

बीबीसी लंदन से लेकर हिंदी सिनेमा के सुनहरे पर्दे तक, बलराज साहनी का सफ़र एक सभ्य, संवेदनशील कलाकार की कहानी है। हाल ही में गार्गी प्रकाशन द्वारा लेखक ज़ाहिद खान के संपादन में प्रकाशित किताब बलराज साहनी: एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन उस इंसान की पड़ताल करती है जिसने अभिनय को गरिमा दी और विचार को आवाज़ — एक ऐसा जीवन जो आज भी प्रासंगिक है। बलराज साहनी की जयंती के मौके पर ‘सिने बुक रिव्यू’ के तहत प्रस्तुत है इस पुस्तक पर जय प्रकाश पांडेय की समीक्षा। ये ‘साहित्य तक’ के कार्यक्रम ‘बुक कैफे’ से साभार ली गई है। पत्रकारिता/लेखन की अब तक की यात्रा में जय प्रकाश पांडेय दैनिक गांडीव, स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण, दैनिक इनदिनों के साथ काम कर चुके हैं। दिल्ली प्रेस पत्रिका समूह में विशेष संवाददाता, सहयोगी संपादक और प्रकाशकीय संपादक रह चुके हैं। कई बड़े अखबारों, पत्रिकाओं में स्तंभ लेखन, हजार से अधिक लेख प्रकाशित, साथ ही 1100 से अधिक पुस्तकों पर राय प्रसारित। वर्तमान में साहित्य आजतक और साहित्य तक से संबद्ध। पुस्तक समीक्षा के दैनिक कार्यक्रम ‘बुक कैफे’; साहित्यकारों के जीवन-कर्म पर आधारित साप्ताहिक साक्षात्कार कार्यक्रम ‘बातें-मुलाकातें’; और लेखकों से पुस्तक केंद्रित संवाद ‘शब्द-रथी’ के प्रस्तोता।

क्या भारतीय सिनेमा और रंगमंच में कोई ऐसा कलाकार हुआ है, जिसे सच मायनों में जन कलाकार कहा जा सके ? जवाब है—बलराज साहनी। चर्चा पुस्तक ‘बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ की। जिसके सम्पादक हैं, ज़ाहिद खान। ज़ाहिद ख़ान प्रगतिशील आंदोलन से जुड़े हुए हैं। भारतीय साहित्य पर उनका विस्तृत काम है। ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’ आदि पुस्तकें उन्होंने लिखी हैं, तो ‘शैलेन्द्र : हर ज़ोर ज़ुल्म की टक्कर में’ जैसी पुस्तकों का उन्होंने सम्पादन किया है। जाना—माना नाम है। बेहद संवेदनशील हैं और इस बात का लगातार प्रयास कर रहे हैं कि भारत की साझा संस्कृति और विरासत से जुड़े हुए जो प्रगतिशील लेखक, शायर और कलाकार हैं, उनके बारे में, उनके जीवन के बारे में, उनके काम के बारे में युवा पीढ़ी को बताया जाए। ज़ाहिद ख़ान इसके लिए लगातार सृजनत हैं। ‘बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ एक ऐसी ही पुस्तक है। यह पुस्तक सिर्फ़ एक अभिनेता की जीवनी नहीं, बल्कि एक ऐसे इंसान की कहानी है, जिसने अपने कला जीवन को आम जनता, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक मूल्यों के लिए समर्पित कर दिया। ख़्वाजा अहमद अब्बास ने उन्हें जन कलाकार कहा था। और सच भी यही है। बलराज साहनी का जीवन किसी ग्लैमर या दिखावे का नहीं, बल्कि संघर्ष, सादगी और विचारों की प्रतिबद्धता का जीवन था। उन्होंने सिनेमा और रंगमंच को सिर्फ़ मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि समाज से जुड़ने और उसे बेहतर बनाने का ज़रिया माना।
बलराज साहनी की सोच और शख्सियत
बलराज साहनी ना केवल गुरुदेव रवीन्द्र नाथ टैगोर, महात्मा गॉंधी, कार्ल मार्क्स, व्लादिमीर लेनिन और स्तानिस्लावस्की को अपना गुरु मानते थे, बल्कि भारत के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने पर उनकी गहरी नज़र थी। वे इप्टा से भी जुड़े थे। फ़िल्म निर्देशक, निर्माता, लेखक, प्राध्यापक, कलाकार और आंदोलनकारी के रूप में भी उनकी अपनी ख्याति थी। उनका जो पहला कहानी संग्रह था, वह ‘बसंत क्या कहेगा’ के नाम से प्रकाशित हुआ था। पुस्तक समीक्षाएं लिखने का भी उनका शौक़ था। और उनके विचार क्या थे ? इसे हम ऐसे समझ सकते हैं कि समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और बराबरी के समाज की उन्होंने परिकल्पना की थी। ‘आज के साहित्यकारों से अपील’ लेख में उन्होंने लिखा था कि ”हमारा देश अनेक क़ौमियतों का साझा परिवार है। वह तभी उन्नति कर सकता है, अगर हर क़ौम अपनी जगह संगठित और सचेत हो और अपनी जगह भरपूर मेहनत और उद्यम करे। जैसे हर क़ौम, वैसे ही हर व्यक्ति समान अधिकार रखने वाला हो। यह अधिकार आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक हो। भारतीय एकता और उन्नति का संकल्प लोकवाद और समाजवाद के आधार पर ही किया जा सकता है। ना कि बड़ी मछली को छोटी मछली को हड़प करने का अधिकार देकर।” आप समझ सकते हैं कि किस तरह से समता, समानता बलराज साहनी के जीवन का मूल उद्देश्य था। एक कवि, कहानीकार, नाटककार, कलाकार, नाट्य निर्देशक, संगठनकर्ता और एक समर्पित राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में उनका जो जीवन था, जो उनकी साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक गतिविधियॉं थी। उनका मूल्यांकन उस रूप में नहीं हो पाया जिस रूप में होना चाहिए।

‘समाज और सियासत कला से अलग नहीं’
पुस्तक ‘बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ में उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को बेहद गहराई से सामने लाया गया है। चाहे उनका शुरुआती जीवन हो या फिर सामाजिक, राजनीतिक आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी। उनके भीतर एक कलाकार के साथ—साथ एक विचारक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भी बसता था। किताब में जो लेख शामिल हैं, उनमें पीसी जोशी का लेख है—’बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ ख़्वाजा अहमद अब्बास—’जन कलाकार थे बलराज साहनी’, परीक्षित साहनी—’मार्क्सवादी होने के नाते वे बस एक लाल झॅंडा चाहते थे’, जसवंत सिंह कॅंवल—’इंसानियत का मुजस्समा मेरा दोस्त बलराज’। बलराज साहनी का ख़ुद के बारे में लिखा हुआ एक आलेख है—’मेरा जीवन दृष्टिकोण’। ‘इटा की यादें’ यह भी बलराज साहनी का ही आलेख है। इसके अलावा उनके अन्य आलेख हैं—’मेरा सबसे पहला क्लोज अप’, ‘मैंने दो बीघा ज़मीन में काम किया’। पुस्तक में उनके कुछ यादगार भाषण भी हैं। मसलन ‘हमें आज़ादी तो मिल गई पर पता नहीं कि उसका क्या करना है’। इस भाषण से पता चलता है कि समाज को लेकर बलराज साहनी की क्या दृष्टि थी। भारतीय और भारतीयता को लेकर उनकी क्या दृष्टि थी। ‘नाटक, सिनेमा और संस्कृति’ यह भी उनका एक भाषण है। इस भाषण से पता चलता है कि बलराज साहनी इन सबको लेकर क्या सोचते थे। अपने फ़िल्मी जीवन की 25वीं वर्षगॉंठ पर बलराज साहनी ने क्या कुछ कहा था ? वह भी इस पुस्तक का हिस्सा है। इसके अलावा दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं, जिनमें बलराज साहनी का यात्रा वृतांत ‘मेरा रूसी सफ़रनामा’ का एक अंश ‘यासनाया पोलियाना’ है। ‘पृथ्वीराज और नाट्य कला’ बलराज साहनी का यह आलेख भी इस पुस्तक में शामिल है।

अतीत को सबक की तरह लिया
पुस्तक से हमें और भी कई बातें जानने को मिलती हैं। किस तरह से बलराज साहनी हिन्दू—मुस्लिम एकता, समाज के सर्वांगीण विकास, भाषाओं के आपसी समन्वय, आम जनता के ऊपर उठने और पूंजीवादी व्यवस्था का प्रतिरोध कर रहे थे। किस तरह से राष्ट्रीय जागरूकता उनके लिए सामाजिक जिम्मेदारियों से इतर नहीं थी। उनके लिए सांस्कृतिक कार्य का स्तर था, व्यक्ति के जीवन को और भी आगे बढ़ाना। वे मानते थे कि संस्कृतिकर्मी का काम किसी भी रूप में किसी भी इंजीनियर, डॉक्टर, राजनेता से कमतर नहीं है। वे आम आदमी के जीवन के संघर्षों को ना केवल सिनेमा, बल्कि रंगमंच पर भी उभारने की हिमायती शायद इसलिए रहे होंगे। क्योंकि उनके अपने जीवन का जो संघर्ष था, जिस तरह से उन्होंने विस्थापन झेला था, जिस तरह से उनकी शिक्षा—दीक्षा हुई थी, उन सब ने उन्हें वह दृष्टि दी, जिससे वह इस देश के बारे में सोच सके। एक विशेष बात और कि वह ख़ुद भी कहते थे कि ”मैं ईश्वर को मानता हूॅं या नहीं ! यह एक प्रश्न नहीं हो सकता। क्योंकि मैं ईश्वर को नहीं मानता। मैं नास्तिक हूॅं। लेकिन इसकी वजह यह है कि मैं ज्ञान और कर्म के क्षेत्र को विशाल रूप से देखता हूॅं। सृष्टि संबंधी विचार इसके बाद आते हैं।”
उनका मानना है कि ”मनुष्य के विकास की जो सर्वोत्तम प्राप्ति है, वह है— विज्ञान और दर्शन।” उनका कहना है कि ”मार्क्सवाद जो है, वह दर्शन की सर्वोच्च उपलब्धि है। इसलिए क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी मनुष्य की सृष्टि की अनंतता और मनुष्य की नगण्यता के बीच जो है, वह तालमेल बिठाने की कोशिश करता है।” उनका कहना है कि ”दरअसल, यह जो पाप—पुण्य के सवाल हैं, जो ईश्वर के सवाल हैं, जो स्त्री—पुरुष के सवाल हैं, जो अमीर—गरीब के सवाल हैं, जो ख़ुशी और दुख के सवाल हैं, यह सारे सवाल ईश्वर पर नहीं छोड़े जा सकते, भाग्य पर नहीं छोड़े जा सकते। आपको कर्म करना होगा और समाज में जो सक्षम लोग हैं, उनकी यह ज़िम्मेदारी बनती है कि वह अपने से कमज़ोरों का ख़याल रखें।” सैद्धांतिक रूप से आप बलराज साहनी के इन विचारों से सहमत हो या असहमत, लेकिन मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठ बनाने में और एक ख़ूबसूरत जीवन, एक ख़ूबसूरत समाज, एक उम्दा समाज, एक बेहतर समाज की परिकल्पना करने की उनकी सोच को आप नकार नहीं सकते। बलराज साहनी जिस समाज की परिकल्पना कर रहे थे, जिस राष्ट्र की परिकल्पना कर रहे थे, जिस परिवार की परिकल्पना कर रहे थे, जिस तरह से वह आम आदमी की उन्नति का स्वप्न देख रहे थे, उनके लिए इससे इतर श्रद्धांजलि नहीं हो सकती कि हम उनके विचारों पर कुछ क़दम चल सकें।
एक आला कलाकार और उसकी ‘विश्व-दृष्टि’
इस पुस्तक की सबसे बड़ी ख़ूबी यह है कि यह सिर्फ़ एक कलाकार की कहानी नहीं कहती, बल्कि उस दौर के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक परिदृश्य को भी जीवंत कर देती है। यह हमें सोचने पर मजबूर करती है कि एक सच्चा कलाकार वही है, जो अपने समय और समाज से गहराई से जुड़ा हो। अगर आप साहित्य, सिनेमा और समाज के रिश्ते को समझना चाहते हैं, और एक ऐसे कलाकार की ज़िंदगी को क़रीब से जानना चाहते हैं, जिसने कला को जन सेवा का माध्यम बनाया, तो यह पुस्तक आपके लिए एक बेहतरीन पाठ है। ज़ाहिद ख़ान को इस बात की के लिए बधाई दी जानी चाहिए कि उन्होंने पुस्तक में बलराज साहनी के जीवन के विविध पहलुओं को ना केवल संजोया है, बल्कि इस पुस्तक में उन्होंने उन महान रचनाकारों, सृजनकारों, कलाकारों के वक्तव्यों को भी लिया है। उनके लेखों को भी लिया है। जिससे यह पता चलता है कि दरअसल, बलराज साहनी वाक़ई क्या थे। आप अगर ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ पुस्तक पढ़ें, तो आपको पता चलेगा कि 208 पृष्ठों की यह पुस्तक किस तरह से एक महान कलाकार को अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करती है। ‘गार्गी प्रकाशन’ ने इस पुस्तक का प्रकाशन किया है। इसका मूल्य 240 रुपए है। मैं ज़ाहिद ख़ान और ‘गार्गी प्रकाशन’ को बहुत-बहुत बधाई और शुभकामनाएं देता हूॅं। इतनी कम पृष्ठों में ज़ाहिद ख़ान हमेशा अनोखी सामग्री लेकर आते हैं। ऐसी सामग्री लेकर आते हैं, जिसका उद्देश्य भारतीय समाज में एकजुटता का होता है। समरसता का होता है। भाईचारे का होता है। वे उन्हीं कलाकारों के जीवन पर बात कर रहे हैं। और उनकी दृष्टि है कि भारत और भारतीयता अपने उन अग्रज कलाकारों को, कथाकारों को, साहित्यकारों को, शायरों को, रचनाकारों को, उनके जीवन के बारे में, उनके काम के बारे में और उन्हें जिस तरह से उनके समय ने और उनके समय के श्रेष्ठ लोगों ने याद किया है, उससे रूबरू हो सकें।
'बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन'
सम्पादक : ज़ाहिद ख़ान,
प्रकाशक : गार्गी प्रकाशन नई दिल्ली
पेज : 208, मूल्य : 240 रुपए
