Chehre: Missing The Honest Face Of A Film
A problem with Chehre is that it is based around what is regularly referred to by the characters as a “game”. The stakes are not high enough, the setting not claustrophobic enough.
A problem with Chehre is that it is based around what is regularly referred to by the characters as a “game”. The stakes are not high enough, the setting not claustrophobic enough.
Birth anniversary special: बंगाली सिनेमा पर जब भी कोई गंभीर चर्चा होती है वो बांग्ला फिल्मकारों की सबसे प्रतिष्ठित त्रयी- सत्यजित राय, ऋत्विक घटक और मृणाल सेन से शुरु होकर वहीं खत्म हो जाती है। हालांकि बंगाली सिनेमा में तपन सिन्हा जैसा कोई दूसरा फिल्मकार नहीं, जिसने उच्चस्तरीय कलात्मकता और बॉक्स ऑफिस सफलता को एक साथ साधा हो।
जर्मन फिल्मकार फ़तिह अकीन पिछले डेढ़ दशक के दौरान यूरोप के सबसे चर्चित फिल्म निर्देशकों में गिेन जाते रहे हैं। उनकी स्टाइल का असर भारत के नई पीढ़ी के फिल्मकारों के काम पर भी देखा गया है।
द फ़ादर डिमेंशिया के मरीज़ एंथनी और उनकी बेटी एन के रिश्ते की कहानी है जो विदेशी पृष्ठभूमि की होते हुए भी अपनी सी लगेगी
“हम सब का अंत है मगर जीवन का अंत नही है”। जीवन चला चलता है। महेश भट्ट की 1984 में बनाई फिल्म सारांश की साहित्यिक समीक्षा।
बेलबाॅटम एक विमान अपहरण कांड में पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई को धूल चटाकर न सिर्फ सभी यात्रियों को सकुशल दुबई से भारत ले आता है बल्कि पाकिस्तानी विमान अपहर्ताओं और आतंकवादियों को भी सलाखों के पीछे पहुँचा देता है। फ़िल्म इसी कारनामे के बारे में है। बेलबाॅटम की भूमिका अक्षय कुमार ने निभाई है।
विश्व सिनेमा में अफगानिस्तान की फिल्मों की चर्चा तब शुरू हुई जब मशहूर फिल्मकार मोहसिन मखमलबाफ की फिल्म ‘ कंधार’ (2001) दुनिया भर के करीब बीस से अधिक फिल्म समारोहों में दिखाई गई। इस फिल्म ने पहली बार एक लगभग भुला दिए गए देश अफगानिस्तान की ओर दुनिया भर का ध्यान खींचा।
फ़िल्मों से दूर हो चुके अभिनेता-निर्देशक अमोल पालेकर ने लंबे समय बाद इस फ़िल्म से अभिनय में वापसी की है। अमोल पालेकर तजुर्बेकार अभिनेता हैं और मसाला सिनेमा से लेकर गंभीर फ़िल्मों में हर तरह की भूमिका में अपने अभिनय का लोहा मनवा चुके हैं। यहाँ भी वह फ़िल्म के केंद्रीय चरित्रों में से एक हैं जो दलित महिलाओं के लिए क़ानूनी लड़ाई लड़ते हैं और उन्हें इंसाफ़ दिलाते हैं।
What they were both after was verisimilitude, of playing it and showing it like it is in real life, or would be in reality.
Meet SMM Ausaja. He is a crazy man He has not saved anything from his earnings because he has always concentrated on adding to his collection of film posters from a very young age.