

72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ फिल्म, सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार और सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री– इन तीन प्रतिष्ठित पुरस्कारों पर कब्ज़ा जमाकर कन्नड़ फिल्म ‘मिथ्या’ ने भारतीय सिनेमा जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है। निर्देशक सुमंत भट की यह संवेदनशील फिल्म माता-पिता के असमय निधन के बाद एक ग्यारह वर्षीय बच्चे के अकेलेपन और संघर्ष को बेहद मार्मिक ढंग से पर्दे पर उतारती है। ‘न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन’ हमेशा से ही ऐसी साहसिक, सार्थक और इंडी फिल्मों (स्वतंत्र सिनेमा) की पैरवी करता रहा है। जानी मानी सिनेविद् और वरिष्ठ लेखिका डॉ विजय शर्मा का ये आलेख इस फिल्म के उस कलात्मक सफर और सिनेमाई ईमानदारी को रेखांकित करता है, जो मुख्यधारा के शोर से दूर सच्चे सिनेमा की असली ताकत को बयां करती है।

बहुभाषीय देश में जब भारतीय सिनेमा की बात होती है, केवल हिन्दी सिनेमा चर्चा में रहता है। बाकी भाषाओं के सिनेमा को क्षेत्रीय सिनेमा की श्रेणी रख दिया जाता है। क्या हिन्दी भी भारत की एक क्षेत्रीय भाषा नहीं है? भले ही यह एक से अधिक प्रदेश में बोली-समझी जाती है। हिन्दी दर्शक कदाचित दूसरी भारतीय भाषाओं की फ़िल्म देखता है। आजकल डबिंग, सबटाइटिल की सुविधा के चलते इस प्रवृति में थोड़ा परिवर्तन आया है। किसी फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार मिलने से उसके दर्शकों की संख्या में इजाफ़ा होता है, मगर बहुत कम।
बहुत सारी अच्छी फ़िल्में कई कारणों से दर्शक तक पहुँच नहीं बना पाती हैं। हाँ, अगर आप किसी फ़िल्म फ़ेस्टिवल से जुड़े हैं, तो कुछ अच्छी फ़िल्में आप देख पाते हैं। कई राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म जूरी में होने की वजह से मुझे कुछ अच्छी फ़िल्में देखने का अवसर मिला है। ऐसा ही अवसर मुझे 2024 की एक फ़िल्म समारोह जूरी में रहते हुए मिला।
सिने-समीक्षक, सिने-संपादक, आर्टिस्टिक डॉरेक्टर विभिन्न ज्यूरी के पूर्व सदस्य क्रिस्टोफ़र डॉल्टन ने ‘द हाउस ऑफ़ इल्यूशन्स’ फ़िल्म स्टूडियो की संस्थापना का प्रमुख उद्देश्य सिने-जगत से जुड़ी प्रतिभाओं को सामने लाना तथा उन्हें अच्छा सिनेमा बनाने केलिए प्रेरित करना है। इसके लिए वे कई संस्ताओं से मिल कर काम करते हैं। एफ़सीसीआई (FCCI), आईएफ़एफ़सिन्सी (इंडियन फ़िल्म फ़ेस्टिवल ऑफ़ सिनसिनाटी, यूएसए) में ‘द हाउस ऑफ़ इल्यूशन्स’ की जूरी सदस्य होते हुए मैंने कई अच्छी फ़िल्में देखीं। 2024 की इस जूरी में मेरे साथ डॉक्यूमेंट्री निर्देशक, बहु-पुरस्कृत प्रो. अंजलि मोन्टेइरो और फ़िल्म समीक्षक एवं फ़िल्म पोडकास्टर अमर्त्य आचार्य अमृत्य आचार्य भी थे।

सर्वोत्तम स्क्रीनप्ले केलिए आई फ़ौज़िया मिर्ज़ा की ‘द क्वीन ऑफ़ माई ड्रीम्स’, सुमंत भट्ट की ‘मिथ्या’, ‘कामिल शेख की ‘दि इन्वेस्टिगेटर’, ‘सुनील सुकथनकर की ‘आउटहाउस’ तथा वेंडी बेडनार्ज़ की ‘येलो बस’ जैसी एक-से-बढ़कर-एक पाँच फ़िल्में जूरी ने देखीं। सर्वोत्तम स्क्रीनप्ले फ़िल्म प्रतियोगिता केलिए आई 5 फ़िल्मों में सर्वोत्तम स्क्रीनप्ले राइटर चुनना जूरी केलिए एक बड़ी चुनौती थी।
सर्वसम्मति से जूरी ने सुमंत भट्ट की फ़िल्म ‘मिथ्या’ की पटकथा (सुमंत भट्ट) को सर्वोत्तम पाया। फ़िल्म की विशेषता बताते हुए कहा गया, ‘यह 11 साल के मिथुन की आत्म-अन्वेषण एवं स्व-वापसी की मार्मिक यात्रा है, जो यात्रा वह अपनी दुनिया के विनष्ट होने के पश्चात चुनौतीपूर्ण मार्ग द्वारा करता है।’ विजय शर्मा ने फ़िल्म की पटकथा को सर्वोत्तम (4.8/5) चुनते हुए अनुशंसा में लिखा, ‘स्क्रीनप्ले लेखक सुमंत भट्ट बाल मनोविज्ञान भली-भाँति जानते हैं। एक बच्चा हादसे एवं तनाव में है। उसके पिता गुजर गए हैं, उसकी माँ ने आत्महत्या की है। बच्चे का शॉक, ट्रॉमा, प्रश्न, प्रतिक्रिया, गुस्सा, दु:ख-दर्द, उनका विभ्रम, मूक खोज, विद्रोह सब बहुत अच्छी तरह दिखाया गया है। लेखक कहीं भी निर्णय नहीं देता है। हालाँकि बच्चा अभी केवल ग्यारह साल का है, मगर उसका ‘कमिंग ऑफ़ एज’ अच्छी तरह चित्रित हुआ है।’
अगर आप नेट पर इस फ़िल्म से जुड़ी सूचना पाना चाहेंगे, तो वहाँ आपको बहुत कम जानकारी हासिल होगी। 97 मिनट की कन्नड फ़िल्म ‘मिथ्या’ को इस समारोह में उत्कृष्ट फ़िल्म, सर्वोत्तम निर्देशक (सुमंत भट्ट), सर्वोत्तम अभिनेता (आतिश शेट्टी) का खिताब भी मिला। और अब खुशी की बात है कि इसे 72वें राष्ट्रीय फ़िल्म में भी तीन पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। नेशनल फ़िल्म के रूप में रक्षित शेट्टी द्वारा प्रड्यूस, सुमंत भट्ट द्वारा निर्देशित ‘मिथ्या’ को 2024 की सर्वोत्तम कन्नड फ़िल्म का खिताब दिया गया है। साथ ही इसने सर्वोत्तम बाल कलाकार (आतिश एस. शेट्टी) एवं सर्वोत्तम सहायक अभिनेत्री (रूपा वर्काडी) का सम्मान भी पाया है।

सुमंत भट्ट ने ‘मिथ्या’ फ़िल्म (प्रथम निर्देशन) के अलावा ‘शंकराभरण’ एवं ‘एकम’ का भी निर्देशन किया है। ‘शंकराभरण’ की पटकथा सुमंत भट्ट ने शिने शेट्टी एवं त्रिलोक त्रिविक्रम के साथ मिल कर लिखी है। ‘एकम’ टीवी सीरियल है, इसके 6 एपिसोड का स्क्रीनप्ले सुमंत ने लिखा है, 3 एपीसोड के संवाद भी उनके हैं।
‘मिथ्या’ फ़िल्म पुरस्कृत होने पर उसके प्रड्यूसर रक्षित शेट्टी ने अपने X पर लिखा, ‘सपने खूबसूरत हैं। लेकिन जिसमें आप विश्वास करते हैं, ऐसी कहानी का लोगों के हृदय में स्थान पाना, और अब भारतीय सिने-इतिहास में होना बहुत भिन्न है। ईमानदारी से कही गई कहानियाँ कभी अनदेखी नहीं रहती हैं।’
2023 के एमएएमए (MAMI) मुंबई फ़िल्म फ़ेस्टिवल में Mumbai Film Festival में इसका प्रीमियर हुआ था। सपोर्टिंग एक्टर श्रेणी में रूपा वर्काडी की राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पर निर्देशक सुमंत भट्ट का कहना है, ‘जब उन्होंने सहायक अभिनेता श्रेणी की घोषणा की, मैं खुशी से उछल पड़ा। रूपा मैम बेहतरीन थीं। सपोर्टिंग अभिनेता किसी भी फ़िल्म की रीढ़ होते हैं।’
‘मिथ्या’ फ़िल्म में मिथ्या (मिथुन) के अकेलेपन को बाल कलाकार आतिश शेट्टी ने साकार कर दिया है। सिनेमाटोग्राफ़र उदित खुराना ने वाइड फ़्रेम्स द्वारा मिथ्या अनूभूत उजाड़ भावनाओं को परदे पर ला दिया है। खासकर जब वह विशाल समुद्र तट पर है। मिथ्या के कई क्लोजअप्स शॉट उसकी भावनाओं को पकड़ने में सक्षम रहे हैं। बच्चा अपने नए वातावरण में समायोजन का प्रयास कर रहा है। कहाँ मुंबई और कहाँ कर्नाटक का उडुपि जैसा हलचलहीन कस्बा। भाषा का अवरोध। मराठी दोस्तों का साथ छूटे बच्चे केलिए कन्नड माध्यम के स्कूल में समायोजन सरल नहीं है। दूसरी ओर वह वयस्कों से अपने माता-पिता के विषय में तमाम तरह की बातें सुनता है। वयस्क बात करते समय परिवेश में उपस्थित बच्चे को अनदेखा करते हैं। बच्चा सब सुनता रहता है, पूरी तरह समझता भले न हो। मिथ्या का दिमाग विरोधी भावनाओं से भरा हुआ है, दुनिया से उसे अरूचि है। वयस्क अक्सर मानते हैं कि बचपन बड़ा रोमांटिक होता है। उडुपि में उसे अपने अंकल, ऑन्ट (रूपा वर्काडी) तथा अपने कजिंस के साथ रहना है। उसका अपनी छोटी बहन वंदना से संबंध भी प्रेम, ईर्ष्या, द्वैष मिश्रित है।
स्क्रीनप्ले में बच्चे की भावनाओं, उसके भीतर के उमड़ते तूफ़ान को खूबसूरती से विकसित किया गया है। ध्वनि के साथ फ़िल्म में सन्नाटे (साइलेंस) का अपना महत्व होता है। इस फ़िल्म में कई जगह सन्नाटे का प्रयोग किया गया है, इससे फ़िल्म को एक ऊँचाई मिलती है। भावनाओं को दर्शक तक पहुँचाने में स्क्रीनप्ले, अभिनय एवं कैमरे के साथ-साथ पार्श्व संगीत का महत्वपूर्ण योगदान है। ‘मिथ्या’ फ़िल्म का संगीत मिथुन मुकुंदन का है।
बच्चों पर अच्छी फ़िल्में बहुत कम बनती हैं। ‘मिथ्या’ उनमें से एक है।
