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40 साल पहले की ‘सुबह’ में झलकता आज का सच

फ़िल्म ‘सुबह’ की ‘सावित्री’ का द्वंद्व इसी अस्मिता और पारिवारिकता के बीच सामंजस्य का है। वह जितना अपनी अस्मिता के प्रति सचेत है उतना ही अपने परिवार से प्रेम भी करती है। मगर विडम्बना कि…

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निर्देशक राज कपूर मेरे आदर्श हैं, अभिनेता राज कपूर नही – रणबीर कपूर

‘एक कलाकार के लिए कोई बाउंड्री नहीं होती। मैं पाकिस्तानी फिल्म इंडस्ट्री को बधाई देता हूं कि उन्होंने ‘मौला जाट’ जैसी सुपरहिट फिल्म बनाई। पिछले कई सालों में ऐसी फिल्म हमने नहीं देखी।’ – रणबीर कपूर

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याद-ए-साहिर बरास्ते ‘ख़ूबसूरत मोड़’: ‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’

वह कहानी जिसको पूर्णता प्रदान करना सम्भव न हो उसे ‘एक ख़ूबसूरत मोड़’ देना बेहतर होता है। ज़ाहिर है जिस रिश्ते को किसी ‘नाम’ के अंजाम तक न पहुँचाया जा सके समाज मे उसकी कोई ‘मान्यता’ नहीं होती, इसलिये उस ‘रिश्ते’ को तोड़ देना ही अच्छा होता है।

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‘गमन’ : इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है?

शहर उतना दे नहीं पा रहा जितनी उम्मीद थी। यहाँ बेहतर भविष्य केवल सपना है। हक़ीकत चंद लोगों के लिए है। वह टैक्सी में इन ‘चंद लोगों’ की दुनिया देखता है,उनकी अट्टालिकाएं देखता है, और दूसरी तरफ सड़कों में बसर कर रहे लोगों को देखता है, मगर दिल है कि मानता नहीं! लगता है कुछ हो जाएगा।

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सुसमन: आत्मा की चादर बीनने की दारुण दुख गाथा

श्याम बेनेगल की इस फिल्म में ‘रामुलु’ एक कुशल बुनकर है पर उस का हुनर केवल प्रतिष्ठा की बात रह गयी है, वह रोटी नहीं दे पाती। वह कपड़े बुनता है मगर अपनी बेटी के लिए साड़ी बुन सके उसके लिए धागे नहीं है।

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किरदार और कहानी से गढ़ी एक ‘भूमिका’

फ़िल्म ‘भूमिका’ आजादी के पूर्व और बाद के दो दशकों में एक स्त्री के व्यावसायिक सफलता मगर मानवीय चाह की असफलता के द्वंद्व को रेखांकित करती है।

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वोदका लेमन: बिना विकल्पों वाले जीवन के सफ़र का संगीत

विश्व के सिनेमाई सौंदर्य के गुह्य रस्म-रिवाज़ सीरीज़ की चौथी और अंतिम कड़ी के तौर पर प्रस्तुत है आर्मीनियाई फिल्मकार हिनर सलीम

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The Bow: मुक्त होने और मुक्त करने का सम्मोहन

‘विश्व के सिनेमाई सौंदर्य के गुह्य रस्म-रिवाज’ सीरीज़ के तीसरे भाग के तौर पर प्रख्यात दक्षिण कोरियाई फिल्म निर्देशक किम की-डुक की फिल्म ‘द बो’ की समीक्षा

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