
“AI फिल्मकारों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन्हें रीडिफाइन करेगा।” — इसी विचार के साथ टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के अप्रैल सत्र में सिनेमा और तकनीक के बदलते रिश्ते पर एक खुली, ईमानदार और ज़रूरी बातचीत हुई। Rucheka Chaudhry ने उदाहरण देकर, वीडियो दिखा कर और बताया कि कैसे AI अब सिर्फ एक टूल नहीं, बल्कि फिल्ममेकिंग के पूरे प्रोसेस का हिस्सा बनता जा रहा है — और क्यों इस बदलाव के साथ जिम्मेदारी और समझ भी उतनी ही जरूरी है।
शुरुआत: लोग, बातचीत और सिनेमा
नई दिल्ली में हुए टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के इस अप्रैल चैप्टर में वही बात फिर से महसूस हुई — कि सिनेमा सिर्फ स्क्रीन पर नहीं, लोगों के बीच भी बनता है।
सत्र की शुरुआत हमेशा की तरह एक warm, open introduction round से हुई। हर प्रतिभागी ने अपना नाम, अपना काम और सिनेमा से जुड़ा अपना रिश्ता साझा किया। कोई फिल्ममेकर था, कोई स्टूडेंट, कोई एक्टिंग में था, तो कोई सिर्फ सिनेमा को समझना चाहता था। यही mix इस मंच को अलग बनाता है।
New Delhi Film Foundation (NDFF) का यही मकसद है — एक ऐसा space बनाना जहाँ serious cinema पर बात हो, लोग जुड़ें, और धीरे-धीरे एक creative ecosystem तैयार हो।
बड़ी तस्वीर: दिल्ली, सिनेमा और ‘ऑरेंज इकोनॉमी’
NDFF के संस्थापक आशीष के सिंह ने बातचीत को एक बड़े संदर्भ में रखा। उन्होंने बताया कि आज दिल्ली में “ऑरेंज इकोनॉमी” को लेकर गंभीर बातचीत हो रही है — यानी creative industries को एक मजबूत आर्थिक ताकत के रूप में देखना।
उन्होंने हाल ही में हुए इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ दिल्ली के दौरान आयोजित high-level roundtable का जिक्र किया, जहाँ policy makers, industry और creators एक साथ आए। उनका साफ कहना था — अगर policy, skilling और creative community साथ आएं, तो दिल्ली सिर्फ location नहीं, बल्कि एक strong film hub बन सकती है।
और TCOTF जैसे मंच उसी दिशा में छोटे लेकिन जरूरी कदम हैं।
क्राफ्ट एंड क्रू: जब AI सिर्फ टूल नहीं, पार्टनर बनता है
अब बात उस सेगमेंट की, जिसका सभी को इंतज़ार था — Craft & Crew।

इस सत्र को lead किया Rucheka Chaudhry ने, और उन्होंने AI filmmaking को किसी heavy jargon के बिना, बहुत practical तरीके से समझाया।
उन्होंने शुरुआत ही इस लाइन से की —
“आज का फिल्मकार सिर्फ executor नहीं, explorer है।”
और यही पूरे सेशन का tone सेट कर गया।
उन्होंने step by step बताया कि AI filmmaking में कैसे काम आता है:
- Idea और story को visualise करने में
- Character और world build करने में
- Camera movement और shots plan करने में
- और even final visual output तक
उन्होंने अलग-अलग tools और workflows के बारे में बात की, लेकिन focus tools के नाम पर नहीं, बल्कि उनके use पर था — कि एक filmmaker उन्हें creatively कैसे use करे।
एक दिलचस्प बात उन्होंने ये कही कि आज अगर आप सिर्फ एक rough sketch भी बनाते हैं, तो AI उसे एक living character में बदल सकता है। इसका मतलब है — imagination और execution के बीच की दूरी बहुत कम हो गई है।

लेकिन यहीं पर उन्होंने एक pause भी लिया —
“जब सब कुछ real लगने लगे, तो trust कहाँ जाएगा?”
यह सवाल सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि ethical भी है।
उन्होंने साफ कहा कि technology जितनी तेजी से बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से creators के अंदर responsibility भी आनी चाहिए।
फिल्मकार की नई भूमिका
रुचिका ने एक और अहम बात कही —
पहले फिल्ममेकर के सामने constraints होते थे, खासकर बजट के। अब challenge उल्टा है — options इतने ज्यादा होंगे कि सही चुनाव करना मुश्किल होगा।
इसलिए आज का filmmaker सिर्फ storyteller नहीं, बल्कि decision maker भी है।
और अंत में उनका takeaway बहुत साफ था:
“AI filmmakers को replace नहीं करेगा, बल्कि redefine करेगा।”
यानी असली फर्क अब भी इंसान की समझ, संवेदना और नज़र ही तय करेगी।

Take the Floor: जब आइडिया सिर्फ आइडिया नहीं रहता
इसके बाद आया Take the Floor – 5 Minute Window।
यह छोटा सा segment है, लेकिन काफी powerful। यहाँ student तन्वी त्रिपाठी ने अपनी AI-based short film के लिए pitch किया और collaborators की तलाश रखी।
यही वो जगह है जहाँ TCOTF conversation से collaboration की तरफ बढ़ता है।
Showcase Your Work: अपना काम, अपनी पहचान
इस बार एक नया segment भी जोड़ा गया —
“Showcase Your Work — Let your cinema speak.”


और इसने सत्र में एक नई energy ला दी।
एक्टर-मॉडल पंकज कटारिया ने अपने recent काम और showreel share किए — ads से लेकर web series तक का सफर दिखाया।
वहीं host निवृति खत्री ने अपनी upcoming poetry book Scattered Thoughts के बारे में बात की — और ये भी याद किया कि इसी मंच पर उन्होंने पहली बार अपनी कविता पढ़ी थी।
यह छोटा सा moment इस बात का proof था कि यह मंच सिर्फ events नहीं, journeys भी बनाता है।

एक ठहराव: सत्यजित राय को याद करना
सत्र के अंत में एक जरूरी ठहराव आया —
भारतीय सिनेमा के लीजेंड Satyajit Ray को याद करने का।
उनकी फिल्म Hirak Rajar Deshe की कुछ झलकियाँ दिखाई गईं।
आशीष के सिंह ने अपने लेख से कुछ अंश पढ़ते हुए बताया कि यह फिल्म सिर्फ अपने समय की political satire नहीं थी, बल्कि आगे आने वाले समय के लिए एक तरह की cinematic warning भी थी।
AI और future की बातों के बीच यह tribute एक balance लेकर आया —
कि आगे बढ़ते हुए अपनी roots को याद रखना भी उतना ही जरूरी है।
अंत नहीं, आगे की शुरुआत
पूरे कार्यक्रम का संचालन बतौर होस्ट निवृत्ति खत्री ने किया जबकि टेक और प्रोडक्शन कृष गुप्ता ने संभाला। इवेंट कवरेज सिमरन, प्रियांशु चंद्रा और कृष्णा के जिम्मे रहा। पूरे कार्यक्रम के कोऑर्डिनेशन में शुभनव जैन, अनुराग कुमार और विवेक ने अहम भूमिका निभाई।
औपचारिक धन्यवाद के बाद networking tea का सिलसिला शुरू हुआ —
और वही असली TCOTF moment होता है।
लोग मिलते हैं, ideas discuss होते हैं, collaborations की शुरुआत होती है —
और कई बार यहीं से अगली कहानी जन्म लेती है।

आखिरी बात
Talk Cinema On The Floor अब सिर्फ एक discussion platform नहीं रह गया है।
यह धीरे-धीरे एक ऐसा space बन रहा है जहाँ:
- सिनेमा पर meaningful बातचीत होती है
- नए filmmakers को दिशा मिलती है
- और एक creative community आकार ले रही है
और शायद यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है।

Media Coverage



