
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार उत्पल बोरपुजारी और वरिष्ठ फोटोग्राफर श्याम प्रसाद की उपस्थिति में आयोजित Talk Cinema On The Floor (TCOTF) का जून चैप्टर कई मायनों में विशेष रहा। एक ओर उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा की नई पहचान और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा हुई, तो दूसरी ओर “Cinema on Reels” के माध्यम से डिजिटल दौर में सिनेमाई मूल्यों की प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद सामने आया। जून चैप्टर के साथ TCOTF ने अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश किया, जबकि न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन (NDFF) ने भी अपने स्थापना के दसवें वर्ष की शुरुआत की।
“उत्तर-पूर्व भारत का सिनेमा अब केवल क्षेत्रीय सिनेमा नहीं रह गया है। यह अपनी स्थानीय कहानियों, संस्कृति और संवेदनाओं के साथ विश्व स्तर पर अपनी अलग पहचान बना रहा है।”
राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार, पूर्व राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म समीक्षक और वरिष्ठ पत्रकार उत्पल बोरपुजारी के इन शब्दों ने Talk Cinema On The Floor (TCOTF) के जून चैप्टर की दिशा और स्वर दोनों निर्धारित कर दिए। जब उन्होंने सिक्किम की चर्चित फिल्म ‘द शेप ऑफ मोमो’, मणिपुर की ‘बूंग’ और असम की ‘नॉट ए हीरो’ जैसी फिल्मों का उल्लेख करते हुए उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा की नई रचनात्मक ऊर्जा की बात की, तो यह केवल फिल्मों की चर्चा नहीं थी; यह भारतीय सिनेमा के बदलते भूगोल की कहानी थी।
इसी विचार के साथ न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन (NDFF) द्वारा आयोजित TCOTF का जून चैप्टर अपने पहले वर्ष की यात्रा पूरी कर दूसरे वर्ष में प्रवेश कर गया। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स (IICS), लाजपत नगर में आयोजित इस विशेष सत्र ने एक बार फिर सिद्ध किया कि सिनेमा पर गंभीर संवाद, सीखने की संस्कृति और रचनात्मक नेटवर्किंग—तीनों साथ-साथ चल सकते हैं।
कार्यक्रम की शुरुआत NDFF के संस्थापक आशीष के सिंह के स्वागत संबोधन से हुई। उन्होंने पिछले एक वर्ष की यात्रा को याद करते हुए कहा कि SACAC (श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी), Indian Institute of Creative Skills (IICS) तथा Media & Entertainment Skills Council (MESC) के सहयोग से आयोजित TCOTF अब केवल एक मासिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि फिल्मकारों, कलाकारों, विद्यार्थियों और सिनेमा-प्रेमियों को जोड़ने वाला एक जीवंत मंच बन चुका है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि NDFF का उद्देश्य केवल फिल्मों पर चर्चा करना नहीं, बल्कि दिल्ली में एक सशक्त फिल्ममेकिंग इकोसिस्टम विकसित करना और रचनात्मक उद्योगों के माध्यम से ऑरेंज इकॉनमी को नई ऊर्जा देना है।


सत्र की शुरुआत हमेशा की तरह एक warm, open introduction round से हुई। हर प्रतिभागी ने अपना नाम, अपना काम और सिनेमा से जुड़ा अपना रिश्ता साझा किया। कोई फिल्ममेकर था, कोई स्टूडेंट, कोई एक्टिंग में था, तो कोई टेकी और साइंस स्कॉलर… जो सिनेमा के ज़रिए जीवन को, समाज को समझना चाहता था। अलग-अलग बैकग्राउंड के लोगों की सिनेमा के नाम पर होने वाली ये जमघट ही इस मंच को अलग और खास बनाती है। सत्र में मौजूद कुछ खास मेहमानों में फिल्मों, वेब सीरीज़ और रंगमंच पर अपना जौहर दिखा चुके वरिष्ठ अभिनेता कृशन टंडन भी शामिल थे, जो लंदन में रहते हैं और फिलहाल शूटिंग के सिलसिले में दिल्ली आए हुए थे। उनके अलावा जाने माने गायक प्रसून मुखर्जी भी मौजूद थे जो लीजेंड्री सिंगर हेमंत कुमार के भतीजे हैं।
New Delhi Film Foundation (NDFF) का यही मकसद है — एक ऐसा space बनाना जहाँ serious cinema पर ही नहीं, बल्कि इससे जुड़ी परफॉर्मिंग आर्ट्स के सभी आयामों पर ऐसी बात हो, जिससे लोग जुड़ें और मिल कर अपनी कला का, प्रतिभा का, अपने काम का और अपनी सोच का दायरा बढ़ा सकें, बेहतर कर सकें, ताकि धीरे-धीरे एक creative और professional ecosystem तैयार हो सके।
स्पॉटलाइट: एक पत्रकार, एक आलोचक और एक संवेदनशील फिल्मकार

Spotlight सत्र की शुरुआत उत्पल बोरपुजारी की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता असमिया फीचर फिल्म ‘इशू’ और चर्चित डॉक्यूमेंट्री ‘द हाउस ऑफ बरुआज़’ के प्रोमो प्रदर्शन से हुई। इसके बाद उन्होंने दोनों फिल्मों के निर्माण, विषय-वस्तु और रचनात्मक दृष्टि पर विस्तार से बात की।
उन्होंने अपने पत्रकारिता जीवन, अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोहों के अनुभव और अंततः फिल्म निर्माण को जीवन का माध्यम चुनने की कहानी साझा की।
उन्होंने बताया कि साहित्य और संस्कृति से जुड़े पारिवारिक परिवेश तथा दिल्ली में विश्व सिनेमा से हुए परिचय ने उनकी फिल्मी दृष्टि को आकार और विस्तार दिया लंबे समय तक प्रमुख मीडिया संस्थानों में कार्य करते हुए उन्होंने अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फिल्म महोत्सवों को कवर किया। अंततः उन्होंने पत्रकारिता छोड़कर फिल्म निर्माण को अपना पूर्णकालिक रचनात्मक माध्यम बनाया।
उन्होंने बताया कि उनकी पहली ही असमिया फीचर फिल्म ‘इशू’ को वर्ष 2018 में राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जबकि इससे पहले वर्ष 2003 में उन्हें सर्वश्रेष्ठ फिल्म समीक्षक के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका था।
फिल्मों में उनके रचनात्मक सफर के बारे में और जानने के लिए उनके IMDB प्रोफाइल को यहां देख सकते हैं: https://www.imdb.com/name/nm5285158

उत्पल बोरपुजारी के साथ संवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा पर रहा। उन्होंने बताया कि असम में 1930 के दशक से फिल्म निर्माण की परंपरा रही है, लेकिन पिछले डेढ़ दशक में पूरे उत्तर-पूर्व का सिनेमा नई कलात्मक पहचान के साथ उभरा है। स्थानीय भाषा, संस्कृति और मानवीय अनुभवों पर आधारित फिल्में आज वैश्विक फिल्म समारोहों तक पहुँच रही हैं। उनके अनुसार भारतीय सिनेमा की सबसे ताज़ा और मौलिक आवाज़ों में से कई आज उत्तर-पूर्व से आ रही हैं। उन्होने रीमा दास की ‘विलेज रॉकस्टार्स’, ‘नॉट ए हीरो’ (असमिया) के साथ-साथ त्रिबने राई की चर्चित फिल्म ‘द शेप ऑफ मोमो’ (सिक्किम) और लक्ष्मीप्रिया देवी की ‘बूंग’ (मणिपुर) का जिक्र किया और बताया कि ये फिल्में अपनी शैली और ट्रीटमेंट में वर्ल्ड सिनेमा के स्तर की हैं।
प्रतिभागियों ने भी उनसे स्वतंत्र फिल्म निर्माण, पटकथा, फिल्म समारोहों, भारतीय सिनेमा की बदलती दिशा और युवा फिल्मकारों के लिए उपलब्ध अवसरों पर अनेक प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने विस्तार से उत्तर दिया।
Craft & Crew: रील भी सिनेमा बन सकती है
जून चैप्टर का दूसरा प्रमुख आकर्षण था Craft & Crew सत्र—“Cinema on Reels – Aesthetics & Techniques in Reel Making”।

सत्र का परिचय देते हुए होस्ट आशीष के सिंह ने कहा कि आज रील केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। यह कहानी कहने, व्यक्तिगत ब्रांडिंग, जनसंचार और रचनात्मक अभिव्यक्ति का सबसे प्रभावी दृश्य माध्यम बन चुकी है। ऐसे में प्रश्न यह नहीं है कि रील बनानी चाहिए या नहीं, बल्कि यह है कि क्या रील भी सिनेमा की संवेदनशीलता और सौंदर्यबोध के साथ बनाई जा सकती है?
यही विचार NDFF के संदेश “Don’t Just Make Reels… Create Cinema.” का आधार बना।
इस विषय पर प्रसिद्ध फोटोग्राफर, सिनेमैटोग्राफर और शूट्स एंड शूट्स एकैडमी के निदेशक श्याम प्रसाद ने विशेषज्ञ वक्ता के रूप में अपने अनुभव और जानकारी साझा की। उन्होंने रील मेकिंग को केवल सोशल मीडिया ट्रेंड नहीं, बल्कि प्रभावी दृश्य संप्रेषण और सिनेमाई अभिव्यक्ति का माध्यम बताते हुए मोबाइल फिल्ममेकिंग, विज़ुअल एस्थेटिक्स, फ्रेमिंग, कैमरा एंगल, लाइटिंग, कैमरा मूवमेंट, कम्पोज़िशन और एडिटिंग के अनेक व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत किए।
उन्होंने समझाया कि केवल लाइट के एंगल में बदलाव से किसी भी दृश्य का भाव और मूड पूरी तरह बदल सकता है। उन्होंने कैमरे के सामने सब्जेक्ट की पोज़िशनिंग, चेहरे के विभिन्न एंगल्स, प्राकृतिक अभिव्यक्ति तथा विजुअल बैलेंस से जुड़े कई उपयोगी सुझाव भी दिए।

रील की संरचना पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि आज दर्शकों का ध्यानाकर्षण समय (AttentionSpan) लगातार कम हो रहा है। ऐसे में शुरुआती कुछ सेकेंड में दर्शक का ध्यान खींचना, पात्र या विषय को स्थापित करना और सीमित समय में प्रभावी निष्कर्ष तक पहुंचना ही एक सफल रील की सबसे बड़ी चुनौती है। इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि अच्छी रील केवल तकनीक नहीं, बल्कि बेहतर विचार, संवेदनशील कहानी और सिनेमाई अप्रोच से बनती है।
NDFF ने इस सत्र को केवल तकनीकी प्रशिक्षण तक सीमित न रखते हुए उसे रचनात्मक दृष्टि से जोड़ा। उद्देश्य स्पष्ट था—रील को वायरल कंटेंट से आगे ले जाकर उसे सार्थक दृश्य अभिव्यक्ति का माध्यम बनाना।
Take The Floor में The Tiffin Heist
TCOTF की विशेष पहचान बन चुके Take The Floor – The 5 Minute Window के तहत इस बार अप्रैल चैप्टर में शुरू किए गए segment Showcase Your Work — Let your cinema speak का आयोजन किया गया। इस बार जिस खास फिल्म को शोकेस किया गया, उसकी एक्टर से भी लोग रू-ब-रू हुए। दरअसल Take The Floor – The 5 Minute Window सेगमेंट उन प्रतिभागियों अपने हालिया क्रिएटिव काम को शोकेस करने के लिए या फिर अपने किसी क्रिएटिव प्रोजेक्ट को Collaborators की तलाश में पिच करने के लिए बना है। यह मंच केवल प्रस्तुति का अवसर नहीं, बल्कि संभावित सहयोगियों, कलाकारों और तकनीकी विशेषज्ञों से जुड़ने का माध्यम भी बन चुका है। Showcase Your Work — Let your cinema speak के तहत इस बार IICS की ओर से बच्चों के लिए आयोजित फिल्म वर्कशॉप के तहत बनाई गई 5 मिनट की शॉर्ट फिल्म ‘The Tiffin Heist’ प्रदर्शित की गई। प्रदर्शन के बाद फिल्म की टीम की ओर से फिल्म की कलाकार ऐशा गुप्ता ने दर्शकों से बात की जिसमें उन्होंने अपनी सीख, चुनौतियों और फिल्म बनने के दौरान अनुभव साझा किए।

नेटवर्किंग टी: संवाद जो चाय के साथ भी जारी रहा

और जैसा कि कहते हैं कि Cinema is not built only on sets… it is built through conversations. कई अच्छी फिल्में कैमरा ऑन होने से पहले पैदा होती हैं… वो पैदा होती हैं… एक discussion में… एक debate में… एक coffee table conversation में… या किसी networking session में…
और शायद इन्हीं में से किसी बातचीत में अगली बेहतरीन फिल्म की शुरुआत छिपी होती है। यही सोच TCOTF की foundation है और हर सत्र के अंत में होने वाले Networking Tea का भी यही मकसद है।
Networking Tea के दौरान प्रतिभागियों, अतिथियों, विद्यार्थियों और रचनात्मक पेशेवरों के बीच अनौपचारिक संवाद जारी रहा। कई नए परिचय बने, संभावित सहयोगों पर चर्चा हुई और यही वह क्षण था जिसने TCOTF के मूल मंत्र—Learn • Share • Network—को एक बार फिर सार्थक सिद्ध किया।

एक वर्ष की यात्रा, नए दशक की शुरुआत
आज टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर दिल्ली में गंभीर फिल्म संस्कृति, रचनात्मक संवाद और कम्युनिटी बिल्डिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण मासिक पहल के तौर पर अपनी खास पहचान बना चुका है। जून चैप्टर के साथ ही TCOTF ने अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश किया है, जबकि न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन ने भी इसी महीने अपनी स्थापना के में प्रवेश किया है। यह केवल समय का पड़ाव नहीं, बल्कि उस विश्वास की पुष्टि है कि यदि सिनेमा पर गंभीर संवाद के लिए निरंतर और खुला मंच उपलब्ध कराया जाए, तो एक मज़बूत क्रिएटिव कम्युनिटी तैयार की जा सकती है।
NDFF आने वाले समय में Cinema of India, Make Cinema, विषय-आधारित Workshops, फिल्म स्क्रीनिंग, रचनात्मक संवाद और संस्थागत साझेदारियों के माध्यम से दिल्ली और उत्तर भारत में फिल्म संस्कृति को और सुदृढ़ बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। NDFF का मानना है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, शिक्षा और क्रिएटिव इकोनॉमी को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति है।
आभार

इस आयोजन की सफलता में SACAC, Indian Institute of Creative Skills (IICS) तथा Media & Entertainment Skills Council (MESC) का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स की ओर से COO पूजा अरोड़ा की Talk Cinema On The Floor के विज़न को आगे बढ़ाने में खास भूमिका रही, जबकि इवेंट के आयोजन में IICS की ओर से रोशनी सहगल, पुष्पा वर्मा, पृशिता तिवारी और शिवानी सिंह ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। कार्यक्रम का संचालन आशीष के सिंह ने किया, जबकि आयोजन की प्रमुख जिम्मेदारी NDFF की ओर से वैभव मैत्रेय और हरिंदर कुमार ने संभाली। टेक एवं प्रोडक्शन की जिम्मेदारी कृष गुप्ता ने संभाली। इवेंट कवरेज में मुकेश बिश्नोई की अहम भूमिका रही।
NDFF ने बताया कि आने वाले महीनों में सिनेमा ऑफ इंडिया, मेक सिनेमा अभियान, विषय आधारित कार्यशालाओं, फिल्म प्रदर्शनों, रचनात्मक नेटवर्किंग कार्यक्रमों तथा विभिन्न संस्थानों और उद्योग जगत के साथ सहयोग के माध्यम से राजधानी में फिल्म संस्कृति को मजबूत करने और ऑरेंज इकॉनमी को गति देने की दिशा में नई पहल की जाएँगी।
न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन की अन्य प्रमुख पहल
यदि आप सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने, संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम मानते हैं, तो NDFF की इन पहलों के बारे में भी जानिए—
- Talk Cinema On The Floor (TCOTF) – सिनेमा पर मासिक रचनात्मक संवाद और नेटवर्किंग मंच।
- Watch Cinema – चयनित फिल्मों का प्रदर्शन और सार्थक चर्चा।
- Cinema of India – भारतीय भाषाओं और क्षेत्रों के विविध सिनेमाई परिदृश्य का उत्सव।
- Make Cinema – उभरते फिल्मकारों को सार्थक लघु फिल्म निर्माण के लिए प्रेरित करने वाला अभियान।
- वर्कशॉप एवं मास्टरक्लास – फिल्म निर्माण, पटकथा, अभिनय, सिनेमैटोग्राफी और अन्य विषयों पर नियमित प्रशिक्षण एवं संवाद।
सिनेमा से जुड़िए। संवाद से जुड़िए। समुदाय से जुड़िए।

NDFF के बारे में
New Delhi Film Foundation (NDFF) एक गैरलाभकारी फिल्म सोसायटी है, जो दिल्ली और उत्तर भारत में सिनेमा, रचनात्मक शिक्षा और फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कार्य कर रही है। संस्था नियमित फिल्म प्रदर्शन, संवाद, कार्यशालाएँ, फिल्म महोत्सव, Talk Cinema On The Floor (TCOTF) जैसे मासिक संवाद मंच, Make Cinema जैसे अभियान तथा विभिन्न शैक्षणिक, सांस्कृतिक और उद्योग संस्थानों के साथ साझेदारी के माध्यम से एक सशक्त फिल्ममेकिंग इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में कार्यरत है NDFF का उद्देश्य सार्थक सिनेमा, नई प्रतिभाओं, रचनात्मक सहयोग और उभरती ऑरेंज इकॉनमी को प्रोत्साहित करना है। NDFF का विश्वास है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद, संवेदनशीलता और सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावशाली माध्यम है।NDFF के वॉट्स ऐप ग्रुप से इस लिंक- https://chat.whatsapp.com/JWMFcNWvocGCpKuwi078uL के ज़रिए जुड़ सकते हैं। contact: 999957865
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