
“हर दर्शक एक ही दृश्य को अलग तरह से देखता है।”
प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर कौस्तुभ मुखर्जी की यह बात Talk Cinema On The Floor (TCOTF) के जुलाई चैप्टर की सबसे बड़ी सीख बनकर उभरी। वहीं वरिष्ठ सिनेविद् संदीप पाहवा ने सिंगल स्क्रीन थिएटरों से लेकर OTT के दौर तक भारतीय दर्शकों की बदलती संस्कृति की ऐसी तस्वीर खींची, जिसने सिनेमा को सिर्फ फिल्मों की नहीं, बल्कि समाज की कहानी बना दिया। चार पीढ़ियों की मौजूदगी, दो अलग-अलग लेकिन एक-दूसरे को पूरक सत्र और खुला संवाद—इसी ने जुलाई चैप्टर को TCOTF के अब तक के सबसे यादगार आयोजनों में शामिल कर दिया।
“हर दर्शक अपनी फिल्म देखता है…”
अगर किसी कमरे में बैठे सौ लोग एक ही फिल्म देखें, तो क्या वे सभी बिल्कुल एक जैसी फिल्म देखकर निकलेंगे?
“बिल्कुल नहीं।”
कौस्तुभ मुखर्जी ने अपने सत्र की शुरुआत इसी विचार से की। उनका कहना था कि फिल्म पर्दे पर एक ही चलती है, लेकिन हर दर्शक उसे अपनी संवेदनाओं, अपने अनुभवों और अपनी ज़िंदगी के हिसाब से देखता और समझता है। यही सिनेमा की सबसे बड़ी खूबसूरती है।
शायद यही वजह थी कि Talk Cinema On The Floor (TCOTF) का जुलाई चैप्टर केवल फिल्मों पर चर्चा का कार्यक्रम नहीं रहा। यह उस सवाल की तलाश बन गया कि सिनेमा हमें कैसे प्रभावित करता है, हम उसे कैसे पढ़ते हैं और समय के साथ हमारी देखने की आदतें कैसे बदलती जाती हैं।
संवाद से बनती है सिनेमा की संस्कृति
1 अगस्त 2026 को न्यू दिल्ली फिल्म फाउंडेशन (NDFF) द्वारा आयोजित TCOTF का जुलाई चैप्टर इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स (IICS), लाजपत नगर में सम्पन्न हुआ। श्री अरबिंदो सेंटर फॉर आर्ट्स एंड क्रिएटिविटी (SACAC) तथा मीडिया एंड एंटरटेनमेंट स्किल काउंसिल (MESC) के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में फिल्मकारों, अभिनेताओं, लेखकों, सिनेमैटोग्राफरों, मीडिया प्रोफेशनल्स, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और सिनेमा प्रेमियों ने भाग लिया।
TCOTF की सबसे बड़ी खूबी यही है कि यहाँ मंच और दर्शकों के बीच कोई दीवार नहीं होती। यहाँ सवाल पूछना उतना ही महत्वपूर्ण है जितना जवाब देना। यही वजह है कि हर चैप्टर में अलग-अलग पेशों और अलग-अलग उम्र के लोग एक साथ बैठकर सिनेमा पर बात करते हैं।

9. Vividha Tuteja 10. Jyoti Gupta 11. Shailendra Pandey 12. Ved Kumar Sharma
NDFF का विज़न: फिल्में नहीं, फिल्म संस्कृति

कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए न्यू दिल्ली फिल्म फाउंडेशन के संस्थापक एवं महासचिव आशीष के. सिंह ने कहा कि NDFF की कोशिश सिर्फ फिल्में दिखाने या फिल्में बनाने तक सीमित नहीं है। संस्था ऐसा वातावरण तैयार करना चाहती है, जहाँ लोग सिनेमा देखें, उस पर बात करें, उससे सीखें और मिलकर नया सिनेमा बनाने की दिशा में आगे बढ़ें।
उन्होंने कहा कि अच्छी फिल्में केवल कैमरे से नहीं बनतीं। उनके पीछे समाज को समझने की दृष्टि, संवेदनशीलता और लगातार सीखते रहने का स्वभाव होता है।
उन्होंने हाल ही में PRITHVI – The Palaeoscience Film Festival of India में NDFF की Film Partner के रूप में भागीदारी और राष्ट्रीय पैनल चर्चा में सहभागिता का उल्लेख करते हुए कहा कि संस्था अब ऐसे मंचों से भी जुड़ रही है जहाँ सिनेमा, विज्ञान, पर्यावरण और समाज के बीच नए संवाद स्थापित किए जा सकें।
उन्होंने यह भी बताया कि NDFF का Make Cinema Campaign अब अगले चरण में प्रवेश कर चुका है और इसके अंतर्गत बनने वाली पहली लघु फिल्म जल्द ही निर्माण प्रक्रिया में जाएगी।
बातचीत से हुई शुरुआत

TCOTF की परंपरा के अनुसार कार्यक्रम की शुरुआत Warm-up Session से हुई। यह केवल परिचय का दौर नहीं था। यहाँ हर प्रतिभागी ने अपना परिचय देने के साथ यह भी साझा किया कि आज के दौर के सिनेमा को वह किस नज़र से देखता है।
यही वह पल था जहाँ यह साफ़ हो गया कि इस आयोजन में कोई केवल “दर्शक” बनकर नहीं आया था। हर व्यक्ति अपने साथ एक अनुभव, एक नज़रिया और एक सवाल लेकर आया था।
कैमरा क्या देखता है… और दर्शक क्या महसूस करता है?
कार्यक्रम का पहला मुख्य सत्र Craft & Crew था, जिसमें प्रख्यात सिनेमैटोग्राफर कौस्तुभ मुखर्जी ने Visual Storytelling & Visual Communication पर बेहद रोचक मास्टरक्लास दी।
उन्होंने कहा कि फिल्म बनाना केवल खूबसूरत तस्वीरें लेना नहीं है। असली चुनौती यह है कि कैमरा वही महसूस कराए, जो निर्देशक दर्शकों तक पहुँचाना चाहता है।
उन्होंने Children of Men, Mission: Impossible 2 और अपनी मराठी फिल्म ‘तोड़ा’ के कुछ दृश्य दिखाते हुए बताया कि एक ही भावना—Fear (डर)—को अलग-अलग फिल्मों में कितने अलग तरीके से व्यक्त किया जा सकता है।
उनका कहना था कि किसी दृश्य का असर केवल कैमरे की तकनीक से तय नहीं होता। देश, काल, पात्र, दृश्य का संदर्भ और दर्शक का अपना अनुभव—ये सभी मिलकर उस दृश्य का अर्थ बनाते हैं।
उन्होंने Sensuality के उदाहरण से भी समझाया कि एक ही तरह के दृश्य को अलग-अलग संदर्भों में दर्शक बिल्कुल अलग तरह से ग्रहण करते हैं।
Observation… एक फिल्मकार का सबसे बड़ा हथियार

कौस्तुभ मुखर्जी ने युवाओं से कहा कि एक अच्छा फिल्मकार बनने की शुरुआत कैमरा खरीदने से नहीं, बल्कि Observation से होती है।
आप अपने आसपास की दुनिया को कितना ध्यान से देखते हैं, लोग कैसे चलते हैं, कैसे चुप रहते हैं, कैसे डरते हैं, कैसे खुश होते हैं—यही सब आगे चलकर आपके फ्रेम में दिखाई देता है।
उन्होंने स्क्रीनप्ले लिखते समय Visual Writing की अहमियत पर भी विस्तार से चर्चा की। उनका कहना था कि कई बार एक ही दृश्य को पाँच अलग-अलग तरीकों से फिल्माया जा सकता है और हर तरीका दर्शकों पर अलग प्रभाव डालता है।
प्रतिभागियों ने भी उनसे स्वतंत्र फिल्म निर्माण, पटकथा, फिल्म समारोहों, भारतीय सिनेमा की बदलती दिशा और युवा फिल्मकारों के लिए उपलब्ध अवसरों पर अनेक प्रश्न पूछे, जिनका उन्होंने विस्तार से उत्तर दिया।
जब सिंगल स्क्रीन सिर्फ थिएटर नहीं, एक उत्सव हुआ करता था
कार्यक्रम का दूसरा मुख्य सत्र Spotlight Session था, जिसके अतिथि थे वरिष्ठ सिनेप्रेमी और सिनेविद् संदीप पाहवा।
उनकी बातचीत सिर्फ यादों की यात्रा नहीं थी। उन्होंने यह समझाने की कोशिश की कि पिछले छह दशकों में दर्शक बदले हैं, सिनेमा बदल गया है और सिनेमा देखने का अनुभव भी बदल गया है।
उन्होंने दिल्ली की सिनेमा संस्कृति, सिंगल स्क्रीन थिएटरों, पहले दिन–पहले शो, हाउसफुल बोर्ड, ब्लैक में टिकट और उस दौर के सामूहिक फिल्म अनुभव को याद करते हुए कई दिलचस्प किस्से साझा किए।

एक कहानी, जिसने भारतीय सिनेमा का इतिहास बदल दिया
संदीप पाहवा ने अपने परिवार से जुड़ा वह प्रसंग भी साझा किया, जिसे सुनना अपने आप में भारतीय सिनेमा के इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय जानने जैसा था। उन्होंने बताया कि उनके पिता बसंत पाहवा ने जब बतौर निर्माता अपनी पहली फिल्म ‘बहू’ बनाई, तो इसके निर्देशन के लिए अपने पड़ोसी और दोस्त शक्ति सामंत को बतौर निर्देशक पहला अवसर दिया। आगे चलकर शक्ति सामंत भारतीय सिनेमा के सबसे सफल निर्देशकों में गिने गए। इस फिल्म के नायक भी उनके पिता बसंत पाहवा थे।
पाहवा साहब ने गाइड, आनंद और शोले जैसी कालजयी फिल्मों की रिलीज़ से जुड़े कई संस्मरण भी सुनाए। एक दिलचस्प प्रसंग में उन्होंने बताया कि शोले देखने के लिए वे फरीदाबाद से करनाल पहुँचे थे, क्योंकि वहाँ फिल्म पहले रिलीज़ हुई थी। दिल्ली के प्रसिद्ध रीगल टॉकीज़ और चाणक्य से भी जुड़े कई दिलचस्प संस्मरण उन्होंने सुनाए।
क्या सचमुच बदल गया है दर्शक?
संदीप पाहवा का मानना था कि पहले सिनेमा लगभग हर वर्ग के लोगों का साझा सांस्कृतिक अनुभव हुआ करता था। आज दर्शकों का वर्गीकरण पहले की तुलना में कहीं अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। कंटेंट की पसंद से लेकर टिकट की कीमत तक—सब कुछ बदल चुका है। लेकिन उनके अनुसार एक चीज़ आज भी नहीं बदली है—अच्छी कहानी सुनने की इंसान की इच्छा।
उन्होंने बताया कि उन्हें निजी तौर पर सिनेमा हॉल में फिल्म देखने का अनुभव पसंद है, जिसके लिए आज भी वो दूर-दूर तक सफर करने को तैयार रहते हैं।
चार पीढ़ियाँ… एक ही बातचीत में

9. Vaibhav Maitreya 10. Tanvi Tripathi 11. Jenisha 12. Krish Gupta
इस जुलाई चैप्टर की सबसे अनोखी बात यह रही कि यहाँ लगभग 12 वर्ष से 80 वर्ष तक की चार पीढ़ियाँ एक साथ मौजूद थीं।
वरिष्ठ उद्योगपति अनूप गुप्ता ने मुग़ल-ए-आज़़म के शीश महल सेट को देखने की अपनी बचपन की याद साझा की।
भारतीय फिल्म विरासत को संरक्षित करने वाली संस्था Cinemazi की संस्थापक आशा बत्रा ने संदीप पाहवा से कई दिलचस्प सवाल पूछे।
वहीं पुणे से आई फिल्म स्कॉलर विभा झा ने विशेष रूप से Gen Z प्रतिभागियों के साथ बातचीत की। उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि नई पीढ़ी आज सिनेमा को किस नज़र से देखती है और डिजिटल दौर ने उसके देखने की आदतों को किस तरह बदला है। उन्होने जेन ज़ी के साथ संवाद और उसकी भागीदारी सुनिश्चित करने की ज़रुरत पर भी बल दिया।
दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंडर ग्रेजुएट छात्र पुनीत शर्मा ने सिनेमा और समाज को लेकर रचनात्मक समन्वय पर आधारित अपनी सोच साझा की। इस आयोजन में दिलचस्प मौजूदगी रही प्रख्यात अभिनेता बलराज साहनी की भतीजी डॉ वीना सेठी जो देशबंधु कॉलेज (डीयू) में अंग्रेजी की प्रोफेसर रही हैं और फिलहाल एक एनजीओ के ज़रिए उत्तराखंड में हाशिए पर रह रहे लोगों के लिए काम कर रही हैं। डॉ वीना सेठी ने 1985 में दूरदर्शन के लिए पहले सीरियल बसंती का निर्माण और निर्देशन किया था। इसके अलावा दिल्ली की प्रसिद्ध रंगकर्मी सरिता वोहरा भी जुलाई चैप्टर में मौजूद थीं। सरिता वोहरा जाने माने क्रिएटिव डायरेक्टर सुरेश मलिक (मिले सुर मेरा तुम्हारा) की बहन हैं और उन्होने मिले सुर मेरा-तुम्हारा में 3 भाषाओं में गायन भी किया है।
यही वह क्षण था जहाँ TCOTF एक कार्यक्रम से आगे बढ़कर चार पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद का मंच बन गया।
यही है TCOTF की पहचान
इस सत्र में जो एक और खास बात रही, वो थी शोले फिल्म का ट्रेलर जिसे सबने सिनेमाहॉल की तरह अंधेरे कमरे में एक साथ देखा और सिनेमा के उस कलेक्टिव एक्सपीरियंस का मज़ा लिया जो गुज़रे ज़माने में इसकी सबसे बड़ी खूबी रही है। शोले का ज़िक्र तब आया जब फिल्म स्कॉलर जेनिशा ने ज़िक्र किया कि अगस्त के महीने में ही (5 अगस्त, 1960) भारतीय सिनेमा की कालजयी फिल्म मुग़ले आज़म रिलीज़ हुई थी… तभी ये भी बात सामने आई कि इसी महीने (15 अगस्त, 1975) एक और कालजयी फिल्म शोले रिलीज़ हुई थी। A clip posted on X by Film Scholar Vibha Jha
सत्र खत्म होते होते यह साफ़ था कि इस आयोजन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल दो अच्छे सेगमेंट भर नहीं थे। हमेशा की तरह जुलाई चैप्टर की भी सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि अलग-अलग उम्र, अलग-अलग पेशों और अलग-अलग अनुभवों वाले लोग देर तक सिनेमा पर गंभीर लेकिन सहज बातचीत करते रहे। यही Talk Cinema On The Floor की पहचान है।
यहाँ सिनेमा पर बात होती है, लेकिन सिर्फ फिल्मों की नहीं। यहाँ बात होती है समाज की, संस्कृति की, तकनीक की, दर्शकों की, कहानियों की और उन लोगों की, जो मानते हैं कि अच्छा सिनेमा केवल बनाया नहीं जाता… उसे समझा भी जाता है।
इसी विश्वास के साथ New Delhi Film Foundation आगे भी ऐसे मंच तैयार करता रहेगा, जहाँ लोग NDFF के इस स्लोगन को सार्थक कर सकें- Watch Cinema, Talk Cinema, Learn Cinema and Make Cinema—Together.

संवाद जो चाय के साथ भी जारी रहा
और जैसा कि कहते हैं कि A film ends on the screen… cinema begins in conversation. क्योंकि इसी बातचीत में अलग-अलग नज़रिए से देखे गए सिनेमा की समझ एक साझा मंच पर आती है और हर समझ को एक नई गहराई देती है। और ये बातचीत एक सोच वाले लोगों के बीच बॉन्डिंग भी मज़बूत करती है…क्योंकि अक्सर एक अच्छी conversation ही एक अच्छी collaboration की शुरुआत होती है। TCOTF की foundation है और हर सत्र में होने वाले Networking Tea का भी यही मकसद है।
प्रतिभागियों, अतिथियों, विद्यार्थियों और रचनात्मक पेशेवरों के बीच अनौपचारिक संवाद जारी रहा। कई नए परिचय बने, संभावित सहयोगों पर चर्चा हुई और दिल्ली NCR में cinema lovers, filmmakers, students, photographers, writers और creators की growing community एक कदम और आगे बढ़ी।

एक वर्ष की यात्रा, नए दशक की शुरुआत
आज टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर दिल्ली में गंभीर फिल्म संस्कृति, रचनात्मक संवाद और कम्युनिटी बिल्डिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण मासिक पहल के तौर पर अपनी खास पहचान बना चुका है। जुलाई चैप्टर के साथ ही TCOTF का ये 12वां मासिक आयोजन था, जबकि न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन ने भी जून महीने से अपनी स्थापना के 10वें वर्ष में प्रवेश किया है। यह केवल समय का पड़ाव नहीं, बल्कि उस विश्वास की पुष्टि है कि यदि सिनेमा पर गंभीर संवाद के लिए निरंतर और खुला मंच उपलब्ध कराया जाए, तो एक मज़बूत क्रिएटिव कम्युनिटी तैयार की जा सकती है।
NDFF आने वाले समय में Cinema of India, Make Cinema, विषय-आधारित Workshops, फिल्म स्क्रीनिंग, रचनात्मक संवाद और संस्थागत साझेदारियों के माध्यम से दिल्ली और उत्तर भारत में फिल्म संस्कृति को और सुदृढ़ बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। NDFF का मानना है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज, संस्कृति, शिक्षा और क्रिएटिव इकोनॉमी को जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण शक्ति है।
जिनके मज़बूत साथ से होता है ये अहम आयोजन
इस आयोजन की सफलता में SACAC और इसकी फाउंडर दलजीत वाधवा, Indian Institute of Creative Skills (IICS) तथा Media & Entertainment Skills Council (MESC) का महत्वपूर्ण सहयोग रहा। इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ क्रिएटिव स्किल्स की ओर से COO पूजा अरोड़ा की Talk Cinema On The Floor के विज़न को आगे बढ़ाने में खास भूमिका रही, जबकि इवेंट के आयोजन में IICS की ओर से रोशनी सहगल ने प्रतिनिधित्व किया, पृशिता तिवारी और पुष्पा वर्मा ने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली। कार्यक्रम का संचालन आशीष के सिंह ने किया, जबकि आयोजन की प्रमुख जिम्मेदारी NDFF की ओर से वैभव मैत्रेय और हरिंदर कुमार ने संभाली। टेक एवं प्रोडक्शन की जिम्मेदारी कृष गुप्ता ने संभाली। इवेंट कवरेज में शुभनव जैन की अहम भूमिका रही।
NDFF ने बताया कि आने वाले महीनों में सिनेमा ऑफ इंडिया, मेक सिनेमा अभियान, विषय आधारित वर्कशॉप्स, फिल्म स्क्रीनिंग्स, क्रिएटिव नेटवर्किंग कार्यक्रमों और विभिन्न संस्थानों, उद्योग जगत के साथ सहयोग के माध्यम से राजधानी में फिल्म संस्कृति को मजबूत करने और ऑरेंज इकॉनमी को गति देने की दिशा में नई पहल की जाएंगी।

न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन की अन्य प्रमुख पहल
यदि आप सिनेमा को केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने, संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति का माध्यम मानते हैं, तो NDFF की इन पहलों के बारे में भी जानिए—
- Talk Cinema On The Floor (TCOTF) – सिनेमा पर मासिक रचनात्मक संवाद और नेटवर्किंग मंच।
- Watch Cinema – चयनित फिल्मों का प्रदर्शन और सार्थक चर्चा।
- Cinema of India – भारतीय भाषाओं और क्षेत्रों के विविध सिनेमाई परिदृश्य का उत्सव।
- Make Cinema – उभरते फिल्मकारों को सार्थक लघु फिल्म निर्माण के लिए प्रेरित करने वाला अभियान।
- वर्कशॉप एवं मास्टरक्लास – फिल्म निर्माण, पटकथा, अभिनय, सिनेमैटोग्राफी और अन्य विषयों पर नियमित प्रशिक्षण एवं संवाद।
सिनेमा से जुड़िए। संवाद से जुड़िए। समुदाय से जुड़िए।
New Delhi Film Foundation के बारे में (NDFF) एक गैरलाभकारी फिल्म सोसायटी है, जो दिल्ली और उत्तर भारत में सिनेमा, रचनात्मक शिक्षा और फिल्म संस्कृति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कार्य कर रही है। संस्था नियमित फिल्म प्रदर्शन, संवाद, कार्यशालाएँ, फिल्म महोत्सव, Talk Cinema On The Floor (TCOTF) जैसे मासिक संवाद मंच, Make Cinema जैसे अभियान तथा विभिन्न शैक्षणिक, सांस्कृतिक और उद्योग संस्थानों के साथ साझेदारी के माध्यम से एक सशक्त फिल्ममेकिंग इकोसिस्टम विकसित करने की दिशा में कार्यरत है NDFF का उद्देश्य सार्थक सिनेमा, नई प्रतिभाओं, रचनात्मक सहयोग और उभरती ऑरेंज इकॉनमी को प्रोत्साहित करना है। NDFF का विश्वास है कि सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि शिक्षा, संवाद, संवेदनशीलता और सामाजिक परिवर्तन का एक प्रभावशाली माध्यम है।NDFF के वॉट्स ऐप ग्रुप से इस लिंक- https://chat.whatsapp.com/JWMFcNWvocGCpKuwi078uL के ज़रिए जुड़ सकते हैं। contact: 999957865
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