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धरती को आकाश पुकारे: शरद दत्त का महाप्रयाण

प्रसिद्ध शायर-गीतकार साहिर लुधियानवी पर उन्होंने दो माह पूर्व ही पुस्तक लेखन का कार्य सम्पन्न किया था। इस बारे में बात करते हुए उन्होंने मुझे कहा था कि साहिर पर पुस्तक पूरी हो गयी है और मुझे अपने भीतर जिस संतुष्टि की अनुभूति हो रही है उससे मैं बड़ा आनन्दित हूँ। एक लेखक जब अपनी किसी कृति को लेकर इस प्रकार सन्तोष का अनुभव कर रहा हो तो उसके इस कार्य की गुणवत्ता को सहज ही समझा जा सकता है। शरद दत्त के निधन के पश्चात् यह पुस्तक प्रकाशित होगी इसका भान तब किसे था?

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ऑस्कर 2023: विश्व सिनेमा की पांच महत्वपूर्ण फिल्में

सुखद आश्चर्य है कि हमेशा की तरह इस बार प्रतिष्ठित 75 वें कान फिल्म समारोह के ऑफिशियल सेलेक्शन में दिखाई गई फिल्मों को एकेडमी अवॉर्ड की 16 श्रेणियों में कुल 21 नॉमिनेशन मिले हैं। इसमें बेस्ट इंटरनेशनल फिल्म से लेकर मुख्य प्रतियोगिताओं की कई श्रेणियां शामिल हैं।

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हीरो, हीरोइन… और प्राण

पर्दे पर प्राण की असरदार मौजूदगी की वजह से ही फिल्मों के पोस्टर पर हीरो, हीरोइन के साथ उनके नाम का अलग से ज़िक्र ज़रुर होता था जो हिंदी में ‘…और प्राण’ या अंग्रेज़ी में ‘…and Pran’ के तौर पर लिखा होता। #Pran

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भारतीय फिल्मों में त्रयी परंपरा और बुद्धदेब बाबू

कवि, प्रोफेसर और फिल्मकार, बुद्धदेव दासगुप्ता समकालीन भारत की सबसे अहम सिनेमाई आवाजों में से थे। उनके पास कल्पना थी, एक कवि की गीतात्मकता थी और इसे सिनेमा में बदलने का हुनर था।

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पठान: राष्ट्रवाद के टेंपलेट वाला एक ‘छद्म सिनेमा’

सिनेमा अगर केवल तकनीकी फार्मूलों वाली वीडियो गेमिंग व डिब्बाबंद फूड का रूप ग्रहण कर ले, मनोरंजन को तकनीक की ‘अनरियल’ धमाचौकड़ी में बदल डाले तो समाज को उसका उपभोक्ता बनने से पहले सोचना चाहिए, न कि आठ सौ करोड़ का बिजनेस थमा देना चाहिए।

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वाणी जयराम : थम गईं पांच दशकों की एक प्यारी-सी आवाज़

दक्षिण भारत के सुरीले संगीत की मिठास को अपनी आवाज़ के ज़रिए हिंदी सिनेमा संगीत में पहुंचाने वाली संभवत: पहली गायिका थीं वाणी जयराम।

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2022: बंबइया सिनेमा के तिलिस्म टूटने का साल

दरअसल, डबिंग और सबटाइटिल्स की सुविधा के साथ अब हिंदी का दर्शक न सिर्फ भारत की सभी भाषाओं के मनोरंजन का आनंद ले सकता है, बल्कि तमाम विदेशी कहानियाँ भी उसके लिए सहज हो गई हैं। निर्माताओं को भारत के विशाल बहुभाषी दर्शक वर्ग की निरंतर बढ़ती भूख में अपने मुनाफ़े का अहसास हो चुका है।

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आनंद : लंबी नहीं… बड़ी जिंदगी

‘आनंद’ फ़िल्म का नायक आनंद(राजेश खन्ना) ‘भरपूर जीवन जीने’ का उदाहरण है। वह गंभीर बीमारी(कैंसर) से ग्रसित है और उसे मालूम है कि तीन माह से अधिक उसकी जिंदगी नहीं बची है,फिर भी वह जैसे मौत की हँसी उड़ाता है। मौत आएगी तब आएगी अभी से उसका ग़म क्या!

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सिनेमा में ‘आवारा’ और उसकी दुनिया का विमर्श

फ़िल्म ‘आवारा ‘ के जज ‘रघुनाथ’ समाज से विद्रोह करके एक ‘विधवा’ से शादी करते हैं मगर पत्नी के एक डाकू द्वारा अपहरण कर लेने के बाद वापिस आने पर उसे घर मे नहीं रख पाते। ‘लोकोपवाद’ का भय उन पर इस कदर हावी है उनकी प्रारम्भिक ‘प्रगतिशीलता’ हवा हो जाती है और अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल देते हैं।

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