गोविंद निहलानी के बहाने ‘अर्धसत्य’ की बात

Ajay Chandravanshi
Ajay Chandravanshi

19 दिसंबर को भारतीय सिनेमा के सबसे संजीदा निर्देशकों में गिने जाने वाले गोविंद निहलानी का जन्मदिन होता है और इस मौके पर उनके बहाने उनकी फिल्म अर्धसत्य की बात सिनेमा के साहित्य की समीक्षा में अजय चंद्रवंशी की कलम से। इस सीरीज़ के बारे में एक बार फिर बता दें कि सिनेमा साहित्य से बनता है और वो अपने आप में भी एक साहित्य है। सो फिल्मों की समीक्षा जब होती है, तो फिल्ममेकिंग के सभी पक्षों पर बात होती है… लेकिनअक्सर कथानक और कथ्य के उद्देश्य और साहित्यिक पक्ष पर विस्तृत चर्चा की जगह नहीं निकल पाती… । हमने सिनेमा के साहित्य की समीक्षा के नाम से चुनिंदा फिल्मों की कुछ अलग किस्म की समीक्षाओं की सीरीज़ शुरु की है, जो उनके कथानक और उनमें अंतर्निहित साहित्य को लेकर लिखी गई हैं। लेखक-समीक्षक अजय चंद्रवंशी बतौर शिक्षा अधिकारी कवर्धा, छत्तीसगढ़ में कार्यरत हैं। इस बार बात गोविंद निहलानी की फिल्म अर्धसत्य (1983) की, जिसने अपने सशक्त शिल्प और संवेदनशील पटकथा-निर्देशन के चलते न सिर्फ कई अवॉर्ड पाए बल्कि आम और खास लोगों के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय जगत में भी काफी पसंद की गयी।

फिल्मों में सामान्यतः पुलिस की छवि यथार्थपरक नहीं होती। अतिरंजित ढंग से या तो उसे अत्यंत ‘पतित’ दिखाया जाता है,अथवा ‘सुपर हीरो सिंघम’। जबकि तमाम संस्थाओं की तरह इसके भी विचलन और उपलब्धियां हैं। इतना अवश्य है आज भी आम जनता इससे ‘दूर रहना’ ही पसंद करती है। जाहिर है इसे संस्था की असफलता ही कहा जाएगा।

भारतीय पुलिस व्यवस्था अधिकांश संस्थाओं की तरह ब्रिटिश मॉडल का ही अनुकरण रहा है। आज़ादी के बाद भी इसमे व्यापक बदलाव के लक्षण नहीं दखाई पड़ते।बावजूद इसके, संवैधानिक और कानूनी प्रावधानों से इसके अधिकार और सीमाओं को निर्धारित किया गया है। फिर भी सैद्धांतिक और व्यावहारिक अनुभव में फांक स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं।

यदि मोटे तौर पर आजादी के बाद के दौर को ही लिया जाय तो तमाम प्रगति के बावजूद संस्थाएं उन लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सकी हैं, जिसकी कल्पना की गई थी। भौतिक संसाधनों का विकास तो खूब हुआ मगर मूल्यों में क्षरण स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। अधिकतम आर्थिक सफलता को अधिकतम योग्यता का मापदंड स्वीकार कर लेने से व्यक्तिवाद, स्वार्थ, भ्रष्टाचार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।दूसरी बात पदों के जन निर्भरता नहीं रहने से ‘जनता के सेवक’ ‘जनता के मालिक’ होते चले गए।यह विडम्बना है कि ‘लोक सेवक’ इस पर शर्मिंदा नहीं गौरवान्वित होता है।

हमारे कहने का यह अर्थ नही कि पहले हर चीज अच्छी थी और आज हर चीज ख़राब है।पहले और आज का कोई विश्वसनीय तुलनात्मक अध्ययन न हो तब भी आज के भयावह भ्रष्टाचार और अपराध से कोई इंकार नहीं कर सकता। इन प्रवृत्तियों पर राजनीतिक हस्तक्षेप और संरक्षण के उदाहरण भी स्पष्ट होते रहे हैं।

चूंकि पुलिस का सीधा सम्बन्ध अपराध नियंत्रण से है, इसलिए इसका थोड़ा भी विचलन समाज के लिए अत्यधिक अहितकर होता है। इधर पुलिस से लेकर न्यायिक व्यवस्था तक राजनीतिक हस्तक्षेप के उदाहरण बढ़े हैं। ऐसे में इस सिस्टम में ईमानदारी से कार्य करने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों की मुश्किलों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

Pic courtesy: Mid-Day

फ़िल्म ‘अर्धसत्य‘ का सब इंस्पेक्टर ‘अनंत वेलणकर’ एक सम्वेदनशील और ईमानदार अधिकारी है। उसके व्यक्तित्व में चालाकी नहीं है, अपितु कस्बाई खिलंदड़ पन है। यों वह पुलिस में आना नहीं चाहता था मगर पिता के दबाव के कारण यहां आया है। पिता का चरित्र एक तरह से सामंती है। पत्नी को बात-बात पर पीटते हैं, मानो यह उनका नैसर्गिक ‘अधिकार’ है! बेटे पर भी इसी तरह का अधिकार चाहते हैं,उसके जीवन के फैसले ख़ुद लेना चाहते हैं।इस तरह अनंत स्वेच्छा से नहीं पिता की इच्छा से पुलिस में आया है।

बावजूद इसके वह नाख़ुश नहीं है और अपना काम अच्छे से करने की कोशिश करता है। वह असामाजिक तत्वों और गैर-कानूनी कार्यों को बर्दाश्त नहीं कर पाता और उचित कार्यवाही करता है। लेकिन दिक्कत तब आती है जब वह ‘पहुँच वाले’ अपराधियों पर हाथ डालता है। ये अपराधी सफेदपोश भी हैं और राजनीति से साठ-गांठ के चलते ‘जनप्रतिनिधि’ भी बन जाते हैं। अनंत इसे जानता तो है मगर अपनी स्वभाविक वृत्ति के तहत इसे स्वीकार नहीं कर पाता और उसे बार-बार अपमानित होना पड़ता है। भ्रष्टाचार का आलम यह है कि उसके द्वारा जान जोखिम में डालकर किये कार्यों का मेडल दूसरों को मिलता है।

उसके मन में हताशा और व्यवस्था के प्रति आक्रोश भरते जाता है, जो दूसरे रूपों में निकलने लगता है। मसलन वह अत्यधिक शराब पीने लगता है, लॉक अप में एक कैदी को इतना मारता है कि उसकी मृत्यु हो जाती है। यह कृत्य जैसे उससे बेहोशी में होता है। परिणाम उसे निलंबित कर दिया जाता है।

निलंबन और जाँच की जटिलता और बदनामी कैसे होती है उसे एक चरित्र ‘माइक लोबो’ के माध्यम से दिखाया गया है। वह भी ईमानदार पुलिस अधिकारी रहा है जिसके कारण आज निलंबित है और दर-बदर की ठोकर खाते नशे में धुत्त पड़ा रहता है, और अंततः मर जाता है। भूमिका छोटी है मगर सांकेतिक रूप से महत्वपूर्ण है। अनंत से बीच-बीच उसका क्षणिक मुलाकात मानो अनंत की नियति का पूर्वाभास है।

मगर अनंत ‘माइक लोबो’ नहीं होना चाहता। वह निलंबन वापसी के लिए ‘व्यावहारिक’ रास्ते की तलाश में ‘रामा शेट्टी’ से मिलता है, जो सफेदपोश अपराधी है। वह रामा से नफरत करता है,उसके कारण ज़लील भी हुआ है मगर विडम्बना उसके दर पर ले आयी है। मगर यहां वह रामा से केवल सौदा करने आया था, काम के बदले पैसे से। लेकिन रामा के व्यवहार से उसका आहत स्वभिमान जाग जाता है और वह उसके ‘पालतू कुत्ता’ बनने के बदले उसकी हत्या कर देता है। और इस तरह थाने में उसके समर्पण के साथ फ़िल्म समाप्त हो जाती है।

अनंत के व्यक्तित्व को समझने में एक समानांतर कहानी ‘ज्योत्स्ना’ के साथ उसका प्रेम प्रसंग है। दोनो स्वतंत्र चेता और एक दूसरे के व्यक्तित्व का सम्मान करते हैं।कहीं कोई प्रेम का इज़हार नहीं मगर मिलने-जुलने से अंतरंगता बढ़ती जाती है। ज्योत्स्ना इसके व्यवहार के ‘तीव्र आक्रोश’ को महसूसती है मगर उसके व्यक्तित्व के द्वंद्व को बहुत देर में समझती है। वह एक हद तक पुलिस के अतिरंजित नकारात्मक पहलू पर ही अधिक ध्यान देती है। उनके काम की विषम परिस्थितियों पर कम ध्यान देती है।

अनंत दूसरों की इच्छाओं को समझता है, मगर हालात ऐसे होते जाते हैं कि उससे मुक्ति स्थिर समर्पण में ही हो सकती है। मगर उसके व्यक्तित्व का स्वाभिमान वह रास्ता चुन ही नहीं सकता था। उसके व्यक्तित्व के इस पहलू को समझने में उसके परिवार की संक्षिप्त झलक मददगार है। पिता सामंती चरित्र का ‘व्यावहारिक’ व्यक्ति है। पत्नी को पिटता है। बच्चे की इच्छा-अनिच्छा का कोई परवाह नहीं करता। इन सब कारणों से अनंत के व्यक्तित्व में पिता के प्रति अव्यक्त आक्रोश भर जाता है, जो बाद में फूट पड़ता है।

इस तरह विभिन्न कारणों से अनंत का जो व्यक्तित्व है वह थोड़ा आक्रमक जरूर है, नकारात्मक नहीं है। नकारात्मक तो व्यवस्था है,और उसका एकांगी आकलन है। यही ‘अर्धसत्य’ है जो एकांगी तर्क पर आधारित होता है। यहां संदर्भ पुलिस व्यवस्था है जिसमें कार्यरत कर्मचारियों के प्रति एकांगी नकारात्मक निष्कर्ष उनके हालात और व्यवस्था के द्वंद्व को समझे बिना निकाल लिया जाता है।
फ़िल्म में दिलीप चित्रे की कविता ‘अर्धसत्य’ का सार्थक प्रयोग है जिसकी आखरी पंक्तियां हैं-

एक पलड़े में नंपुसकता
एक पलड़े में पौरुष
और ठीक तराजू के कांटे पर
अर्धसत्य

कहीं हम सब जिसे सत्य मानते रहे हैं, सत्याभाष अथवा अर्धसत्य तो नही? किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले एक बार जरूर सोच लेना चाहिए, क्योंकि इधर असत्य का मायाजाल इसकदर बिछ चुका है कि सत्य तो क्या अर्धसत्य तक पहुंच पाना कठिन है

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