तीसरी कसम : न कोई इस पार हमारा, न कोई उस पार
फिल्म एक ऐसी विधा है, ऐसा आर्टफॉर्म है जिसमें कहानी… किसी फिल्म का सबसे अधिक और सबसे कम महत्वपूर्ण तत्व […]

फिल्म एक ऐसी विधा है, ऐसा आर्टफॉर्म है जिसमें कहानी… किसी फिल्म का सबसे अधिक और सबसे कम महत्वपूर्ण तत्व […]
आज दिलीप कुमार ज़िंदा होते तो 99 साल के होते…. 11 दिसंबर 1922 को पेशावर में वो पैदा हुए थे…
मिस्र के ही उमर अल जोहरी की फिल्म फेदर्स को लेकर देश भर में हंगामा हो रहा है। सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी समूह जमकर इसकी आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि इस फिल्म से दुनिया भर में मिस्र की छवि खराब होगी। अपने छह साल के बेटे के जन्मदिन पर आयोजित जादू के शो के दौरान एक तानाशाह आदमी मुर्गे में बदल जाता है।
Rohit Shetty-directed movie from his “cop cinematic universe” is everything that one expects from a commercial film these days – terrible filmmaking that feels like a checklist by the makers to incorporate everything that they feel assures them a good commercial response.
अरब सिनेमा और अरब समाज की नई पहचान गढ़ता एक अनोखा फिल्म फेस्टिवल
Three years back in 2018 the deaths of eleven family members in Burari, Delhi; had shaken the whole nation. Now Leena Yadav
शूजीत सरकार और विकी कौशल की मेहनत की बदौलत यह फिल्म बायो-पिक कैटेगरी में ख़ास दर्जा हासिल करने की काबिलियत रखती है।
A problem with Chehre is that it is based around what is regularly referred to by the characters as a “game”. The stakes are not high enough, the setting not claustrophobic enough.
Birth anniversary special: बंगाली सिनेमा पर जब भी कोई गंभीर चर्चा होती है वो बांग्ला फिल्मकारों की सबसे प्रतिष्ठित त्रयी- सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन से शुरु होकर वहीं खत्म हो जाती है। हालांकि बंगाली सिनेमा में तपन सिन्हा जैसा कोई दूसरा फिल्मकार नहीं, जिसने उच्चस्तरीय कलात्मकता और बॉक्स ऑफिस सफलता को एक साथ साधा हो।
जर्मन फिल्मकार फ़तिह अकीन पिछले डेढ़ दशक के दौरान यूरोप के सबसे चर्चित फिल्म निर्देशकों में गिेन जाते रहे हैं। उनकी स्टाइल का असर भारत के नई पीढ़ी के फिल्मकारों के काम पर भी देखा गया है।