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TCOTF July Chapter: Visual Storytelling, Delhi Cinema Culture & Four Generations

Thoughts and tips on visual storytelling by acclaimed cinematographer Koustabh Mukherjee, emerged as one of the key takeaways from the July Chapter of Talk Cinema On The Floor (TCOTF). Veteran cinephile and cinema scholar Sandeep Pahwa, meanwhile, offered a fascinating view of how Indian audiences and cinema-going culture have changed—from the era of single-screen theatres to today’s OTT age, in the Ju;y Chapter of Talk Cinema on the Floor.

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विजुअल स्टोरीटेलिंग से दिल्ली की सिनेमा संस्कृति तक: TCOTF जुलाई चैप्टर

Talk Cinema on the Floor के July Chapter में जाने माने सिनेमैटोग्राफर कौस्तुभ मुखर्जी की विजुअल स्टोरीटेलिंग के बताए तरीके और टिप्स TCOTF के इस सत्र की सबसे बड़ी सीख बनकर उभरी। वहीं वरिष्ठ सिनेविद् संदीप पाहवा ने सिंगल स्क्रीन थिएटरों से लेकर OTT के दौर तक भारतीय दर्शकों की बदलती संस्कृति की ऐसी तस्वीर खींची, जिसने सिनेमा को सिर्फ फिल्मों की नहीं, बल्कि समाज की कहानी बना दिया।

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कन्नड़ फिल्म ‘मिथ्या’: 3 नेशनल अवॉर्ड के पीछे का सफर

बहुत सारी अच्छी फ़िल्में कई कारणों से दर्शक तक पहुँच नहीं बना पाती हैं। हाँ, अगर आप किसी फ़िल्म फ़ेस्टिवल से जुड़े हैं, तो कुछ अच्छी फ़िल्में आप देख पाते हैं। 72वें राष्ट्रीय फ़िल्म में सुमंत भट्ट की फ़िल्म ‘मिथ्या’ को तीन पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। एक बच्चा हादसे एवं तनाव में है। उसके पिता गुजर गए हैं, उसकी माँ ने आत्महत्या की है। बच्चे का शॉक, ट्रॉमा, प्रश्न, प्रतिक्रिया, गुस्सा, दु:ख-दर्द, उनका विभ्रम, मूक खोज, विद्रोह सब बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है।

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नॉर्थ ईस्ट के सिनेमा से रील्स में सिनेमा तक: TCOTF जून चैप्टर में रचनात्मक संवाद का नया अध्याय

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार उत्पल बोरपुजारी और वरिष्ठ फोटोग्राफर श्याम प्रसाद की उपस्थिति में आयोजित Talk Cinema On The Floor (TCOTF) का जून चैप्टर कई मायनों में विशेष रहा। एक ओर उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा की नई पहचान और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा हुई, तो दूसरी ओर “Cinema on Reels” के माध्यम से डिजिटल दौर में सिनेमाई मूल्यों की प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद सामने आया।

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अवतार कौल : ’27 डाउन’ का मुसाफिर जिसे वक्त ने बहुत जल्दी भुला दिया

अवतार कौल एक ऐसे फिल्मकार थे जिन्होने महज़ एक फिल्म ’27 डाउन’ बना कर सिनेमाई भाषा को बदल दिया, लेकिन सफलता का स्वाद चखने से पहले ही काल के गाल में समा गए। विनोद कौल की पुस्तक ‘अवतार कौल: द (इन)कम्प्लीट स्टोरी’ केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि उस खोई हुई सिनेमाई विरासत की तलाश है, जिसे आज की पीढ़ी को जानना और समझना अनिवार्य है।

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इस ‘राख’ के ढेर में हैं समाज और सिस्टम के लिए कई सुलगते सवाल

“एक आदमी की निजी सोच जब भीड़ की सोच बन जाती है तो सारा समाज सड़ने लगता है। एक दीमक से हजारों दीमक- और सारा जंगल खत्म। “ प्राइम वीडियो पर रिलीज़ वेब सीरीज़ ‘राख’ का यह संवाद हमारे देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक संदर्भों में बहुत मानीख़ेज़ है। जिस तरह से भीड़तंत्र हावी हो चुका है, वह हमारे समाज में अमन चैन के लिए बहुत बडा खतरा बन गया है।

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ख़्वाजा अहमद अब्बास: जिन्होंने समाजवाद को सिनेमा के पर्दे पर पहुंचाया

देश में समानांतर या नव-यथार्थवादी सिनेमा की जब भी बात होगी, ख्वाजा अहमद अब्बास का नाम फ़िल्मों की इस मुख़्तलिफ़ धारा के रहनुमाओं में गिना जाएगा। उन्होंने अपने लेखन से पूरी दुनिया को मुहब्बत, अमन और इंसानियत का पैग़ाम दिया। अब्बास ने न सिर्फ़ फ़िल्मों, बल्कि पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में भी नए मुक़ाम क़ायम किए।

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जॉन अब्राहम: बेबाक जन-सिनेमा के अमर विद्रोही फिल्मकार

76वें कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में जॉन अब्राहम की अंतिम फिल्म ‘अम्मा अरियन’ की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई। भारतीय या वैश्विक सिनेमा के इतिहास में ऐसे बहुत कम फिल्मकार हुए हैं जो अपने जीवनकाल के बाद भी जॉन अब्राहम की तरह एक जीवंत किंवदंती बने रहे। इसका कारण केवल उनकी फिल्में नहीं, बल्कि नए सिनेमा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और जुनून था जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया।

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मृणाल सेन: हमें इतिहास को बार-बार नए सिरे से पढ़ना होगा

अपनी फ़िल्मों के बारे में ख़ुद मृणाल सेन का कहना था, ‘‘ग़रीबी, सूखा, अकाल और सामाजिक अन्याय मेरे समय का यथार्थ है, एक फ़िल्म निर्देशक की हैसियत से मेरी फ़िल्में इन्हें समझने और उनके कारण जानने का माध्यम हैं।’’ मृणाल सेन देश में ‘न्यू वेव सिनेमा’ आंदोलन या समानांतर सिनेमा के भी जनक माने जाते हैं। उनकी फ़िल्मों में सामाजिक यथार्थ तो है ही, ग़ौर से अगर इन्हें देखें, तो यह प्रतिबद्ध राजनीतिक फ़िल्में भी हैं।

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