

बॉम्बे को ‘सपनों का शहर’ कहते हैं, पर ‘मटका किंग’ दिखाती है कि यहां सपने सट्टे के अंकों पर भी दांव लगाते थे। नागराज मंजुले अपनी पहली वेब सीरीज़ में जुर्म, राजनीति और पेट की आग को एक साथ बुनते हैं। विजय वर्मा उस किरदार में पूरी तरह ढल गए हैं जो मजबूरी से माफिया बनता है। प्रोडक्शन डिज़ाइन और 70s का मुंबई आपको बांधता है, भले ही स्क्रिप्ट हर मोड़ पर बाज़ी न मार पाए। ‘मटका किंग’ परफेक्ट नहीं, पर नज़रअंदाज़ करने लायक भी नहीं। एक संजीदा निर्देशक की इस दिलचस्प सीरीज़ पर चर्चा कर रहे हैं वरिष्ठ पत्रकार और फिल्म समीक्षक अमिताभ श्रीवास्तव। अमिताभ श्रीवास्तव आजतक, इंडिया टीवी जैसे न्यूज़ चैनलों में बतौर वरिष्ठ कार्यकारी संपादक कार्य कर चुके हैं। NDFF से शुरू से ही जुड़े रहे हैं और ‘टॉक सिनेमा ‘ सीरीज़ के लाइव सत्रों का संचालन करते रहे हैं। इन दिनों सत्य हिंदी पोर्टल पर नियमित रुप से ‘सिनेमा संवाद’ सत्र का संचालन कर रहे हैं।
झन्नाटेदार मराठी फिल्म ‘सैराट’ के धाकड़ निर्देशन से मशहूर हुए नागराज मंजुले की वेब सीरीज़ ‘मटका किंग’ इन दिनों चर्चा में है। प्राइम वीडियो पर 17 अप्रैल को रिलीज़ हुई यह वेब सीरीज़ 1960 के दशक में, जब आज का मुंबई बंबई कहलाता था, जुए और सट्टे के एक ग़ैरक़ानूनी आपराधिक जाल की कहानी कहती है जिसे मटका कहा जाता था। कराची से आकर तब के बंबई में बस गये रतन खत्री नाम के एक मामूली कपास कारोबारी के मटका किंग बनने और ताश के पत्तों के बूते पर उस दौर के बंबई की सियासत, क़ानून, सिनेमा और समाज की एक ताकतवर हस्ती बनने की असली कहानी इस वेब सीरीज़ का मूल आइडिया है । लेकिन यह रतन खत्री की बायोपिक नहीं है।शुरुआत में दिये गये डिस्क्लेमर में यह साफ कर दिया गया है कि यह ‘मटका’ खेल से प्रेरित एक काल्पनिक रचना है और किसी भी जीवित या मृत व्यक्ति की बायोपिक नहीं है। प्रसंगवश, यह बता दें कि असली मटका किंग रतन खत्री की 2020 में मृत्यु हो चुकी है। अभिनेता ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा ‘खुल्लमखुल्ला’ में रतन खत्री से अपने परिचय का किस्सा बयान किया है। ऋषि कपूर ने लिखा है कि रतन खत्री ‘रंगीला रतन’ नाम की एक फिल्म के प्रोड्यूसर थे जिसमें ऋषि कपूर और परवीन बाबी हीरो-हीरोइन थे और उनके साथ अशोक कुमार भी थे। ऋषि कपूर ने लिखा है कि रतन खत्री शाम को उनसे या दादामोनी अशोक कुमार से ताश की गड्डी में से कोई एक पत्ता निकालने को कहते और उस पत्ते का नंबर ही उस शाम मटके का लकी नंबर होता जो मिनटों में पूरे शहर में फैल जाता था।

70 का दशक और मायानगरी का ‘मटका’
‘मटका किंग’ 1960–70 के दशक के मुंबई के उस दौर को परदे पर जिंदा करती है, जब आम आदमी के सपनों और लालच पर खड़ी की गई ‘मटका’ नामक जुए-सट्टे की एक ग़ैरक़ानूनी, आपराधिक व्यवस्था ने सत्ता और समाज के सामने एक समानांतर अर्थव्यवस्था की चुनौती पेश कर दी थी। यह उस समाज की कहानी है जहाँ गरीबी, आकांक्षा और सत्ता की भूख मिलकर एक नई सामाजिक संरचना रचते हैं।
‘मटका किंग’ वेब सीरीज़ में ब्रज भट्टी की मुख्य भूमिका में हैं मौजूदा दौर के बहुत सशक्त अभिनेता विजय वर्मा । विजय वर्मा का केंद्रीय पात्र इस कथा का सबसे प्रभावी आधार है। उनके इर्दगिर्द नागराज मंजुले ने बहुत अच्छे कलाकारों की भीड़ खड़ी कर दी है जिनमें मसाला हिंदी सिनेमा के ‘बैड मैन’ गुलशन ग्रोवर से लेकर मराठी सिनेमा के साई ताम्हणकर, गिरीश कुलकर्णी, किशोर कदम जैसे जानेमाने चेहरे हैं और टीवी धारावाहिकों और कॉमेडी कार्यक्रमों में नज़र आने वाले सिद्धार्थ जाधव और कृतिका कामरा हैं जो ब्रज भट्टी की इस कहानी को अपने किरदारों के जरिये आगे बढ़ाते चलते हैं। गिरीश कुलकर्णी हिंदी फिल्मों में अभी तक ज्यादातर छोटे, नकारात्मक किरदारों में दिखाई दिये हैं। यहाँ वह एक शरीफ़, ईमानदार, संभ्रांत पत्रकार की भूमिका में हैं। क्लीन शैव लुक में बहुत अच्छे लगे हैं। साई ताम्हणकर विजय वर्मा यानी ब्रज भट्टी की पत्नी बरखा भट्टी के किरदार में हैं जबकि कृतिका कामरा ब्रज भट्टी की गुलरुख नाम की पारसी मटका पार्टनर और प्रेमिका की भूमिका में हैं।
‘मटका किंग’ सबसे ज़ोरदार

विजय वर्मा ने अपनी भूमिका को बहुत असरदार तरीके से निभाया है। कहानी कई बार अनावश्यक विस्तार और धीमी गति का शिकार हो जाती है, जिससे उसका प्रभाव कम होता है। स्क्रिप्ट में कई जगह झोल हैं, कहानी की रफ्तार कई जगह सुस्त पड़ जाती है, बेवजह का फैलाव दिखता है लेकिन विजय वर्मा ने अपने अभिनय से उन तमाम कमियों को ढकने की भरपूर कोशिश की है। आठ कड़ियों में फैली सीरीज़ चार कड़ियों के बाद बोझिल होने लगती है लेकिन विजय वर्मा उसे बर्दाश्त करने लायक बनाये रखते हैं। असली दिक्कत कहानी और किरदार का काग़ज़ पर ग्राफ़ सोचने और उसे आकार देने की है। ब्रज भट्टी को हीरो दिखाना है या विलेन, यह लेखक-निर्देशक की टीम तय नहीं कर पाई है। यह कन्फ्यूजन एक जगह ब्रज भट्टी की बीवी बरखा के जरिये एक सटीक संवाद में अभिव्यक्त हुआ है। बरखा अपने पति से कहती है- तुम ठीक से विलेन भी तो नहीं हो।
ब्रज भट्टी के साथी, दोस्त और बाद में नाराज़ होकर रिश्ते तोड़ लेने वाले दगड़ू विचारे की भूमिका में सिद्धार्थ जाधव ने शुरूआत से आखिर तक यादगार काम किया है। अब तक के करियर में सबसे अच्छा। काम सारे कलाकारों का अच्छा है लेकिन सीरीज़ उम्मीद से कम रह जाती है।
मंजुले का ‘मटका’ और ‘उम्मीदों’ का मकड़जाल
नागराज मंजुले की अब तक की पहचान एक यथार्थवादी निर्देशक के रूप में रही है। उनकी फिल्मों में सामाजिक विषमता और वर्ग संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। मटका किंग में भी यह दृष्टि मौजूद है, लेकिन कुछ स्थानों पर यह पूरी तरह विकसित नहीं हो पाती। यह एक साधारण व्यक्ति के असाधारण बनने की कहानी है—लेकिन यह सफलता का रोमांटिक महिमामंडन नहीं करती, बल्कि उसके पीछे छिपी सामाजिक और नैतिक कीमत को भी उजागर करती है। नायक ब्रज भट्टी (विजय वर्मा) एक निम्न-मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि से आता है। उसकी महत्वाकांक्षा केवल अमीर बनने की नहीं है—बल्कि वह उस व्यवस्था को चुनौती देना चाहता है, जिसमें अवसर सीमित हैं। मटका का खेल इस चुनौती का माध्यम बनता है। यहाँ कथा का सबसे बड़ा गुण यह है कि यह केवल अपराध की कहानी नहीं रहती—यह एक सामाजिक रूपक बन जाती है। मटका केवल जुआ नहीं, बल्कि आशा और भ्रम का मिश्रण है। आम आदमी के लिए यह व्यवस्था के खिलाफ एक छोटा विद्रोह बन जाता है। लेकिन यही विद्रोह अंततः उसे नैतिक पतन की ओर भी ले जाता है।
सफलता बनाम नैतिकता
इस तरह यह वेब सीरीज़ एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है— क्या आर्थिक सफलता नैतिकता से बड़ी हो सकती है? ‘मटका किंग’ का सबसे महत्वपूर्ण पहलू इसका सामाजिक संदर्भ है। यह सीरीज़ उस दौर को दिखाती है— जब स्वतंत्रता के बाद का भारत आर्थिक अस्थिरता से गुजर रहा था मजदूर वर्ग अवसरों की तलाश में था… अवैध अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे समाज में जगह बना रही थी। मटका का खेल केवल मनोरंजन नहीं था—यह एक समानांतर आर्थिक व्यवस्था बन गया था। इस दृष्टि से यह केवल अपराध कथा नहीं, बल्कि आर्थिक इतिहास का सांस्कृतिक पुनर्निर्माण भी है।
यह कहानी महत्वाकांक्षा की शक्ति, लालच की कीमत और सत्ता के आकर्षण का नतीजा दर्शाती है—व्यक्तिगत अकेलापन और सामाजिक स्वीकृति, सम्मान का अभाव। मटका किंग से पहले हर्षद मेहता और तेलगी पर बनी वेब सीरीज़ भी आ चुकी हैं। प्रतीक गांधी का स्टारडम मुख्यत: हर्षद मेहता की भूमिका की ही देन है। मटका किंग देखते समय स्कैम की याद आना स्वाभाविक है।
