Hindi Cinema

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प्रेमचंद और सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’

प्रेमचंद की ये कहानी जहां से शुरू होती है और जहां समाप्त होती है वो दो महत्वपूर्ण ऐतिहासिक बिंदु हैं। वो पहले बताते हैं कि क्यों हमारा देश गुलाम हुआ, लखनऊ की घटना, वाजिद अली शाह के समय में लखनऊ के माध्यम से, मीर और मिर्ज़ा के माध्यम से ये बताते हैं।

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टॉक सिनेमा ऑन द फ़्लोर– एक सार्थक शुरुआत

नई दिल्ली फिल्म फाउंडेशन (NDFF) की पहल ‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर’ के पहले आयोजन ने आयोजन ने न केवल सिनेमा प्रेमियों और नवोदित फिल्मकारों को जोड़ने का काम किया, बल्कि NDFF के ‘मेक सिनेमा’ जैसे सार्थक अभियानों की घोषणा के साथ एक नई सिनेमाई संस्कृति की दिशा में ठोस कदम भी बढ़ाया।

Vinod Tewari Book on film appreciation
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सिनेमा की समझ बेहतर करने वाली हिंदी किताब का लोकार्पण

आज के दौर में ऐसी पुस्तक की ज़रूरत और बढ़ गई है, जब फिल्म पत्रकारिता लगभग खत्म हो चुकी है या कह लें पीआर एक्सरसाइज़ में बदल चुकी है। किसी फिल्म की ईमानदार और निष्पक्ष समीक्षा देख-पढ़ पाना बेहद दुरूह हो चुका है। ऐसे में ज़रूरी है कि दर्शक सिनेमा को देखने समझने के अपने नज़रिए को समृद्ध करें, ताकि उन्हे बरगलाया न जा सके।

Shyam Benegal
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मसाला फिल्मों की मंडी में सार्थक सिनेमा का जुनून थे श्याम बेनेगल

श्याम बेनेगल से पहले  सत्यजित रे के जरिये भारतीय सिनेमा को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पहचान मिल चुकी थी लेकिन बेनेगल की फिल्मों ने नये संदर्भों में एक नये प्रगतिशील नज़रिये के साथ भारतीय समाज की कहानियों को, समाज में आ रहे बदलावों को, मध्य वर्ग को, सत्ता-व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष को और प्रतिरोध को पूरी दुनिया के सामने पेश किया और भारतीय सिनेमा की प्रतिष्ठा बढ़ायी। 

Priyanka Chopra
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अरब डायरी 2024 (6): फिल्म इंडस्ट्री में मेरा कोई गॉडफादर नहीं- प्रियंका चोपड़ा

जब अनुराग बसु ने ‘बर्फी’ की कहानी सुनाई तो पहले तो मुझे लगा कि यह रोल नहीं कर पाऊंगी, पर लहरों के खिलाफ जाना मेरी आदत बन चुकी थी। उन दिनों रणबीर कपूर न्यूयॉर्क में ‘अनजाना-अनजानी’ की शूटिंग कर रहे थे। मैं एक इवेंट में जाने की जल्दी में थी। अनुराग बसु ने कहा कि ठीक है, वे दूसरी फिल्म के लिए मुझसे बाद में मिलेंगे। मैंने उनसे पांच दिन का समय मांगा।

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सच्चे ‘जन कलाकार’ थे बलराज साहनी

बलराज साहनी ने केवल अभिनेता ही नहीं बल्कि एक अध्यापक, नाट्य लेखक-निर्देशक, रेडियो उद्घोषक, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता जैसे कई महत्वपूर्ण कार्यों को पूरी ईमानदारी के साथ किया। उनके भीतरी और बाहरी रूप में कोई अलगाव न था। देश और देश की जनता के लिए कुछ बेहतर और अच्छा करने की बेचैनी ने उन्हें लाहौर, शांतिनिकेशन, सेवाग्राम(वर्धा), लंदन, बंबई और न जाने कहाँ-कहाँ घुमाया, लेकिन इन सभी जगहों से एक कलाकार के रूप में उन्होंने बहुत कुछ पाया।

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ओटीटी कंटेंट में गंदगी पर बॉलीवुड भी बोलने लगा

खुलकर के गाली-गलौज और अश्लील संवादों का इस्तेमाल सबसे पहले फिल्मों में फिल्म निर्देशक अनुराग कश्यप ने न सिर्फ शुरू किया था, बल्कि ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ और ‘रियलिस्टिक क्रिएटिव टच’ के नाम पर इसको लगातार जस्टिफाई भी करते रहे।

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