

मृणाल सेन वो फिल्मकार थे जिन्होंने सिनेमा को सवाल बनाने का औज़ार बना दिया। पर्दे पर इतिहास, भूख और सियासत को ऐसे टटोला कि हर फ्रेम दर्शक से जवाब मांगता रहा। वो कैमरे से समझौता नहीं करते थे, न सत्ता से। 103वीं जयंती पर उनके सिनेमा के साथ-साथ उनकी जीवन यात्रा पर बेहद दिलचस्प जानकारियों और विश्लेषण के साथ प्रस्तुत है लेखक ज़ाहिद खान का लेख। बीसवीं सदी में भारतीय साहित्य में चले प्रगतिशील आन्दोलन पर लेखक ज़ाहिद ख़ान का विस्तृत कार्य है। उनकी कुछ अहम किताबें हैं—‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक के हमसफ़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक की रहगुज़र’, ‘तरक़्क़ीपसंद तहरीक का कारवॉं’, ‘तहरीक—ए—आज़ादी और तरक़्क़ीपसंद शायर’, ‘आधी आबादी अधूरा सफ़र’। ‘शैलेन्द्र हर ज़ोर—ज़ुल्म की टक्कर में’, ‘बलराज साहनी एक समर्पित और सृजनात्मक जीवन’ और ‘ऋत्विक घटक नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सर्जक’ ज़ाहिद ख़ान द्वारा सम्पादित किताबें हैं, तो वहीं ‘मख़दूम मोहिउद्दीन सुर्ख़ सवेरे का शायर’, ‘मजाज़ हूँ मैं सरफ़रोश हूँ मैं’ और ‘मंटो साब दोस्तों की नज़र में’ का उन्होंने अनुवाद और सम्पादन किया है। ज़ाहिद ख़ान ने कृश्न चन्दर के ऐतिहासिक रिपोर्ताज ‘पौदे’, हमीद अख़्तर की किताब ‘रूदाद—ए—अंजुमन’, अली सरदार जाफ़री का ड्रामा ‘यह किसका ख़ून है !’, कृश्न चन्दर का ड्रामा ‘दरवाज़े खोल दो’,अली सरदार जाफ़री का कहानी संग्रह ‘मंज़िल’ और उर्दू के अहम अफ़साना—निगारों पर केन्द्रित किताब ‘कुछ उनकी यादें कुछ उनसे बातें’ का उर्दू से हिन्दी लिप्यंतरण और अनुवाद भी किया है।
सिनेमा में अपने समय का यथार्थ ढूंढने वाला फिल्मकार
भारतीय सिनेमा में मृणाल सेन एक ऐसे निर्देशक हुए हैं, जिन्होंने अपनी प्रयोगशील और समाजी-सियासी तौर पर प्रतिबद्ध फ़िल्मों से समाज को एक दिशा प्रदान की। नई पीढ़ी को शिक्षित किया। विश्व सिनेमा में जिन निर्देशकों की वजह से भारतीय सिनेमा जाना-पहचाना जाता है, उसमें मृणाल सेन का अहम नाम है। उनका शुमार बांग्ला के तीन सबसे अज़ीम फ़िल्मकारों में भी होता है। मृणाल सेन के समकालीन निर्देशक सत्यजित राय और ऋत्विक घटक की तरह उनकी फ़िल्में भी सामाजिक यथार्थ की कलात्मक अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। वे प्रतिबद्ध मार्क्सवादी थे और यह विचारधारा उनकी फ़िल्मों में भी दिखाई देती है। ग़रीबी, बेरोजगारी, शोषण, विषमता, सत्ता का शोषणकारी अमानवीय चेहरा, वर्ग संघर्ष और पूंजी का केन्द्रीयकरण हमेशा उनकी चिंताओं के केन्द्र में रहे। अपनी फ़िल्मों के बारे में ख़ुद उनका कहना था, ‘‘ग़रीबी, सूखा, अकाल और सामाजिक अन्याय मेरे समय का यथार्थ है, एक फ़िल्म निर्देशक की हैसियत से मेरी फ़िल्में इन्हें समझने और उनके कारण जानने का माध्यम हैं।’’ मृणाल सेन देश में ‘न्यू वेव सिनेमा’ आंदोलन या समानांतर सिनेमा के भी जनक माने जाते हैं। उनकी फ़िल्मों में सामाजिक यथार्थ तो है ही, ग़ौर से अगर इन्हें देखें, तो यह प्रतिबद्ध राजनीतिक फ़िल्में भी हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर यह फ़िल्में दर्शकों को एक सियासी पैग़ाम भी देती हैं। उनकी इन फ़िल्मों का आग़ाज़ कोलकाता-त्रयी की फ़िल्मों ‘इंटरव्यू’, ‘कलकत्ता 71’ और ‘पदातिक’ से होता है। जिस तरह सत्यजित राय ‘पथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’ और ‘अपूर्व संसार’ एवं कोलकाता पर बनाई अपनी त्रयी के लिए जाने जाते हैं, उसी तरह मृणाल सेन भी अपनी इस चर्चित त्रयी से याद किये जाते हैं।

प्रगतिशील आंदोलन और इप्टा से गहरा जुड़ाव
अविभाजित भारत के फरीदपुर जो कि अब बांग्लादेश में है, 14 मई 1923 को जन्मे मृणाल सेन जब इंटरमीडिएट में ही थे, तब उन्होंने हेमिंग्वे, ऑडेन और स्टीफेन स्पेंडर जैसे राइटरों को पढ़ लिया था। उनकी आला तालीम कोलकाता के स्कॉटिश चर्च कॉलेज मेंं हुई। अपनी पढ़ाई के दौरान ही वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और प्रगतिशील आंदोलन से जुड़ गये थे। उस वक़्त वे ‘स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ़ इंडिया’ में सरगर्म थे। यह वह दौर था, जब कम्युनिस्ट पार्टी पर पाबंदी थी। पार्टी से जुड़ाव की वजह से वे जेल भी गये। मृणाल सेन एक बार फ़रीदपुर से कोलकाता पहुंचे, तो यहीं के होकर रह गये। पढ़ाई मुकम्मल करने के बाद, उनका तअल्लुक़ कम्युनिस्ट लीडर हीरेन्द्रनाथ मुखर्जी, नीरेन रॉय और गोपाल हलदार से हुआ। इन वामपंथी बुद्धिजीवियों की संगत का ही असर था कि वे भी इंक़लाबी हो गये। ‘भारतीय जन नाट्य संघ’ यानी इप्टा से उनका जुड़ाव शुरू से ही था। ऋत्विक घटक, विजन भट्टाचार्य के साथ इप्टा के कार्यक्रमों में वे हिस्सा लेते थे। यही नहीं इप्टा के पूर्व राष्ट्रीय महासचिव निरंजन सेन से भी उनका याराना था। साल 1949 में जब निरंजन सेन पुलिस से बचने के लिए अंडरग्राउंड रहे, तो मृणाल सेन ने उनकी हर मुमकिन मदद की। अपने एक इंटरव्यू में मृणाल सेन ने स्वीकार किया है कि ‘‘वे इप्टा के सौंदर्यशास्त्र से, उनके नाटक और उनकी नृत्य शैली से गहरे प्रभावित थे। इप्टा से जुड़ने से पहले वे यह कल्पना भी नहीं कर सकते थे कि ‘गांधी जिन्ना फिर मिले’ जैसे विषय पर भी आधे घंटे का नृत्य नाटक रचा जा सकता है।’’
अकाल और आज़ादी के संघर्ष के बीच भोगा यथार्थ
मृणाल सेन की नौजवानी का दौर उथल-पुथल का दौर था। एक तरफ़ आज़ादी का संघर्ष चरम पर था, तो दूसरी ओर दूसरे विश्व युद्ध और बंगाल में फैले भयानक अकाल ने कोलकाता को बुरी तरह से प्रभावित किया था। उन्होंने यह सब ख़तरनाक दौर न सिर्फ़ अपनी आंखों से देखा-भोगा था, बल्कि जनता के बीच काम भी किया। हालांकि उस वक़्त ख़ुद उनकी माली हालत अच्छी नहीं थी। आलम यह था कि उन्होंने भी कई महीने सत्तू खाकर दिन गुज़ारे। यही वजह है कि जब मृणाल सेन ने ‘बाइशे श्रावण’ और ‘अकालेर संधाने’ बनाई, तो इन फ़िल्मों में उस यथार्थ को दिखाया, जो उन्होंने ख़ुद भुगता था। यही वह दौर था, जब उनके पास कोई काम नहीं था। खाली वक़्त का इस्तेमाल वे अध्ययन में करते। इन चार-पांच सालों के दौरान मृणाल सेन ने साहित्य से लेकर दर्शन, इतिहास और समाजशास्त्र की सैकड़ों किताबें पढ़ डालीं। कार्ल मार्क्स, ब्रेख़्त, मिल्टन और यूरोपियन साहित्य भी उनसे अछूता नहीं रहा। बांग्ला के सभी बड़े साहित्यकारों रबीन्द्रनाथ टैगोर, ताराशंकर, माणिक और विभूतिभूषण को उन्होंने पढ़ा। इसी दौर में मृणाल सेन ने चेक लेखक कारेल चेपक के उपन्यास ‘दी चीट’ का बांग्ला अनुवाद किया। आजीविका के लिए वे स्कूली छात्रों को अंग्रेज़ी पढ़ाते और समाचार-पत्रों में सिनेमा पर टिप्पणी लिखते। यह टिप्पणियां सपाट नहीं, बल्कि बेहद गंभीर होती थीं। उसी दरमियान ‘इंडो-सोवियत सोसायटी’ की मैगज़ीन में उनका लेख ‘सिनेमा एंड दी पीपल’ प्रकाशित हुआ, जो कि काफ़ी पसंद किया गया। बड़े फ़िल्म निर्देशक बनने के बाद भी, लिखने का उनका ये सिलसिला नहीं टूटा। किताब ‘व्यूज ऑन सिनेमा’, मृणाल सेन की उन्हीं टिप्पणियों या लेखों का संकलन है।
सत्यजित राय की फिल्म सोसाइटी और निर्देशक बनने का सपना

साल 1947 में जब सत्यजित राय ने अपने साथियों के साथ कोलकाता में देश की पहली फ़िल्म सोसायटी बनाई, तो मृणाल सेन भी इस सोसायटी के प्रोग्राम में शिरकत करने लगे। अलबत्ता इस सोसायटी के वे मेंबर नहीं थे। वजह, उनके पास उस वक़्त इस सोसायटी की सालाना मेंबरशिप के लिए पर्याप्त पैसे ही नहीं थे। फ़िल्मों के जानिब मृणाल सेन का झुकाव था, लेकिन वे ख़ुद कभी निर्देशक बनेंगे, यह सब उनके दिल-ओ-दिमाग़ में न था। ज़्यादा से ज़्यादा लेखक या समीक्षक बनने का ख़्वाब था, उनका। ऋत्विक घटक से मृणाल सेन की पहली मुलाक़ात, साल 1948 में इप्टा के एक प्रोग्राम में हुई। बाद में वो दोस्त बन गए। जबकि तापस सेन, सलिल चौधरी, काली बैनर्जी और हृषिकेश मुखर्जी उनके संघर्ष के साथी थे। इन्हीं साथियों की संगत का ही असर था कि मृणाल सेन ने भी फ़िल्म बनाने के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू कर दिया। लेकिन फ़िल्म बनाना इतना आसान काम नहीं था। उनके सभी दोस्त एक के बाद एक मुंबई चले गए और हिन्दी फ़िल्मों में उन्हें काम मिल गया। जबकि मृणाल सेन को ऐसा कोई मौक़ा नहीं मिला। बेरोजगारी से तंग आकर, उन्होंने मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव की नौकरी कर ली। अपनी पहली नौकरी के लिए उन्हें उत्तर प्रदेश के कानपुर जाना पड़ा। बाद में उनका तबादला कोलकाता हो गया। यह नौकरी बेमन की थी। जिसमें उनका ज़रा-सा भी मन नहीं लगता था। नौकरी करते वक़्त हमेशा यह बात सोचते रहते कि अपनी ख़ुद की फ़िल्म वे कब बनाएंगे।
गायक हेमंत कुमार ने दिया दोबारा मौका
आख़िरकार, छह महीने बाद ही मृणाल सेन ने इस नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया। अब काम की तलाश में वे स्टुडियो-स्टुडियो भटकने लगे। ‘रात भोरे’ (साल 1955) मृणाल सेन की पहली फ़िल्म है। जिस स्टोरी पर यह फ़िल्म बनी, उन्हें नापसंद थी। बावजूद इसके अपनी आर्थिक परेशानियों से उबरने के लिए, मजबूरन उन्होंने यह फ़िल्म की। उत्तम कुमार, छवि विश्वास, सावित्री चटर्जी, काली बनर्जी, छाया देवी जैसी बांग्ला फ़िल्मों की बड़ी स्टारकास्ट होने के बाद भी यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर फ्लॉप रही। पहली ही फ़िल्म की नाकामी से मृणाल सेन को बड़ा झटका लगा। उन्हें अपना ख़्वाब टूटता दिखा। निराशा ने उन्हें घेर लिया। इस मनोस्थिति से मृणाल सेन को बाहर निकाला, गायक-संगीतकार हेमंत कुमार ने। साल 1957 में निर्माता के तौर पर उन्होंने अपनी पहली फ़िल्म ‘नील आकाशेर नीचे’ बनाने का फ़ैसला किया। इस फ़िल्म की स्क्रिप्ट लिखने की ज़िम्मेदारी उन्होंने मृणाल सेन को सौंपी। हिन्दी साहित्य की प्रमुख कवि महादेवी वर्मा की किताब ‘स्मृति की रेखाएं’ में शामिल संस्मरण ‘चीनी फेरीवाला’ पर उन्हें यह स्क्रिप्ट लिखना थी। दो बार की कोशिश के बाद, मृणाल सेन की यह स्क्रिप्ट फाइनल हुई। फ़िल्म शुरू होते-होते कुछ इत्तिफ़ाक़ ऐसा बना कि निर्देशन की ज़िम्मेदारी उन्हें ही मिल गई। फ़िल्म उम्मीदों के बरख़िलाफ़ सुपर हिट रही। न सिर्फ़ यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब रही, बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने भी इस फ़िल्म को सराहा। कम्युनिस्ट पार्टी के लीडर मुज़फ़्फ़र अहमद और ज्योति बसु ने फ़िल्म की तारीफ़ की, तो पार्टी के मुखपत्र ‘स्वाधीनता’ में फ़िल्म की प्रशंसा में सम्पादकीय लिखा गया। कुछ फ़िल्म क्रिटिक ने तो इस फ़िल्म की तुलना डी सिका की विश्व प्रसिद्ध फ़िल्म ‘बाइसिकल थीफ़’ और सत्यजित राय की ‘पथेर पांचाली’ से भी की है। फ़िल्म की इतनी कामयाबी के बाद भी मृणाल सेन ‘नील आकाशेर नीचे’ को अपनी तरक़्क़ीयाफ़्ता फ़िल्म शैली की मिसाल मानने से इंकार करते थे। उनके मुताबिक, ‘‘फ़िल्म अति भावुक और कई हिस्सों में तकनीकी दृष्टि से बेहद कमज़ोर थी।’’ इस फ़िल्म से जुड़ा एक और तथ्य, जिसे जानकर सभी लोगों को हैरानी होगी कि यह आज़ाद हिंदुस्तान की ऐसी पहली फ़िल्म है, जिसे अपने कंटेट की वजह से कुछ महीने सरकारी पाबंदी झेलना पड़ी।
ऐसे तैयार हुआ मृणाल सेन की फिल्मों का दर्शक वर्ग
‘नील आकाशेर नीचे’ की कहानी की यदि बात करें, तो यह फ़िल्म एक मशहूर वकील की बीवी जो स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थी, उसके और एक चीनी फेरीवाले के भाई-बहन के रिश्ते पर केन्द्रित एक इमोशनल स्टोरी है। यह वह दौर था, जब हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा फ़िज़ाओं में था। ज़ाहिर है कि फ़िल्म को इस माहौल का फ़ायदा मिला और फ़िल्म व्यावसायिक तौर पर कामयाब रही। ख़ास तौर पर फ़िल्म के गीत-संगीत ख़ूब मशहूर हुआ। हेमंत कुमार के मधुर गायन और संगीत ने इस फ़िल्म को ऊंचाईयों पर पहुंचा दिया। ‘नील आकाशेर नीचे’ की कामयाबी के बाद मृणाल सेन ने फिर पीछे मुड़कर, नहीं देखा। अब उन्होंने अपने पसंदीदा सब्जेक्ट पर फ़िल्म बनाना शुरू कर दिया। ‘बाइशे श्रावण’ (साल 1960), ‘पुनश्च’ (साल 1961), ‘अवशेषे’ (साल 1963), ‘प्रतिनिधि’ (साल 1964), ‘आकाश कुसुम’ (साल 1960), ‘माटीर मनीषा’ (साल 1966 ओड़िया भाषा में) एक के बाद एक उनकी कई अच्छी फ़िल्में आईं। जिन्होंने न सिर्फ़ उनकी भारतीय सिनेमा में पहचान बना दी, बल्कि विदेशों में भी उनकी फ़िल्मों का स्वागत हुआ। बॉक्स ऑफ़िस पर भले ही यह फ़िल्में, उस तरह से कामयाब नहीं रहीं, लेकिन फ़िल्म आलोचकों ने इसे ख़ूब सराहा। मृणाल सेन की फ़िल्मों का एक दर्शकवर्ग तैयार हो गया, जिसे उनकी फ़िल्मों का इंतज़ार रहता था। साल 1942 के भयानक अकाल पर केन्द्रित ‘बाइशे श्रावण’ मृणाल सेन की पसंदीदा फ़िल्म थी। लंदन और वेनिस फ़िल्म फेस्टिवल में भी यह फ़िल्म दिखाई गई।
भुवन सोम: जिसने बदल दी हिंदी फिल्मों की धारा

मृणाल सेन की फ़िल्में लोग पसंद कर रहे थे, लेकिन यह फ़िल्में बॉक्स ऑफ़िस पर कामयाब नहीं हो रही थीं। इस बात की निराशा ख़ुद उन्हें भी होने लगी थी। इस निराशाजनक माहौल में उनकी फ़िल्म ‘भुवन सोम’ आई। एनएफ़डीसी की मदद से बनी इस छोटे बजट की फ़िल्म ने रिलीज होते ही तहलका मचा दिया। फ़िल्म सुपर हिट साबित हुई। इस फ़िल्म ने पैसा भी कमाया और शोहरत भी बटोरी। ‘भुवन सोम’ को सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार के अलावा मृणाल सेन को एक अलग फ़िल्म उत्सव में श्रेष्ठ निर्देशन का पुरस्कार भी मिला। समानांतर फ़िल्मों के दिग्गज निर्देशक श्याम बेनगल ने फ़िल्म की तारीफ़ करते हुए उस वक़्त लिखा था, ‘‘भारतीय सिनेमा में जो महत्वपूर्ण स्थान ‘पथेर पांचाली’ को मिला है, वही हिंदी सिनेमा में ‘भुवन सोम’ का है, जिसके आगमन ने फ़िल्मकारों के लिए सिनेमा के नए क्षितिज खोल दिए।’’ श्याम बेनगल की इस बात में सच्चाई भी है। हिंदी के समानांतर सिनेमा में ‘भुवन सोम’ आज भी मील का पत्थर मानी जाती है। इस फ़िल्म के आने के बाद, हिंदी में समानांतर सिनेमा की एक नई राह खुली। जिस पर ख़ु़द श्याम बेनेगल, गोविंद निहलानी, कुमार शाहनी, सई परांजपे, महेश भट्ट, सईद मिर्ज़ा, प्रकाश झा, बासु भट्टाचार्य जैसे निर्देशक चले और उन्होंने हिंदी सिनेमा को अपनी कलात्मक फ़िल्मों से समृद्ध किया।
‘भुवन सोम’ उत्पल दत्त की पहली फ़िल्म थी, तो वहीं अमिताभ बच्चन ने भी इस फ़िल्म के लिए वॉयसऑवर दिया था। एक तरफ़ फ़िल्म को बेजोड़ कामयाबी हासिल हुई, तो दूसरी ओर सत्यजित राय और ऋत्विक घटक दोनों को यह फ़िल्म पसंद नहीं आई। सत्यजित राय ने जहां इस फ़िल्म की खुलकर आलोचना की, तो घटक भी इसे मृणाल सेन की बकवास फ़िल्म मानते थे। ‘भुवन सोम’ की सफ़लता ने मृणाल सेन को एक बार फिर अपनी पसंदीदा यथार्थवादी फ़िल्मों की ओर मोड़ दिया। उन्होंने इसके बाद कोलकाता शहर पर केन्द्रित त्रयी ‘इंटरव्यू’ (साल 1971), ‘कोलकाता 71’ (साल 1971) और ‘पदातिक’ (साल 1973) बनाईं। कोलकाता में उन दिनों नक्सल आंदोलन चरम पर था। अपनी इन फ़िल्मों में उन्होंने निम्न और मध्य वर्ग में नौजवानी के भटकाव, बीमारी और सामाजिक भ्रष्टाचार जैसे समकालीन सवालों को बड़े प्रभावी ढंग से फ़िल्माया था। इन फ़िल्मों में व्यवस्था के ख़िलाफ़ आक्रोश ही नहीं दिखाया गया था, बल्कि ये अवाम को आंदोलन के लिए भी उकसाती हैं। मृणाल सेन की इन फ़िल्मों ने उन्हें देश में ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय बना दिया। उस वक़्त आलम यह था कि दुनिया के हर छोटे-बड़े फ़िल्म फेस्टिवलों में उनकी फ़िल्मों की मांग बढ़ गई। इन फ़िल्मों ने विश्व सिनेमा में उनका नाम हमेशा के लिए अमर कर दिया।
मृणाल सेन: विश्व सिनेमा के मंच पर सशक्त उपस्थिति
सत्यजित राय के बाद, मृणाल सेन दुनिया में सबसे अधिक पहचाने और पुरस्कृत होनेवाले भारतीय फ़िल्म निर्देशक हैं। जिन्होंने सिनेमा में ऑडियो तकनीशियन के रूप में अपनी शुरुआत की और उन ऊंचाईयों पर पहुंचे, जो हर एक का ख़्वाब होता है। मृणाल सेन की फ़िल्म ‘कोरस’ को मास्को अंतरराष्ट्रीय फ़िल्मोत्सव में ‘सिल्वर प्राइज’, ‘अकालेर सन्धाने’ को बर्लिन इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में ‘सिल्वर बियर’, ‘ओका ऊरी कथा’ को कार्लोवा वारी के इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में विशेष पुरस्कार, ‘आमार भुवन’ को काहिरा के इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ निर्देशक, ‘परशुराम’ बर्लिन फ़िल्मोत्सव में पुरस्कृत हुई और जूरी का विशेष पुरस्कार मिला, तो उनकी हिन्दी फ़िल्म ‘खंडहर’ को शिकागो इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल में सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का ‘ग्रैंड प्राइज’ से नवाज़ा गया। यही नहीं उनकी कई फ़िल्में मसलन ‘कोरस’, ‘मृगया’, ‘ओका ऊरी कथा’, ‘एक दिन प्रतिदिन’, ‘अकालेर सन्धाने’, ‘खंडहर’ राष्ट्रीय पुरस्कार से भी सम्मानित हुईं।
70 का दशक, कलकत्ता और मृणाल सेन
‘कोलकाता 71’ की बात करें, जो मृणाल सेन की सबसे चर्चित फ़िल्म है। यह फ़िल्म दरअसल चार कहानियों ‘आत्महत्या का अधिकार’ (माणिक बंदोपाध्याय), ‘अंगार’ (प्रबोध कुमार सान्याल), ‘स्मगलर’ (समरेश बसु) और अजितेश बंदोपाध्याय की कहानियों का कोलाज है। भारतीय फ़िल्म इतिहास में इस तरह की सियासी फ़िल्म बमुश्किल दिखाई देती हैं। मृणाल सेन लैटिन अमेरिका के ‘तीसरा सिनेमा’ से बहुत प्रभावित थे। ख़ास तौर से वे फर्नान्दो सोलानस, आक्टेवियो गेतिनो, ग्लौबर रोचा की फ़िल्मों और उनके फ़लसफ़े से हद दर्जे तक मुतास्सिर हुए। यही वजह है कि जाने-अनजाने उनकी फ़िल्मों में भी इनका असर दिखाई देता है। ‘कलकात्ता 71’, एक ठोस सियासी फ़िल्म है, जो प्रचारात्मक के साथ-साथ कलात्मक भी है। अपने एक इंटरव्यू में इस फ़िल्म के बारे में विस्तार से बताते हुए, उन्होंने ख़ुद यह बात स्वीकारी थी-‘‘जब वे ‘कलकत्ता 71’ बना रहे थे, कलकत्ता बहुत बुरे दौर से गुज़र रहा था। कम्युनिस्ट पार्टी का सबसे लड़ाकू धड़ा नक्सल दल, संसदीय राजनीति की हर प्रकार की गतितिधि को सिरे से ख़ारिज कर चुका था। इसके साथ ही साथ कई बातों पर अन्य दो दलों के साथ उनका गंभीर झगड़ा था। इसका परिणाम कई अंतरदलीय मुठभेड़ के रूप में सामने आया और इसमें शामिल सभी लोगों ने व्यवस्था के ख़िलाफ़ सामाजिक शक्तियों को लामबंद करने के अपने मुख्य उद्देश्य को अनदेखी की…मैंने इस विक्षोभ को समझना चाहा, 71 की इस अशांति को व्याख्यायित करना चाहा और इसका कारण जानना चाहा। इसकी उत्पत्ति मैं जानना चाहता था। यह विक्षोभ अचानक कहीं से उभ्दूत नहीं हो गया होगा। इसका ज़रूर कहीं न कहीं उद्गम और अंत होगा। मैंने इसकी उत्पत्ति ख़ोजने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में अपने इतिहास की पुनर्व्याख्या की। और मेरी दृष्टि में यह चरम राजनीतिक काम था।’’ (‘इंट्रोड्यूसिंग मृणाल सेन’, उदयन गुप्ता, ‘जम्प कट’ नंबर 12-13, 1976)
अकालेर संधाने का यथार्थवाद और सिनेमाई सौंदर्यशास्त्र

इन फ़िल्मों के बाद, मृणाल सेन ने ‘कोरस’ (1974) और ‘अकालेर संधाने’ (1980) बनाईं। उनकी ये दोनों फ़िल्में भी प्रयोगवादी हैं। ‘अकालेर संधाने’, साल 1943 के बंगाल के भयानक अकाल पर केन्द्रित फ़िल्म है। शिल्प और अपने कहन की दृष्टि से मृणाल सेन ने इसमें काफ़ी प्रयोग किये हैं। फ़िल्म एक स्तर पर यथार्थ को कलाकृति में ढालने की प्रक्रिया को रेखांकित करती है, तो दूसरे स्तर पर वर्तमान का अतीत से जो जटिल संबंध होता है, उसकी भी गंभीर पड़ताल करती है। इस फ़िल्म में सलिल चौधरी द्वारा इप्टा के लिए लिखे गए मशहूर गीत ‘हाय सम्हालो धान हो, कास्तेता दाव शान हो’ का भी इस्तेमाल किया गया है। इस फ़िल्म के बारे में मृणाल सेन ने कहा है, ‘‘यह फ़िल्म सवाल करती है कि क्या हम लोग जो यथार्थवाद की हर समय दुहाई देते रहते हैं, अपनी कला में यथार्थ का वस्तुगत चित्रण कर पाए हैं या किस हद तक इसमें सफल हो पाए हैं ? दूसरे शब्दों में, हम अपनी कलात्मक कृतियों में कितनी ईमानदारी बरत पाए हैं, और हम ख़ुद से कब और कहां छलावा करते हुए, तथाकथित सौंदर्यशास्त्र के पीछे छिपने की कोशिश करने लगे हैं। कम से कम मैं वहां पहुंच गया हूं, जहां से मैं ज़ोर देकर, यह कह सकता हूं कि यथार्थ की भौतिकता और कलाकार द्वारा उसके उद्धार के बीच एक अंतर होता है, जिसके बारे में उसे पता हो सकता है और नहीं भी हो सकता है। कलाकार अक्सर इस अंतर को अपनी तकनीक और जिसे हम लोग कलाकारी कहते हैं, उसके द्वारा ढकने की कोशिश करते हैं….‘अकालेर संधाने’ में हम लोगों ने अपनी असमर्थताओं को स्वीकार किया है।’’ (‘इन सर्च आफॅ़ फेमिन’, समिक बंदोपाध्याय, ‘इंट्रोडक्शन, स्क्रिप्ट रीकंसट्रक्शन एंड ट्रांसलेशन’, सीगल बुक्स, कलकत्ता 1985) चिदानंद दास गुप्ता ने ‘अकालेर सन्धाने’ को फ़िल्म बनाने के कथानक पर बनी हुई दुनिया की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म माना है।
बांग्ला से हिंदी सिनेमा की ओर
अपनी फ़िल्मी ज़िंदगी के आख़िरी हिस्से में मृणाल सेन ने बांग्ला से ज़्यादा हिंदी फ़िल्मों पर ज़ोर दिया। उन्होंने ‘एक दिन अचानक’, ‘खंडहर’ और ‘जेनेसिस’ जैसी फ़िल्में बनाईं। ‘एक दिन प्रतिदिन’, ‘एक दिन अचानक’, ‘अन्तरीन’, ‘महापृथ्वी’, ‘ख़ारिज’, ‘खंडहर’ और ‘जेनेसिस’ फ़िल्मों के केन्द्र में व्यक्ति है। उसकी उत्पत्ति, नियति, प्रारब्ध, अकेलेपन की पीड़ा को समझने की कोशिश की गई है। इन फ़िल्मों में आदमी के अकेलेपन के कई रंग हैं। निर्देशन के अलावा अदाकारी के लिहाज से भी यह फ़िल्में दर्शकों को ख़ूब पसंद आईं। ‘अन्तरीन’ में डिम्पल कपाड़िया, ‘एक दिन अचानक’ एवं ‘जेनेसिस’ एवं ‘खंडहर’ में शबाना आज़मी, अर्पणा सेन, उत्तरा बावरकर, गीता सेन ने कमाल का अभिनय किया है। अपनी फ़िल्मों के आग़ाज़ से ही मृणाल सेन ने एक टीम बनाकर काम किया। अपनी ज़्यादातर फ़िल्मों की स्क्रिप्ट जहां उन्होंने ख़ुद लिखी, तो वहीं फोटोग्राफ़र के तौर पर उन्हें शैलेजा चटर्जी, के.के. महाजन और फ़िल्म एडिटर के तौर पर सुबोध राय, गंगाधर नस्कर जैसे गुणीजनों का साथ मिला। और इस टीम ने एक के बाद एक लाइन से शानदार फ़िल्में अपने दर्शकों को दीं। फोटोग्राफ़र के. के. महाजन ने तो उनके साथ 1989 तक काम किया। नाटककार ब.व. कारंत ने भी मृणाल सेन के साथ काम किया। ‘परशुराम’ (1978), ‘एक दिन प्रतिदिन’ (1979), ‘ख़ारिज’ (1982), ‘महापृथ्वी’ (1991) में ब.व. कारंत का ही संगीत है, तो वहीं ‘जेनेसिस’ में पंडित रविशंकर ने संगीत दिया था।
साहित्य को बनाया अपने सिनेमा की बुनियाद

सत्यजित राय की तरह मृणाल सेन ने भी साहित्य पर बहुत अच्छी फ़िल्में बनाईं। लेकिन राय और सेन में एक बुनियादी फ़र्क है। राय ने जहां सिर्फ़ बांग्ला साहित्यकारों की रचना को ही अपनी फ़िल्म का मौजू़अ बनाया, तो मृणाल सेन ने हिंदी साहित्यकार महादेवी वर्मा, प्रेमचंद के अलावा उर्दू के बड़े अफ़साना निगार सआदत हसन मंटो की कहानी ‘बादशाहत का ख़ात्मा’ पर बांग्ला में ‘अंतरीन’ नामक एक फ़िल्म बनाई। प्रेमचंद की चर्चित कहानी ‘कफ़न’ पर उन्होंने तेलुगु भाषा में ‘ओका ऊरी कथा’, तो ओड़िया साहित्यकारों भगवती चरण पाणिग्रही की कहानी ‘शिकार’ पर ‘मृगया’, कालिंदी चरण पाणिग्रही की रचना पर ‘माटिर मानीष’ जैसी फ़िल्मों का निर्माण किया। अलबत्ता यह बात अलग है कि उन्होंने जो छह हिन्दी फ़िल्में बनाईं, उनमें से एक भी हिन्दी रचना पर नहीं है। मृणाल सेन ने दूरदर्शन के लिए हिन्दी में कई टेली फ़िल्में बनाईं। जिनमें प्रमुख टेली फ़िल्म है, ‘कभी दूर कभी पास’। इस सीरीज़ के अंतर्गत उन्होंने चालीस मिनट की तेरह लघु फ़िल्मों का निर्देशन किया। मृणाल सेन ने कुछ डॉक्यूमेंट्री ‘मूविंग पर्सपेक्टिव’ (1967), ‘त्रिपुरा प्रसंग’ (1982), ‘कलकत्ता, माय अल डोराडो’ (1986), ‘एंड शो गोज ऑन’ (1995) का निर्माण किया। फ़िल्मस डिवीजन के लिए बनाई डॉक्यूमेंट्री ‘मूविंग पर्सपेक्टिव’ में उन्होंने सिंधु घाटी सभ्यता से लेकर साल 1967 तक तक़रीबन पांच हजार साल की यात्रा को एक घंटे में दर्शाया है।
राय, घटक और सेन
बांग्ला सिनेमा के दो और बड़े नाम सत्यजित राय और ऋत्विक घटक का फ़िल्मी सफ़र, तक़रीबन उनके साथ ही हुआ। तीनों ही फ़िल्मकारों ने व्यावसायिक सिनेमा की बजाए यथार्थवादी सिनेमा को चुना और अपनी एक अलग पहचान बनाई। लेकिन तीनों की ही फ़िल्में एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा हैं। घटक और मृणाल सेन की फ़िल्मों में जहां वामपंथी विचारधारा का असर साफ़ दिखाई देता है, तो सत्यजित राय अपनी फ़िल्मों से एक अलग ही फ़िल्मी व्याकरण गढ़ते हैं। मृणाल सेन की ऋत्विक घटक से अच्छी दोस्ती थी। उनका यह दोस्ताना संघर्ष के दौर से था। घटक के निधन के बाद, उन्हें याद करते हुए मृणाल सेन ने लिखा था, ‘‘हम लोगों की दिलचस्पियों में अपार वैविध्य होने के बावजूद, हम जिस विषय पर बार-बार लौटते थे, वह था सिनेमा। सिनेमा, सिनेमा और सशस्त्र क्रांति। यह वह समय था, जब हम लोगों ने सीखा कि सिनेमा की जो अपनी अवधारणा है, जो क्रान्ति की अवधारणा से अटूट रूप से सम्बद्ध है, कैसे उसके साथ जिया जाए। यह वह समय भी था, जब कम्युनिस्ट पार्टी पर अपनी दृण आस्था व्यक्त करने के बाद, अपने देश की नीरस फ़िल्मों के प्रति हम एक प्रकार की तीव्र वितृष्णा के भाव से भर गए थे।’’
मृणाल सेन ने कई नये चेहरों को सिनेमा में पहली बार मौक़ा दिया, जो आगे चलकर बड़े कलाकार साबित हुए। एन विश्वनाथन को उन्होंने ‘पुनश्च’ और उत्पल दत्त को ‘भुवन सोम’, मिथुन चक्रवर्ती-‘मृगया’ को फ़िल्मी पर्दे पर उतारा। तीनों ही क्रमशः तमिल और हिन्दी सिनेमा के शीर्ष पर पहुंचे। यह बात अलग है कि उन्होंने बाद में मिथुन चक्रवर्ती के साथ कोई फ़िल्म नहीं की। ‘मृगया’ को उस साल सर्वक्षेष्ठ फ़िल्म का तो राष्ट्रीय पुरस्कार मिला ही, मिथुन चक्रवर्ती को सर्वश्रेष्ठ कलाकार और उन्हें ख़ुद सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला। मृणाल सेन ने अपने छह दशक के फ़िल्मी करियर में 27 फीचर फ़िल्मों, 14 लघु व 4 वृत्तचित्र फिल्मों का निर्माण किया। साल 2002 में अस्सी साल की उम्र में मृणाल सेन ने अपनी आख़िरी फ़िल्म ‘आमार भुवन’ डायरेक्ट की। मृणाल सेन एक शानदार फ़िल्मकार होने के साथ-साथ सजग बुद्धिजीवी, लेखक और चिंतक भी थे। उन्होंने अपनी फ़िल्मों से दर्शकों को हमेशा एक संदेश दिया। मृणाल सेन कभी कम्युनिस्ट पार्टी के मेंबर नहीं रहे, लेकिन उनका वामपंथी झुकाव जग ज़ाहिर था। वे ताउम्र एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी रहे। फ़िल्मों में और सार्वजनिक जीवन में उन्होंने कभी अपनी पक्षधरता नहीं छिपाई। झूठी शान और दिखावे में उनका यक़ीन नहीं था। इतनी शोहरत मिलने के बाद भी वे सादा जीवन जीते थे। सफ़ेद कुर्ता और चुस्त चूड़ीदार पजामा उनकी पसंदीदा पोशाक थी।

भारतीय सिनेमा की पहचान मज़बूत करने वाला फिल्मकार
फ़िल्मी दुनिया में मृणाल सेन के विशिष्ट योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म भूषण’ और ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया, तो वहीं वे साल 1997 से लेकर 2003 तक राज्यसभा के सदस्य भी रहे। साल 2005 में वे ‘दादा साहब फाल्के’ पुरस्कार से सम्मानित किए गए। मृणाल सेन को अपनी कलात्मक फिल्मों के लिये देश-विदेश से कई सम्मान हासिल हुए। फ्रांस सरकार ने उनको ‘कमान्डर ऑफ द ऑर्ट ऑफ ऑर्ट एंडलेटर्स’ से, तो रशियन सरकार ने उन्हें ‘ऑर्डर ऑफ फ्रेंडशिप’ और ‘सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड’ से नवाजा। कई विश्वविद्यालयों ने उन्हें अपनी मानद डी.लिट् की उपाधि से सम्मानित किया। इसके अलावा अनेक अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सवों में वे जूरी के सदस्य रहे। मृणाल सेन ने कुछ समय के लिए ‘अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म सोसाइटी फेडरेशन’ के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया। साल 2004 में उनकी आत्मकथा ‘आलवेज बीइंग बोर्न’ प्रकाशित हुई। इस किताब के अलावा ‘मोंटाज : लाइफ़, पॉलिटिक्स सिनेमा’, ‘‘ओवर द इयर्स’, ‘तृतीय भुवन’, ‘माय चैपलिन’, ‘आमार चैपलिन’ और ‘अनेक मुख अनेक मुहूर्त’ उनकी दूसरी अहम किताबें हैं। मृणाल सेन और उनकी फ़िल्मों को अच्छी तरह से समझने के लिए यह ज़रूरी किताबें हैं। मृणाल सेन को एक लंबी ज़िंदगी मिली और उन्होंने उसे सार्थक ढंग से जिया। अपने आख़िरी समय तक वे सक्रिय रहे। मृणाल सेन की बीवी गीता सेन भी एक बहुत अच्छी अदाकारा थीं। उनकी कई फ़िल्मों ‘कोलकाता 71’, ‘एक दिन प्रतिदिन’,‘कोरस’, ‘अकालेर सन्धाने’, ‘खंडहर’, ‘महापृथ्वी’ और ‘चलचित्र’ में उन्होंने महत्वपूर्ण रोल किये। अदाकारी के अलावा फ़िल्म बनाते वक़्त वे मृणाल सेन की हर मुमकिन मदद करती थीं। यह महज़ इत्तिफ़ाक़ है कि साल 2017 में उनके निधन के एक साल बाद ही, 30 दिसम्बर, 2018 को 95 साल की उम्र में मृणाल सेन ने इस दुनिया से अपनी विदाई ले ली। निधन से पहले वे अपने डॉक्टर को हिदायत दे गये थे कि ‘उनकी मौत के बाद, उनके शरीर पर न तो कोई फूल चढ़ाएगा और न ही उनकी कोई शवयात्रा निकलेगी।’ और ठीक ऐसा ही हुआ। बड़ी सादगी से उनका अंतिम संस्कार हुआ।

मृणाल सेन एक साधारण फ़िल्मकार नहीं थे, जो कि सिर्फ़ मनोरंजनक और व्यावसायिक फ़िल्में बनाते हैं। मृणाल सेन, देश के उन फ़िल्मकारों में शामिल हैं, जिनकी फ़िल्में दर्शकों को कुछ सोचने को मजबूर और बहस के लिए उकसाती हैं। अपनी किताब ‘व्यूज ऑन सिनेमा’ में वे कहते हैं, ‘‘सर्वसम्मत होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, एक बहस को प्रेरित करना। ताकि इसके ज़रिये एक सकारात्मक विवाद खड़ा किया जा सके।….मेरा मानना है कि सारी अच्छी कलात्मक कृतियां कमोबेश हमें एक विवादास्पद बहस की ओर ले जाती हैं।’’ उनकी इसी किताब के एक अध्याय का टाइटल है, ‘मैं आसन्न वर्तमान में जीता हूं, विगत को समकालीन संवेदनशीलता से सजाता हूं।’ यही नहीं वे अपने लेखों और इंटरव्यू में भी इसे लगातार दोहराते रहे कि ‘‘अतीत का वर्तमान से निरंतर संवाद ही अतीत को वर्तमान से जोड़ देता है और हमें निरंतर इतिहास को नए सिरे से पढ़ते रहना चाहिए।’’ (‘आलवेज बीइंग बोर्न’, मृणाल सेन, अ मेमॉयर, स्टेलर पब्लिशर प्राइवेट लिमिटेड, नई दिल्ली, 2006, पेज-79) ज़ाहिर है कि इतिहास को बार-बार नए सिरे से पढ़ते रहना ही आगे बढ़ने की निशानी है। इससे हम अपने वर्तमान को सुखद बना सकते हैं। मृणाल सेन की कमोबेश सारी फ़िल्में, हमें एक ‘विवादास्पद’ बहस की ओर ले जाती हैं।
