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Talk Cinema on the Floor October Chapter
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TCOTF अक्टूबर चैप्टर: कान, अश्मिता की ‘कैटडॉग’, कॉस्ट्यूम और कैरेक्टर

‘स्पॉटलाइट’ सेगमेंट ‘टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर’ का सबसे खास सेगमेंट होता है। इस बार साल 2020 के कान फिल्म समारोह के ला सिनेफ़ कैटेगरी में पहला पुरस्कार प्राप्त करने वाली फिल्म कैटडॉग की लेखक-निर्देशक अश्मिता गुहा नियोगी खास मेहमान थीं, जो मुंबई से आई थीं।

Smita Patil in Bhumika
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सिनेमा की भाषा में ‘भूमिका’

श्याम बेनेगल की ‘भूमिका’ शुरु से अंत तक रील लाइफ़ और रीयल लाइफ़ की बिना किसी दरार के एक-दूसरे में आवाजाही है। यह एक संवेदनशील-प्रतिभावान व्यक्ति की उथल-पुथल भरी जिंदगी का लेखा-जोखा है। स्मिता पाटिल ने स्वयं स्वीकार किया था, यह उनके जीवन की सर्वाधिक कठिन फ़िल्म थी, लेकिन इसी कारण यह उनके लिए सर्वाधिक संतोषप्रद फ़िल्म भी थी। पहले वे सोच रही थीं कि वे यह भूमिका न कर पाएँगी लेकिन उन्हें अपने निर्देशक पर बहुत भरोसा था (वे श्याम बेनेगल के साथ तीन फ़िल्में कर चुकी थीं), दोनों की बहुत अच्छी ट्यूनिंग थी अत: उन्होंने इस रोल को स्वीकार किया।

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टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर – सितंबर चैप्टर: साउंड, स्क्रीनप्ले और डायलॉग की अद्भुत प्रस्तुति

टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर (TCOTF) के सितंबर चैप्टर ने हार्मनी हाउस, SACAC को एक सिनेमा-वासियों, लेखकों और रचनात्मक आवाज़ों के मिलन और क्रिएटिव डिस्कोर्स का अड्डा बना दिया। उन लोगों का जो स्क्रीन पर कहानियाँ सुनना ही नहीं, उन्हें महसूस करना चाहते हैं।

Songs of Paradise review
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कश्मीर की वादियों से निकली एक अधूरी धुन

ईरानी फिल्मकार माजिद मजीदी के फिल्मों के नाम से मिलती जुलती इस फिल्म पर ईरानी सिनेमा का असर भी दिखता है। फिल्म में खूबियां और खामियां दोनों हैं।

Talk Cinema Group
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एडिटिंग से लेकर ‘एम्पैथी’ तक – टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर का अगस्त चैप्टर

टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर का अगस्त चैप्टर दिल्ली-एनसीआर के फिल्मकारों, सिनेप्रेमियों और विद्यार्थियों के लिए विचारों के आदान-प्रदान का एक जीवंत मंच साबित हुआ।

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प्रेमचंद और सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’

प्रेमचंद की ये कहानी जहां से शुरू होती है और जहां समाप्त होती है वो दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक बिंदु हैं। वो पहले बताते हैं कि क्यों हमारा देश गुलाम हुआ, लखनऊ की घटना, वाजिद अली शाह के समय में लखनऊ के माध्यम से, मीर और मिर्ज़ा के माध्यम से ये बताते हैं।

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