हीरो, हीरोइन… और प्राण

पर्दे पर प्राण की असरदार मौजूदगी की वजह से ही फिल्मों के पोस्टर पर हीरो, हीरोइन के साथ उनके नाम का अलग से ज़िक्र ज़रुर होता था जो हिंदी में '...और...

भारतीय फिल्मों में त्रयी परंपरा और बुद्धदेब बाबू

कवि, प्रोफेसर और फिल्मकार, बुद्धदेव दासगुप्ता समकालीन भारत की सबसे अहम सिनेमाई आवाजों में से थे। उनके पास कल्पना थी, एक कवि की गीतात्मकता थी और इसे...

पठान: राष्ट्रवाद के टेंपलेट वाला एक ‘छद्म सिनेमा’

सिनेमा अगर केवल तकनीकी फार्मूलों वाली वीडियो गेमिंग व डिब्बाबंद फूड का रूप ग्रहण कर ले, मनोरंजन को तकनीक की 'अनरियल' धमाचौकड़ी में बदल डाले तो समाज को...

वाणी जयराम : थम गईं पांच दशकों की एक प्यारी-सी आवाज़

दक्षिण भारत के सुरीले संगीत की मिठास को अपनी आवाज़ के ज़रिए हिंदी सिनेमा संगीत में पहुंचाने वाली संभवत: पहली गायिका थीं वाणी जयराम।...

2022: बंबइया सिनेमा के तिलिस्म टूटने का साल

दरअसल, डबिंग और सबटाइटिल्स की सुविधा के साथ अब हिंदी का दर्शक न सिर्फ भारत की सभी भाषाओं के मनोरंजन का आनंद ले सकता है, बल्कि तमाम विदेशी कहानियाँ भी...

आनंद : लंबी नहीं… बड़ी जिंदगी

'आनंद' फ़िल्म का नायक आनंद(राजेश खन्ना) 'भरपूर जीवन जीने' का उदाहरण है। वह गंभीर बीमारी(कैंसर) से ग्रसित है और उसे मालूम है कि तीन माह से अधिक उसकी...

हर बच्चा खास होता है: ‘तारे ज़मीन पर’ के 15 साल

जैसा फ़िल्म में एक जगह कहा गया है हम बुख़ार को देखते हैं जो कि एक लक्षण है, बुखार के कारणों को नहीं देख पाते।...

सिनेमा में ‘आवारा’ और उसकी दुनिया का विमर्श

फ़िल्म 'आवारा ' के जज 'रघुनाथ' समाज से विद्रोह करके एक 'विधवा' से शादी करते हैं मगर पत्नी के एक डाकू द्वारा अपहरण कर लेने के बाद वापिस आने पर उसे घर...

40 साल पहले की ‘सुबह’ में झलकता आज का सच

फ़िल्म 'सुबह' की 'सावित्री' का द्वंद्व इसी अस्मिता और पारिवारिकता के बीच सामंजस्य का है। वह जितना अपनी अस्मिता के प्रति सचेत है उतना ही अपने परिवार से...

OUR SESSIONS

GALLERY

ASSOCIATIONS

Scroll to Top