ऋषि कपूर की चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी…

ऋषि कपूर की शख़्सियत में एक बच्चे की मासूमियत, शरारत, बेचैनी और जोश था। ‘बॉबी’ फ़िल्म से वह युवा दिलों की धड़कन बन गये थे। ‘बॉबी’ की कामयाबी ने ऋषि कपूर के लिए हिंदी सिनेमा में एक भले, भोले-भाले, मासूम, ख़ुशमिज़ाज, शरीफ़ शहरी नौजवान के किरदारों का जो साँचा तैयार किया, उनकी सारी अभिनय यात्रा लगभग उसी दायरे में घूमती रही। ऋषि कपूर की चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी।

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राज कपूर-नरगिस की फ़िल्म ‘श्री 420’ का बेहद लोकप्रिय रोमांटिक गाना ‘प्यार हुआ इक़रार हुआ’ याद करिये। गाने की आख़िरी कड़ी में इधर नरगिस के होंठों से लता की आवाज़ में बोल उभरते हैं – मैं न रहूँगी, तुम न रहोगे, फिर भी रहेंगी निशानियाँ, उधर, कैमरा नरगिस की आँख और उंगली के इशारे के साथ-साथ ही घूमता है और परदे पर फुटपाथ से गुज़र रहे तीन बच्चे नज़र आते हैं। 

रेनकोट पहने ये तीनों बच्चे राजकपूर की संतानें थीं- रणधीर कपूर, रितु कपूर और ऋषि कपूर। यह कैमरे पर ऋषि कपूर की पहली झलक थी। ऋषि बमुश्किल तब दो-ढाई साल के थे। इसके पीछे का किस्सा भी कुछ कम दिलचस्प नहीं है। खुद ऋषि कपूर ने अपनी बिंदास आत्मकथा ‘खुल्लमखुल्ला’ में इसका ज़िक्र किया है और यह काफी मज़ेदार है। 

Shree 420

ऋषि कपूर ने लिखा है – “हम तीनों को भारी बारिश के बीच से चलते हुए आना था। पानी बार-बार मेरी आँखों के भीतर आ रहा था और मुझे तकलीफ हो रही थी तो मैं रोने लगा और शूटिंग करने से इनकार कर दिया। आखिरकार नरगिस जी ने मेरे नखरों का इलाज ढूंढ लिया। हर री-टेक के वक्त वह मेरे आगे कैडबरी की मिल्क चॉकलेट लहरा देती थीं, इस वादे के साथ कि यह मुझे मिलेगी अगर मैंने ठीक वैसा ही किया जैसा मेरे पिता मुझसे चाहते थे।” 

ऋषि कपूर ने बाल कलाकार की हैसियत से अपने दादा और मशहूर कलाकार पृथ्वीराज कपूर के नाटक ‘दीवार’ में भी छोटा सा रोल किया था जो रंगमंच पर उनकी इकलौती भूमिका थी।

इसके बाद गोलमटोल, भरे-भरे गालों वाले ऋषि राजकपूर की एक और क्लासिक फ़िल्म ‘मेरा नाम जोकर’ में नज़र आये। इसमें उनकी भूमिका किशोरावस्था की थी जो अपनी टीचर सिमी ग्रेवाल के प्रति एक तीखा यौन आकर्षण महसूस करता है। उस छोटी सी लेकिन जटिल मनोभावों को दर्शाने वाली भूमिका के लिए ऋषि कपूर की प्रशंसा हुई और उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति वी.वी. गिरी के हाथों सर्वश्रेष्ठ बाल कलाकार का राष्ट्रीय पुरस्कार भी मिला। 

इस प्रशंसा के पीछे की घनघोर मेहनत और अपने पिता के सख्त निर्देशन की कहानी ऋषि कपूर ने अपनी आत्मकथा में बयान की है। एक दृश्य में उनकी मां का किरदार निभा रही अचला सचदेव को उन्हें थप्पड़ मारने थे। राजकपूर ने उस दृश्य के 8-9 रिटेक लिए। ऋषि कपूर ने लिखा है- “मेरे चेहरे पर नील पड़ गए थे और मैं ज़ार-ज़ार रो रहा था लेकिन मेरे पिता पर इसका कुछ असर नहीं पड़ा। वह निर्देशक पहले थे, पिता बाद में।” 

ऋषि कपूर की शख़्सियत में एक बच्चे की मासूमियत, शरारत, बेचैनी और जोश था। हिंदी सिनेमा में फ़िल्मों के हीरो यानि नायक की एक खास कैटेगरी के लिए एक विशेषण इस्तेमाल होता है – सदाबहार। मोहक व्यक्तित्व वाला ऐसा अभिनेता जिसकी मोहिनी लंबे समय तक कायम रहती है। ऋषि कपूर उसी श्रेणी के अभिनेता थे। 

देव आनंद के बाद यक़ीनन एक रोमांटिक हीरो के तौर पर ऋषि कपूर सबसे लंबी पारी खेलने वाले अभिनेता के रूप में याद किये जाएँगे।

Bobby

सत्तर के दशक में ‘बॉबी’ में डिंपल कपाड़िया के साथ शुरुआत करने से लेकर उन्होंने नब्बे के दशक में दिव्या भारती और उर्मिला मातोंडकर तक के साथ बतौर नायक काम किया। ‘बॉबी’ को हिंदी सिनेमा में एक कल्ट फ़िल्म का दर्जा हासिल है। उस फ़िल्म ने उस दौर की युवा पीढ़ी को तो दीवाना बनाया ही, नौजवान इश्क़ के मतवालेपन और बाग़ी तेवरों को एक कामयाब फ़ॉर्मूले की तरह सिनेमा में स्थापित कर दिया। 

वर्ग, जाति और धर्म की दीवारों को तोड़ कर परवान चढ़ने वाली यह प्रेम कहानी ख्वाजा अहमद अब्बास जैसे प्रगतिशील कथाकार की क़लम से निकली थी। 

‘बॉबी’ फ़िल्म में एक अमीर पूँजीपति का बेटा एक ग़रीब मछुआरे की बेटी को दिल दे बैठता है और अपने प्यार को हासिल करने के लिए अपने पारिवारिक परिवेश और पूँजीवादी जीवन मूल्यों के ख़िलाफ़ बग़ावत कर देता है। ‘बॉबी’ एक तरह से रोमियो-जूलियट की मिथकीय दास्तान का हिंदी सिनेमाई संस्करण थी जिसके अंत को राजकपूर ने दुखद न बनाकर सुखद रखा था। 

‘बॉबी’ फ़िल्म से ऋषि कपूर और डिंपल कपाड़िया युवा दिलों की धड़कन बन गये थे। ऋषि कपूर रॉक स्टार बन चुके थे। उनकी मोटरसाइकिल, चौड़े फ़्रेम का धूप का चश्मा, बेलबॉटम सब फ़ैशन स्टेटमेंट बन गये थे।

‘बॉबी’ की धमाकेदार कामयाबी के बाद डिंपल कपाड़िया राजेश खन्ना से शादी करके फ़िल्मी दुनिया से ग़ायब हो गईं और लौटीं तो ‘सागर’ में ऋषि कपूर के साथ ही। इधर, इस लंबे अरसे में ऋषि कपूर ने नीतू सिंह के साथ पर्दे पर भी कामयाब जोड़ी बनाई और असली जीवन में भी उन्हें अपना जोड़ीदार बना लिया। 

Kabhie Kabhie

ऋषि कपूर और नीतू सिंह की जोड़ी उस दौर की युवा पीढ़ी के लिए उन्मुक्त, बिंदास और जोशीली मोहब्बत का प्रतीक थी। आज की भाषा में कहें तो बहुत ‘हॉट’। फ़िल्म ‘खेल-खेल में’ इस जोड़ी पर फ़िल्माया गया गाना ‘खुल्लमखुल्ला प्यार करेंगे हम दोनों’ बहुत लोकप्रिय हुआ। ऋषि कपूर को यह गाना इतना पसंद था कि उन्होंने अपनी आत्मकथा का शीर्षक ‘खुल्लमखुल्ला’ इसी गाने के मुखड़े से लिया था। 

70 के दशक में जब ‘ज़ंजीर’ के साथ अमिताभ बच्चन के एंग्री यंग मैन का दौर शुरू हुआ तो उसके ग़ुस्सैल तेवरों के आगे सारे हीरो फीके पड़ने लगे थे। ऋषि कपूर ने अपनी रोमांटिक छवि की बदौलत एंग्री यंग मैन का सुकून भरा विकल्प पेश किया। 

मनमोहन देसाई की ‘अमर अकबर एंथनी’ से शुरू हुई अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर की जुगलबंदी मल्टी स्टार फ़िल्मों में कमाल की रही। ख़ुशमिज़ाज अकबर के किरदार को ऋषि कपूर ने इतना प्यारा बना दिया कि वह आज भी बेहद लोकप्रिय है।

Kapoor & Sons

दरअसल, देखा जाए तो ‘बॉबी’ की कामयाबी ने ऋषि कपूर के लिए हिंदी सिनेमा में एक भले, भोले-भाले, मासूम, ख़ुशमिज़ाज, शरीफ़ शहरी नौजवान के किरदारों का जो साँचा तैयार किया, उनकी सारी अभिनय यात्रा लगभग उसी दायरे में घूमती रही। ऋषि कपूर अपनी ज़्यादातर फ़िल्मों में एक जैसे बेहतरीन नज़र आते हैं। हालाँकि इस दोहराव की वजह से बाद के दौर में उन्हें काफी बोरियत होने लगी थी और अभिनय में ठहराव सा आने लगा था। 

भीतर के कलाकार की असंतुष्टि की यह बात ख़ुद ऋषि कपूर ने स्वीकार की थी। इसलिए चरित्र भूमिकाओं में उन्होंने अपने अभिनेता को नये सिरे से तराशा और सबको चौंका दिया। राजू चाचा के अधेड़ विधुर का किरदार एक नयी पारी की शुरुआत थी, जहाँ से ऋषि कपूर के भीतर के अनुभवी अभिनेता की परिपक्वता के दर्शन होने शुरू हुए। ‘दो दूनी चार’, ‘कपूर एंड सन्स’, ‘हम-तुम’, ‘लव आज कल’, ‘102 नॉट आउट’ और ‘मुल्क’ ऐसी ही कुछ फिल्मों के नाम हैं। 

Agneepath

‘अग्निपथ’ में खलनायक रऊफ़ लाला का किरदार ऋषि कपूर की पुरानी चॉकलेटी हीरो वाली छवि के ठीक उलट था जिसमें उनकी अभिनय क्षमता का अब तक छुपा पहलू नज़र आया और लोग वाह-वाह कर उठे।

कलाकार दैहिक अवसान के बाद भी जीवित रहते हैं। हिंदी सिनेमा में स्टार पुत्रों का सिलसिला पृथ्वीराज कपूर के तीन बेटों राज कपूर, शम्मी कपूर और शशि कपूर से शुरू हुआ था जिन्होंने अपने पिता के नाम के साथ-साथ अपनी प्रतिभा के बूते पर भी अलग से ऊंचाइयां हासिल कीं और नामवर हुए। ऋषि कपूर उसी परंपरा की चमकदार कड़ी थे। वह चमक कभी फीकी नहीं पड़ेगी।

साभार: सत्य हिंदी

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