
भारतीय सिनेमा के पर्याय और विश्व प्रसिद्ध निर्देशक सत्यजित राय की 106वीं जयंती के अवसर पर यह लेख उनकी असाधारण सिनेमाई यात्रा का अवलोकन करता है। ‘पथेर पांचाली’ से लेकर अपने आखिरी दौर की फिल्मों तक, राय ने जिस तरह से यथार्थ और कला का संतुलन बनाया, वह आज भी फिल्म जगत के लिए एक मानक है। उनकी फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि जीवन के उतार-चढ़ाव और मानवीय गरिमा का एक गहन दस्तावेज़ हैं। ज़ाहिद खान का यह आलेख उनकी उसी महान विरासत और वैश्विक सिनेमा पर उनके अमिट प्रभाव को रेखांकित करने का एक प्रयास है। बीसवीं सदी में भारतीय साहित्य में चले प्रगतिशील आन्दोलन पर लेखक ज़ाहिद ख़ान का विस्तृत कार्य है। उनकी कुछ अहम किताबें हैं—‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक का कारवॉं’, ‘तहरीक—ए—आज़ादी और तरक़्क़ीपसंद शायर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’। ‘शैलेन्द्र हर ज़ोर—ज़ुल्म की टक्कर में’, ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ और ‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ ज़ाहिद ख़ान द्वारा सम्पादित किताबें हैं, तो वहीं ‘मख़दूम मोहिउद्दीन सुर्ख़ सवेरे का शायर’, ‘मजाज़ हूँ मैं सरफ़रोश हूँ मैं’ और ‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ का उन्होंने अनुवाद और सम्पादन किया है। ज़ाहिद ख़ान ने कृश्न चन्दर के ऐतिहासिक रिपोर्ताज ‘पौदे’, हमीद अख़्तर की किताब ‘रूदाद—ए—अंजुमन’, अली सरदार जाफ़री का ड्रामा ‘यह किसका ख़ून है !’, कृश्न चन्दर का ड्रामा ‘दरवाज़े खोल दो’,अली सरदार जाफ़री का कहानी संग्रह ‘मंज़िल’ और उर्दू के अहम अफ़साना—निगारों पर केन्द्रित किताब ‘कुछ उनकी यादें कुछ उनसे बातें’ का उर्दू से हिन्दी लिप्यंतरण और अनुवाद भी किया है।
महान फ़िल्मकार सत्यजित राय उर्फ़ मानिक दा देश के ऐसे फ़िल्मकार हैं, जिनकी पहली ही फ़िल्म से उन्हें एक दुनियावी शिनाख़्त और बेशुमार शोहरत मिली। उस वक़्त आलम यह था कि उनकी गिनती दुनिया के नामवर फ़िल्मकारों अकिरा कुरोसावा, जान रेनुआं, फेलिनी, सर्जेई आइजे़ंस्टाइन, इंगमार बर्गमैन, ह्यूस्टन वगैरह के साथ होने लगी थी। और दुनिया भर में धूम मचाने वाली वह ऑलटाइम क्लासिक फ़िल्म थी, ‘पथेर पांचाली’। साल 1956 में ‘कान फ़िल्म समारोह’ में इसे ‘बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट’ यानी सर्वश्रेष्ठ मानवीय फ़िल्म का अवार्ड मिला। यह सिलसिला रुका नहीं, राय की ‘अपु ट्रिलॉजी’ यानी ‘पथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’ और ‘अपुर संसार’ दुनिया की सर्वकालिक महान फ़िल्मों में गिनी जाती हैं। इन फ़िल्मों ने पश्चिमी फ़िल्म समारोहों में दर्जनों बड़े अवार्ड अपने नाम किए। अपने चार दशक से भी लंबे फ़िल्म करियर में सत्यजित राय ने तीन दर्जन फ़िल्में बनाईं, जिनमें वृत्तचित्र और लघु फ़िल्में भी शामिल हैं। सभी बेमिसाल। सत्यजित राय और उनकी फ़िल्मों की लोकप्रियता की यदि वजह जानें, तो उनके सिनेमा की स्थानीयता में भी वैश्विकता के दीदार होते थे। अपनी फ़िल्मों में वे कम शब्दों में बात करते हैं। अलबत्ता दृश्यों और बिम्बों में बड़ी-बड़ी बातें कह जाते हैं। एक कविता सा रचाव है, इन फ़िल्मों में। दर्शक इन फ़िल्मों को देखकर कभी कुछ सोचते हैं, तो कभी मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। यह फ़िल्में उन पर एक जादू—सा करती हैं।
वैश्विक सिनेमा के क्षितिज पर भारतीय उदय
सत्यजित राय की प्रतिभा का उनके समकालीन फ़िल्मकार भी लोहा मानते थे। जापानी फ़िल्मकार अकीरा कुरोसावा तो जैसे राय की फ़िल्मों पर पूरी तरह से फ़िदा थे। राय की फ़िल्मों के बारे में उनकी राय थी, ‘‘मानव प्रजाति के लिए एक शांत लेकिन बहुत गहरा प्रेम, समझ और अवलोकन उनकी फ़िल्मों की चारित्रिक विशेषता रही है। जिसने मुझे बहुत अधिक प्रभावित किया है। मुझे लगता है कि वो मूवी इंडस्ट्री के विराट व्यक्तित्व हैं। उनकी फ़िल्में न देखे होना वैसा ही है, जैसे बिना चांद और सूरज को देखे इस दुनिया में जीना है।’’ सत्यजित राय की यह अज़्मत है। ‘द गॉडफादर’ सीरीज़ फ़िल्मों के डायरेक्टर फ्रांसिस फोर्ड कोपोला भी सत्यजित राय के मुरीद थे। हो सकता है कि मौज़ूदा पीढ़ी को उनका यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, ‘‘हम भारतीय सिनेमा को राय की फ़िल्मों के ज़रिए ही जानते हैं।’’ वहीं अमेरिका के बड़े फ़िल्ममेकर मार्टिन स्कॉर्सेसी ने तो सत्यजित राय को बीसवीं सदी के शीर्ष-10 डायरेक्टर्स में शुमार किया था। सत्यजित राय के नाम कई रिकॉर्ड हैं। वे अकेले भारतीय हैं, जिन्हें ‘ऑस्कर लाइफ़ टाइम अचीवमेंट’ का पुरस्कार दिया गया था। सत्यजित राय फ़िल्मी दुनिया में वाक़ई एक लीजेंड थे। जिन्होंने अपने जीते जी कई बड़े मुक़ाम हासिल किए।
सत्यजित राय की शुरुआत और पथेर पांचाली
सत्यजित राय ने अपने करियर की शुरूआत एक विज्ञापन एजेंसी में ग्राफ़िक डिज़ाइनर, विज़ुअलाइज़र के तौर पर की। ब्रिटिश विज्ञापन कंपनी डीजे कीमर में वे विज्ञापन तैयार करते थे। उस वक़्त के उनके इन विज्ञापनों में भी रचनात्मकता देखते ही बनती थी। विज्ञापन के लिए उन्हें इलस्ट्रेशन बनाने होते थे। बहरहाल, अपनी इस नौकरी के सिलसिले में उन्हें एक बार इंग्लैंड जाने का मौक़ा मिला। जहॉं उन्होंने दुनिया की बेहतरीन फ़िल्में देखीं। अमर्त्य सेन ने अपनी मक़बूल किताब ‘द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन’ में लिखा है,‘‘ख़ास तौर पर इटली के मशहूर निर्देशक विटोरिया डीसिका की फ़िल्म ‘बाइसिकल थीव्ज़’ का उन पर सबसे ज़्यादा असर हुआ।’’ न्यू-रियलिस्टिक यानी नव-यथार्थवादी सिनेमा की यह शुरूआत थी, जिससे सत्यजित राय काफ़ी मुतास्सिर हुए। जिसकी बानगी कमोबेश उनकी सभी फ़िल्मों में दिखाई देती है। गोया कि यथार्थवादी सिनेमा से उन्होंने कभी नाता नहीं तोड़ा। बहरहाल, विश्व सिनेमा से रू-ब-रू होने के बाद सत्यजित राय ने बड़े ही जोश से अपनी पहली फ़िल्म पर काम करना शुरू किया। बंगाल के विख्यात लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय की कालजयी रचना ‘पथेर पांचाली’ पर सत्यजित राय ने फ़िल्म बनाने का मंसूबा बनाया। उनके इस ख़्वाब की ताबीर होने में हालॉंकि, बहुत परेशानियॉं पेश आईं। ख़ास तौर पर इस फ़िल्म के लिए पैसा जुटाना, राय के लिए कोई आसान काम नहीं था। सत्यजित राय ने अपने सपने को साकार करने के लिए पत्नी विजया राय के गहने तक बेच डाले।

तीन साल के लंबे इंतज़ार और कड़ी मशक्कत के बाद 1955 में ‘पथेर पांचाली’ रिलीज हुई। फ़िल्म रिलीज होते ही इसकी मक़बूलियत कान फ़िल्म फेस्टिवल में सम्मानित होने के बाद दीगर पश्चिमी फ़िल्म समारोहों में भी फ़िल्म ने धूम मचाई। भारत की बात करें, तो इस फ़िल्म को पश्चिम बंगाल के साथ-साथ पूरे देश के दर्शकों का प्यार मिला। सरकार ने ‘पथेर पांचाली’ को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया। एक छोटे से गाँव में सुविधाओं के अभाव और ग़रीबी के बीच एक परिवार के छोटे-छोटे सुखों और दुःखों की यह कहानी इतनी सार्वभौमिक और सार्वकालिक है कि इसने बांग्लाभाषी होते हुए भी दुनियाभर के दर्शकों को प्रभावित किया। सिनेमा की दुनिया में सत्यजित राय की सीधी-सादी क़िस्सागोई ने तहलका मचा दिया। यह जानकर आपको हैरानी होगी कि फ़िल्म ‘पथेर पांचाली’ को ग्यारह अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार और भारत में कुल बत्तीस सम्मान मिले। बीबीसी की बेहतरीन एक सौ फ़िल्मों की फेहरिस्त में ‘पथेर पांचाली’ भी शामिल है। इस फ़िल्म की कामयाबी के बाद सत्यजित राय ने विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के दो उपन्यासों ‘पथेर पांचाली’ और ‘अपराजितो’ पर ही आधारित अपू ट्रिलॉजी यानी अपु त्रयी बनाई। ‘पथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’ और ‘अपुर संसार’ तो सत्यजित राय की सबसे फेमस ट्रिलॉजी है ही, कोलकाता त्रयी के तहत भी उन्होंने ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘सीमाबद्ध’ और ‘जनअरण्य’ जैसी कलात्मक और विचारसंपन्न फ़िल्में बनाईं। जिसमें कलकत्ता महानगर का तत्कालीन सामाजिक और राजनैतिक परिवेश पूरी शिद्दत के साथ आया है। ‘पथेर पांचाली’ की तरह ही सत्यजित राय की फ़िल्म ‘अपराजितो’ और ‘अपुर संसार’ भी विदेशों में काफी सराही गईं। वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल में इसे बेस्ट फ़िल्म के ‘गोल्डन लायन आफ़ सेंट मार्क अवार्ड’ से सम्मानित किया गया, तो अमेरिका, बर्लिन और डेनमार्क फ़िल्म फेस्टिवल में भी इसे कई पुरस्कार मिले। ‘अपुर संसार’, श्रेष्ठ फ़िल्म के राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाज़ी गई।

यथार्थवादी सिनेमा की नई परिभाषा और विरासत
सत्यजित राय की शुरूआती फ़िल्मों में बांग्ला संस्कृति और वहां का रहन-सहन, हाशिये से नीचे के समाज के सुख-दुःख एवं उनकी चिंताएं प्रमुखता से आई हैं। अपनी फ़िल्मों में वे उम्मीद का दामन कभी नहीं छोड़ते। उदार जीवन मूल्यों को बचा लेने की ज़िद उनमें दिखाई देती है। सत्यजित राय में एक गहरा इतिहासबोध था। फ़िल्मों में वे प्रमाणिक सामाजिक चित्रण करते थे। आगे चलकर उनकी फ़िल्मों में आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक समस्याएं केन्द्र में रहीं। बेरोजगारी और उससे पैदा हुआ असंतोष, गरीबी, नक्सल समस्या, इमरजेंसी आदि तमाम संवेदनशील मुद्दों पर सत्यजित राय ने ‘प्रतिद्वंद्वी’, ‘जनअरण्य’, ‘सीमाबद्ध’, ‘गणशत्रु’ जैसी फ़िल्में बनाईं। वहीं ‘देवी’, ‘महापुरुष’ और ‘सद्गति’ फ़िल्मों में वे अंध आस्था, अंधविश्वास, धार्मिक कुरीतियों और जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ तल्ख़ टिप्पणियां करते हैं। सत्यजित राय अपनी इन तमाम फ़िल्मों में क्रोध को विडम्बना में बदल देते थे। फ़िल्म में व्याप्त यह आंतरिक ग़ुस्सा प्रतिरोध में बदल जाता है। उनकी फ़िल्में लाउड नहीं हैं, लेकिन उनमें एक प्रतिरोध है। फ़िल्म ‘आगंतुक’ में सत्यजित राय बदलते मानवीय संबंधों की मर्मस्पर्शी कहानी कहते हैं।
बंगाल के 1943 के भयावह अकाल पर सत्यजित राय ने ‘अशनि संकेत’, तो फ़िल्म ‘तीन कन्या’, ‘देवी’, ‘घरे-बाइरे’, ‘चारुलता’, ‘कापुरुष’ और ‘महानगर’ में वे महिलाओं के सवालों को बड़ी ही संवेदनशीलता से उठाते हैं। ‘महानगर’, स्त्री मुक्ति की कथा है। ‘देवी’ में जहॉं धार्मिक अंधविश्वास को निशाना बनाया है, तो वहीं रूढ़िवादिता और सुधारवाद की भी जद्दोजहद दिखलाई गई है। फ़िल्म ‘गणशत्रु’, हेनरिक इब्सन के नाटक ‘एन एनिमी ऑफ द पीपल’ पर आधारित है। धार्मिक कट्टरता, अंधविश्वास और भ्रष्ट व्यवस्था के ख़िलाफ़ इसमें संघर्ष दिखलाया गया है। ज़ाहिर है कि इस फ़िल्म ने भी देश-दुनिया में ख़ूब धूम मचाई। ‘गुपी गायन बाघा बायेन’ एक फंतासी है, जिसे बच्चों के साथ-साथ बड़ों ने भी पसंद किया। इस फ़िल्म के प्रदर्शन के बारह साल बाद गूपी और बाघा के ही किरदारों को लेकर राय ने ‘हीरक राजार देशे’ बनाई। ‘गुपी गायन बाघा बायेन’ के बरक्स इस फ़िल्म में एक सशक्त संदेश है। राय ने फ़िल्म में तत्कालीन राजनीतिक स्थिति का बेजोड़ रूपक खींचा है।
साल 1958 में रिलीज हुई ‘जलसाघर’ भी सत्यजित राय की एक क्लासिक फ़िल्म है। जिसकी चर्चा उतनी नहीं होती, जितनी कि होनी चाहिए। इस फ़िल्म में उन्होंने सामंती अभिजात वर्ग के पराभव और उनकी मनोदशा को बड़ी ही बारीकी से दर्शाया है। सामंतशाही के ढह जाने के बाद भी यह वर्ग उसी नशे में चूर रहता है। यही नहीं सरमायादारी की आहट भी फ़िल्म में दिखाई देती है। कमोबेश इसी थीम पर सत्यजित राय ने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ बनाई। सामंतवाद का पतन और साम्राज्यवाद का उत्थान इस फ़िल्म का केन्द्रीय विचार है। सत्यजित राय ने बांग्ला सिनेमा को काफ़ी कुछ दिया। एक से बढ़कर एक बांग्ला फ़िल्में बनाईं, लेकिन हिंदी में उन्होंने सिर्फ़ दो ही फ़िल्में बनाईं। यह महज़ इत्तिफ़ाक़ ही है कि उनकी दोनों फ़िल्में, प्रेमचंद की प्रसिद्ध कहानियों पर आधारित हैं। साल 1977 में उन्होंने ‘शतरंज के खिलाड़ी’ और 1981 में दूरदर्शन के लिए टेलीफिल्म ‘सद्गति’ बनाई। ‘सद्गति’ में जहॉं जातिवाद और उससे उत्पन्न भेदभाव की समस्या केंद्र में है, तो वहीं ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में पतनोन्मुखी सामंतशाही का ज़िक्र है। बड़ी ही खू़बसूरती से राय ने इन अलग-अलग पृष्ठभूमि की कहानियों को पर्दे पर फ़िल्माया है। राय की फ़िल्मों की एक बड़ी ख़ासियत डिटेलिंग है। उनकी डिटेलिंग इतनी ज़बरदस्त होती है कि दर्शक और फ़िल्म समीक्षक दोनों ही सत्यजित राय की निर्देशकीय क्षमता के कायल हो जाते हैं। सूक्ष्म, अति सूक्ष्म ब्यौरों को भी वे बड़ी ही संजीदगी से अपनी फ़िल्मों में दर्ज़ करते थे। विवरणों के माध्यम से वे पात्रों के आपसी संबंधों और भावनात्मक पहलुओं को उजागर करते थे।
सत्यजित राय: समय की सीमाओं से परे एक अमर प्रभाव

सत्यजित राय मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। जिन्होंने सेल्युलाइड पर अपनी फ़िल्मों से कई बार करिश्मा किया। उन्होंने हमेशा कलात्मक और यथार्थवादी शैली की ही फ़िल्में बनाईं। व्यावसायिक फ़िल्मों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। व्यावसायिक फ़िल्मों के बारे में उनका ख़याल था, ‘‘व्यावसायिक फ़िल्मों की कोई जड़ नहीं होती। वे झूठी होती हैं, एकदम ढाली गयीं, किसी गढ़े हुए संसार में लिप्त।’’ (‘गीतिपरक, और विडंबनामय भी’, सत्यजित राय से श्याम बेनेगल की बातचीत, पत्रिका ‘पटकथा’, नवम्बर-दिसम्बर-1986) सत्यजित राय के लिए फ़िल्में मनोरंजन या कमाई का ज़रिया भर नहीं थीं। फ़िल्में उनकी जिंदगी का एक मिशन थीं। जिनसे वे अपने समाज से जुड़ना चाहते थे। उनमें कुछ नये विचारों का संचार करना चाहते थे। अपने एक इंटरव्यू में सत्यजित राय ने कहा है, ‘‘रचनात्मक कर्म के अलावा फ़िल्म बनाना उत्तेजक है। क्योंकि, यह मुझे मेरे देश तथा जनता के समीप लाता है।’’ यही नहीं वे इस बात की भी हिमायत करते थे, ‘‘भारतीय फ़िल्मकार को जीवन, यथार्थ की ओर मुड़ना होगा। उनका आदर्श देसी का होना चाहिए।’’
