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Bela Tarr
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बेला टार, लाज़लो क्रासनाहोरकाई और ‘सेटनटैंगो’

अभी हाल में मैंने ‘द टुरिन होर्स’ देखी। इसकी अन्य सिनेमैटिक विशेषताओं के अलावा इसे देखते हुए मुझे प्रेमचंद के ‘कफ़न’, ‘वेटिंग फ़ॉर गोदो’ की झलक मिली। मार्केस के लेखन की याद आई। बेला टार एवं एवं उनकी पत्नी ऐग्नेस हेरनस्की ने मिल कर इसे निर्देशित किया है। छ: दिन निरंतर चल रही तूफ़ानी हवा के बीच चलती फ़िल्म को देखना एक बारगी मार्केस के यहाँ होने वाली लगातार बारिश की याद दिलाता है।

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काबुल का आरियाना: जो एक सिनेमाघर हुआ करता था…

फिल्मकार फेडरिको फेलिनी ने कभी कहा था कि “सिनेमा एक जादुई दर्पण है।” आरियाना वह दर्पण था जिसमें काबुल ने खुद को मुस्कुराते हुए देखा था। आज वह दर्पण टूट चुका है। काबुल की हवाओं में अब उस मलबे की धूल है, जिसमें दशकों का संगीत, तालियाँ और हज़ारों कहानियाँ दफ़्न हो चुकी हैं।

Shyam Benegal
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श्याम बाबू सिनेमा में संविधान के मूल्य जिन्दा रखते थे: प्रथम पुण्यतिथि विशेष

करीब से जानने पर यह और स्पष्ट हुआ कि श्याम बेनेगल के लिए सिनेमा कभी भी केवल पेशा नहीं रहा। वह उनके जीवन की बुनियादी भाषा थी, दुनिया को समझने और समझाने का जरुरी माध्यम ।

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ALT EFF Delhi 2025: सिनेमा के मंच पर सच की पड़ताल, सख्त सवाल

फेस्टिवल के दोनों दिन बेहद महत्वपूर्ण और नई जानकारियों से भरपूर कुछ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय फ़िल्में प्रदर्शित की गईं। इनमें सामाजिक अन्याय, विस्थापन, जंगलों का विनाश, शहरी सीवेज प्रणाली और मानव–पर्यावरण संबंध जैसे मुद्दों को गहराई से दिखाया गया। दूसरे दिन एक महत्वपूर्ण पैनल डिस्कशन भी आयोजित किया गया, जिसका विषय था— ‘हमारा पर्यावरण, हमारा भविष्य: स्थानीय चुनौतियाँ और समाधान’।

Pariticipants Cinephiles
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TCOTF नवंबर चैप्टर: ‘कंटेंट सिर्फ कच्चा माल होता है…’

हर महीने होने वाले फिल्मकार, लेखक, छात्र, तकनीशियन और सिनेप्रेमियों के जीवंत समूह की रचनात्मक और दिलचस्प अड्डेबाज़ी के आयोजन टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर ने 6 महीने पूरे कर लिए हैं। नवंबर चैप्टर में एक बार सिनेमा के अलग-अलग पहलुओं पर खास मेहमानों के साथ चर्चा हुई। यह पहल राजधानी का एक अनोखा community-driven creative hub बन चुकी है।

Ritwik Ghatak
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क्या ऋत्विक घटक ने की भारतीय सिनेमा में ‘न्यू वेव’ की शुरुआत?

फिल्म एंड टेलिविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया में अध्यापन के दौरान घटक ने फिल्मकारों की एक ऐसी पीढ़ी को आकार दिया जिन्होने सिनेमा सृजन की घटक की परंपरा को न सिर्फ आगे बढ़ाया बल्कि अपने अमूल्य योगदान से उसके लिए नया रास्ता तैयार किया, जो भारत के सिनेमा के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण दौर बना, जिसे भारतीय न्यू वेव के नाम से जाना गया।

Ritwik Ghatak centenary
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ऋत्विक घटक जन्मशती: विस्थापन भोगे ‘नागरिक’ की याद

इस आयोजन में घटक की फिल्म ‘नागरिक’ की स्क्रीनिंग और उस पर महत्वपूर्ण सिनेमा विशेषज्ञों की चर्चा बहुत खास रही। विभाजन पर बनायी ऋत्विक घटक की पहली फिल्म ‘नागरिक’ की कहानी विभाजन के तुरंत बाद के कलकत्ता की है। फिल्म उत्तरी बंगाल के एक परिवार के ज़रिए युद्ध और विभाजन के बाद के दौर के संघर्षों के बारे में बात करती है।

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