Author name: ndff

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ज़ोहरा सहगल: एक इंक़लाबी औरत, बग़ावत जिसके मिज़ाज का हिस्सा थी

1990 में ज़ोहरा सहगल भारत लौट आईं और अपनी ज़िंदगी के आख़िर तक यहीं रहीं। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों, नाटकों और टीवी सीरियल में अभिनय किया। ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ में निभाए उनके किरदार को भला कौन भूल सकता है।

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मटका किंग: उम्मीदों और लालच के मटके में अटके समाज की कहानी

‘मटका किंग’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामाजिक संदर्भ है। यह सीरीज़ उस दौर को दिखाती है— जब स्वतंत्रता के बाद का भारत आर्थिक अस्थिरता से गुजर रहा था मजदूर वर्ग अवसरों की तलाश में था…

Talk Cinema on the Floor
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सिनेमा, ‘साइंटिस्ट’और संवाद: दिल्ली में ‘टॉक सिनेमा- मार्च चैप्टर’

‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर’ सिर्फ़ फ़िल्में दिखाने या उन पर चर्चा करने तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्पेस बनाने के बारे में है जहां सिनेमा लोगों को साथ लाने का ज़रिया बन जाए — और जहां ये मुलाक़ात धीरे-धीरे एक क्रिएटिव कम्युनिटी में बदल जाए। एक ऐसे शहर में जो खुद को एक गंभीर सिनेमा हब के रूप में स्थापित कर रहा है, ऐसे स्पेस की अपनी अहमियत है और जिसकी आज बहुत ज़रूरत भी है।

Balraj Sahni in Garm Hawa
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याद ए बलराज साहनी वाया गर्म हवा

गर्म हवा की कहानी घूमती है सलीम मिर्जा’ (बलराज साहनी), जो कि आगरा में एक जूते के कारखाने के मालिक हैं, उनके इर्द गिर्द। बँटवारा हो चुका है, सलीम मिर्जा रोज़ सुनते रहते हैं कि हिंदुस्तान में अब मुसलमानों के लिए कुछ नहीं बचा। ख़ुद उनके दोस्त-अहबाब मुल्क छोड़ छोड़कर लाहौर कराची जा रहे हैं लेकिन सलीम हैं कि रोज़ घर, आगरा और हिंदुस्तान छोड़कर न जाने का कोई न कोई नया बहाना खोज ही लेते हैं।

The Reality of Film Festivals
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फिल्म फेस्टिवल का काला सच, ‘एंट्री फीस स्कैम और सरकारी इरादे (1)

देशभर में बड़ी संख्या में ऐसे तथाकथित फिल्म फेस्टिवल सामने आ रहे हैं, जिनका मकसद सिनेमा, संवाद, बाज़ार या प्रतिभा को मंच देना नहीं, बल्कि नये फिल्ममेकर्स से एंट्री फीस के नाम पर पैसा वसूलना प्रतीत होता है। यह सवाल अब सिर्फ असंतोष का नहीं, बल्कि संभावित संगठित शोषण का है।

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न्यू थिएटर्स: जिसने भारतीय सिनेमा में की प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत

न्यू थिएटर्स का दौर भारतीय सिनेमा की यात्रा में हमेशा एक मील का पत्थर रहेगा। न्यू थिएटर्स के योगदान को जिन अहम पहलुओं के ज़रिए समझा जा सकता है, उनमें प्रमुख हैं- सिनेमा में साहित्य को स्थान देना, तकनीकी उत्कृष्टता और सामाजिक संदेश।

Talk Cinema on the Floor
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TCOTF फरवरी चैप्टर: ‘मिनिप्लेक्स का दौर आने वाला है…’

सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि कला, व्यवसाय और दर्शक संवेदना का संगम है। NDFF के ‘Talk Cinema On The Floor’ के फरवरी अध्याय में इसी व्यापक दृष्टि पर गंभीर संवाद हुआ, जहाँ फिल्म व्यवसाय, ऑडियंस रिसेप्शन और बदलते थिएटर मॉडल पर गहन चर्चा की गई। यह पहल राजधानी का एक अनोखा community-driven creative hub बन चुकी है।

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