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Filmmaking with AI
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AI के दौर में फिल्ममेकिंग: TCOTF में नई सीख, नए सवाल, नई संभावनाएं

“AI फिल्मकारों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन्हें रीडिफाइन करेगा।” इस अहम सार के साथ टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के अप्रैल सत्र आयोजित किया गया, जिसमें सिनेमा और तकनीक के बदलते रिश्ते पर बातचीत के साथ-साथ सीखने-सिखाने का भी दिलचस्प सत्र चला।

Satyajit Ray
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सत्यजित राय: ‘भारतीय फ़िल्मकार को जीवन, यथार्थ की ओर मुड़ना होगा’

सत्यजित राय मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। जिन्होंने सेल्युलाइड पर अपनी फ़िल्मों से कई बार करिश्मा किया। उन्होंने हमेशा कलात्मक और यथार्थवादी शैली की ही फ़िल्में बनाईं। व्यावसायिक फ़िल्मों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। व्यावसायिक फ़िल्मों के बारे में उनका ख़याल था, ‘‘व्यावसायिक फ़िल्मों की कोई जड़ नहीं होती। वे झूठी होती हैं, एकदम ढाली गयीं, किसी गढ़े हुए संसार में लिप्त।’’

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भारतीय सिनेमा के जन कलाकार: बलराज साहनी

पुस्तक ‘बलराज साहनी : एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ में उनके जीवन के कई अनछुए पहलुओं को बेहद गहराई से सामने लाया गया है। चाहे उनका शुरुआती जीवन हो या फिर सामाजिक, राजनीतिक आंदोलनों में उनकी सक्रिय भागीदारी। उनके भीतर एक कलाकार के साथ—साथ एक विचारक, लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता भी बसता था।

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इरफ़ान की यादें: वाया अनूप सिंह की ‘जहाँ ले चले हवा’

किताब में एक जगह इरफ़ान के हवाले से दर्ज है, ”मौत के बहुत सारे चेहरे हैं, अनूप साब। वे मेरा मन बहलाते रहते हैं, और मैं बेहतर ढंग से सांस लेने लगता हूं और दर्द तक को भूल जाता हूॅं। मौत के अनेक चेहरे। बहुत सारे। कभी—कभी वह एक रौशनी होती है, थोड़ी—सी पीली और नीली। कभी—कभी कोहरा। बहुत—से सपने। बहुत—से सपने।’

NDFF Satyajit Ray Memorial Talk
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सत्यजित राय मेमोरियल टॉक: आज के सिनेमा में यथार्थ और संवेदना की पुनर्स्मृति

‘सत्यजित राय मेमोरियल टॉक’ केवल एक स्मृति आयोजन नहीं, बल्कि सिनेमा की उस विरासत को जीवित रखने का प्रयास है, जो हमें बेहतर देखने, समझने और महसूस करने की क्षमता देती है। NDFF का यह प्रयास सिनेमा को उसकी जड़ों से जोड़ने और नई पीढ़ी तक उसकी संवेदना पहुँचाने की एक महत्वपूर्ण शुरुआत है।

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ज़ोहरा सहगल: एक इंक़लाबी औरत, बग़ावत जिसके मिज़ाज का हिस्सा थी

1990 में ज़ोहरा सहगल भारत लौट आईं और अपनी ज़िंदगी के आख़िर तक यहीं रहीं। उन्होंने कई हिन्दी फ़िल्मों, नाटकों और टीवी सीरियल में अभिनय किया। ‘मुल्ला नसरुद्दीन’ में निभाए उनके किरदार को भला कौन भूल सकता है।

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मटका किंग: उम्मीदों और लालच के मटके में अटके समाज की कहानी

‘मटका किंग’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामाजिक संदर्भ है। यह सीरीज़ उस दौर को दिखाती है— जब स्वतंत्रता के बाद का भारत आर्थिक अस्थिरता से गुजर रहा था मजदूर वर्ग अवसरों की तलाश में था…

Talk Cinema on the Floor
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सिनेमा, ‘साइंटिस्ट’और संवाद: दिल्ली में ‘टॉक सिनेमा- मार्च चैप्टर’

‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर’ सिर्फ़ फ़िल्में दिखाने या उन पर चर्चा करने तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्पेस बनाने के बारे में है जहां सिनेमा लोगों को साथ लाने का ज़रिया बन जाए — और जहां ये मुलाक़ात धीरे-धीरे एक क्रिएटिव कम्युनिटी में बदल जाए। एक ऐसे शहर में जो खुद को एक गंभीर सिनेमा हब के रूप में स्थापित कर रहा है, ऐसे स्पेस की अपनी अहमियत है और जिसकी आज बहुत ज़रूरत भी है।

Balraj Sahni in Garm Hawa
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याद ए बलराज साहनी वाया गर्म हवा

गर्म हवा की कहानी घूमती है सलीम मिर्जा’ (बलराज साहनी), जो कि आगरा में एक जूते के कारखाने के मालिक हैं, उनके इर्द गिर्द। बँटवारा हो चुका है, सलीम मिर्जा रोज़ सुनते रहते हैं कि हिंदुस्तान में अब मुसलमानों के लिए कुछ नहीं बचा। ख़ुद उनके दोस्त-अहबाब मुल्क छोड़ छोड़कर लाहौर कराची जा रहे हैं लेकिन सलीम हैं कि रोज़ घर, आगरा और हिंदुस्तान छोड़कर न जाने का कोई न कोई नया बहाना खोज ही लेते हैं।

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