अवतार कौल की मौत से जुड़े मुख़्तलिफ़ ब्यौरों—रिपोर्टों, न्यूज रिपोर्टों और अख़बारों की सुर्ख़ियों के मार्फ़त पूरे दर्दनाक वाक़िए को पाठकों के सामने लाते हैं।
’27 Down on the Track’ और ’27 Down Through My Eyes’ जैसे अध्यायों में विनोद कौल ने फ़िल्म के निर्माण की पूरी प्रक्रिया का विस्तार से वर्णन किया है। इसमें नई कहानी और अकहानी के सशक्त हस्ताक्षर रमेश बक्षी के चर्चित उपन्यास ‘अठारह सूरज के पौधे’ के पटकथा में रूपांतरण से लेकर चलती ट्रेन में राखी जैसी स्थापित अभिनेत्री के साथ आम यात्रियों के बीच शूटिंग करने के अनुभवों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। शूटिंग के दौरान पूरी यूनिट को पुलिस द्वारा लॉकअप में डाल दिया जाना और सेना द्वारा क्रू को कॉर्डन-ऑफ किए जाने जैसे वाक़िआत का भी दिलचस्प और तथ्यात्मक विवरण दिया गया है। इन प्रसंगों को नायाब ब्लैक एंड व्हाइट और रंगीन तस्वीरों, एडिट स्क्रिप्ट्स और स्क्रिप्ट की कॉपियों के मार्फ़त प्रमाणिक तौर पर सामने रखा गया है। फ़िल्म ’27 Down’ के उस मशहूर टॉप-एंगल शॉट—जिसमें बॉम्बे वीटी पर लोकल ट्रेनों के रुकने के साथ खाली प्लेटफॉर्म कुछ ही पलों में भीड़ से भर जाता है—की योजना, तकनीकी तैयारी और निष्पादन पर विस्तार से चर्चा की गई है। साथ ही इस सीन को लेकर मुख़्तलिफ़ फ़िल्म समीक्षकों और विश्लेषकों के दृष्टिकोण तथा उसके सिनेमाई महत्व को भी किताब में शामिल किया गया है। बाद में यही सीन डायरेक्टर डैनी बॉयल की लोकप्रिय, सुपरहिट और ऑस्कर से सम्मानित हुई फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ के आख़िरी सीन में भी ज्यों के त्यों फ़िल्माया गया। इस सीन के अलावा सिनेमेटोग्राफर ए.के.बीर ने पूरी फ़िल्म में कमाल का कैमरा वर्क किया है। मसलन उन्होंने 1966 की फ़िल्म ‘दि बैटल ऑफ़ अल्जीयर्स’ से प्रेरणा लेकर सत्तर फ़ीसद फ़ोटोग्राफी हाथ के कैमरे से की। ताकि ट्रेन में भीड़ भरे माहौल को सही तरह से कैप्चर कर सकें। यही नहीं फोटोग्राफी जूम के बजाए वाइड एंगल लैंस से की। डायरेक्टर अवतार कौल ने छाया और प्रकाश का सही संतुलन बनाने के लिए फ़िल्म ब्लैक एंड व्हाइट में बनाई। फ़िल्म को प्रमाणिक बनाने के लिए उन्होंने ज़्यादातर शूटिंग वास्तविक लोकेशन यानी ट्रेन, रेलवे प्लेटफार्म, स्टीम यार्ड, रेलवे परिसर के बाहरी इलाकों और रेलवे क्वार्टर में की। यही नहीं उन्होंने बनारस के घाट और गलियों में भी फ़िल्म के अहम सीन फ़िल्माये। फ़िल्म का टाइटल ’27 डाउन’, बॉम्बे—वाराणसी एक्सप्रेस पर रखा गया। एक तरह से देखें, तो यह फ़िल्म पूरी तरह से प्रयोगधर्मी थी। जिसमें अवतार कौल ने नए—नए प्रयोग किए।

किताब में फ़िल्म ’27 Down’ के सब्जेक्ट, उसके सिनेमाई ट्रीटमेंट और किरदारों के माध्यम से सामाजिक दबावों के बीच फ़ैसला न ले पाने की दार्शनिक स्थिति का भी विश्लेषण किया गया है। ख़ास तौर पर पुरानी और नई पीढ़ी का वैचारिक द्वंद्व, जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी रहता है। फ़िल्म के अहम किरदार संजय (एम.के. रैना) और शालिनी (राखी) का जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों में अनिर्णय की स्थिति में रहना ही ’27 Down’ का केन्द्रीय विषय है। लेखक विनोद कौल का मानना है कि अवतार कौल की फ़िल्म ’27 Down’ मुख्यतः दो पटरियों पर चलती है—पहली उसकी कथा और दूसरी उसका छायांकन। इन दोनों पक्षों के प्रमुख सूत्रधार क्रमशः कथाकार रमेश बक्षी और छायाकार ए.के.बीर रहे हैं। इन्हीं दोनों रचनात्मक सहयोगियों के साथ अवतार कौल के पेशेवर और व्यक्तिगत संबंधों को आधार बनाते हुए किताब में दो पृथक अध्याय—’Awtar and Bir’s Duo : Creation of the Over-the-Shoulder Shot’ और ‘A Shared Vision of Awtar and Bakshi’ शामिल किए गए हैं। फ़िल्म के निर्माण से लेकर उसके फ़िल्मांकन तक की पूरी यात्रा में ये दोनों लंबे समय तक अवतार कौल के साथ जुड़े रहे तथा इस रचनात्मक सफ़र और उससे जुड़े विविध अनुभवों के सहभागी बने। दरअसल, इन अध्यायों के मार्फ़त लेखक विनोद कौल, अवतार कौल को सिर्फ़ एक डायरेक्टर के तौर पर ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील, विचारशील और मानवीय व्यक्तित्व के रूप में भी सामने लाने में कामयाब रहे हैं। और यही उनकी किताब का मक़सद है। एक क़ाबिल डायरेक्टर को उसका वास्तविक हक़ मिले, जो वक़्त की गर्द में कहीं दब सा गया है। और उसे जाने—अनजाने बिसराने की कोशिश भी होती रहती है।
समानांतर सिनेमा का वो दौर और एफएफसी की प्रासंगिकता

बीसवीं सदी का सातवां दशक हिन्दी सिनेमा में समानांतर सिनेमा का दशक रहा है। साल 1969 से मृणाल सेन की फ़िल्म ‘भुवन शोम’ से शुरू हुई यह यात्रा मणि कौल—’उसकी रोटी’ (1969), ‘आषाढ़ का एक दिन’ (1971), ‘दुविधा’ (1973), ‘सतह से उठता आदमी'(1980), ख़्वाजा अहमद अब्बास—’दो बूॅंद पानी’ (1971), ‘नक्सलाइट’ (1979), राजिंदर सिंह बेदी—’दस्तक’ (1970), बासु चटर्जी—’सारा आकाश’ (1969), श्याम बेनेगल—’अंकुर'(1973), ‘निशांत'(1975), ‘भूमिका'(1976), ‘मंथन'(1976), ‘जुनून’ (1978), ‘कलयुग’ (1980), एम.एस.सथ्यू—’गरम हवा’ (1974), ‘सूखा’ (1980), सत्यजित राय—’शतरंज के खिलाड़ी’ (1978), सईद अख़्तर मिर्ज़ा—’अरविंद देसाई की अजीब दास्तान’ (1978), ‘अल्बर्ट पिंटो को ग़ुस्सा क्यों आता है’ (1980), मुजफ़्फ़र अली—’गमन’ (1978), सई परांजपे—’स्पर्श’ (1979), विनोद पांडे—’एक बार फिर’ (1979), गोविंद निहलानी—’आक्रोश'(1980) तक चलती है। इनमें से कई फ़िल्में ‘फ़िल्म फाइनेंस कॉर्पोरेशन’ (FFC) की मदद से बनीं। सरकार ने साल 1960 में यह सिलसिला इस वास्ते शुरू किया था कि कुछ सार्थक फ़िल्में सामने आएं। प्रतिभाशाली निर्देशक जो फाइनेंस की कमी से फ़िल्म नहीं बना पाते, उन्हें सहयोग मिले। इस युगांतकारी फ़ैसले का फ़ायदा हुआ भी और अवतार कौल जैसे प्रतिभाशाली डायरेक्टर ने ’27 डाउन’ जैसी क्लासिक फ़िल्म बनाई। उम्मीद है कि किताब ‘अवतार कौल द (इन) कम्प्लीट स्टोरी’ के बहाने एफएफसी और एनएफडीसी की भूमिका की भी चर्चा होगी, जिसने एक वक़्त हिन्दी सिनेमा में समानांतर सिनेमा को खड़ा करने में अहम रोल अदा किया। और आज अपने उद्देश्यों से विलग होता दिखता है।
यह किताब केवल एक फिल्मकार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन सभी कलाकारों को एक श्रद्धांजलि है जो गुमनामी के अंधेरे में कहीं खो गए।
