‘हक़ीक़त’ जैसे माहौल में चेतन आनंद की याद…

चेतन आनंद एक बेहतरीन फ़िल्मकार होने के साथ साथ बेहद ज़हीन और नफ़ीस इनसान थे। 1946 में उनकी बनाई पहली ही फ़िल्म 'नीचा नगर' को फ्रांस के पहले कान...

पहचान की तलाश वाया ‘पाताललोक’

A thriller re-identifying its characters, class and conflict therein...

सत्यजित रे… जिसने बदल दिया भारतीय सिनेमा

दूरबीन का क्या काम होता है? दूर के दृश्य को आपके पास ले आना , इतना पास कि लगे जैसे...

पंचलाइट की रोशनी में ‘पंचायत’

‘पंचायत’ में गांव की सुबह 9 बजे वाली दोपहर का भी ज़िक्र है, शाम 7 बजे के सन्नाटे का भी और दो रुपए पीस बिकने वाले पेठे का भी। गांव के बाहर वाले पेड़ का...

‘सीज़न गेम’ में चूक रहे भारतीय वेब सीरीज़

- Parul Budhkar (पारुल बुधकर एक वरिष्ठ पत्रकार हैं। पिछले दो दशकों के दौरान उन्होने कई जाने माने अखबारों और...

ऑस्कर, रोमा और मेक्सिको

आशीष कुमार सिंह     91वें ऑस्कर के लिए 10 नामांकन पाने वाली मेक्सिकन फिल्म ‘रोमा’ ने तीन ऑस्कर जीतकर...

Remembering Mrinal Sen

NDFF organized screening of Mrinal Sen's film Bhuvan Shome, that paved the way for parallel cinema in Hindi film industry...

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