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Review of Mimi
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मिमी: सपनों के सौदे की कहानी, सरोगेसी की ज़ुबानी

कृति सानन और पंकज त्रिपाठी की फिल्म मिमी मातृत्व के संवेदनशील विषय को सरोगेसी यानि किराये की कोख के इर्दगिर्द रची गयी कहानी के ज़रिये हल्केफुल्के ढंग से कहती है।

Amtaabh Srivastava
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मालिक: समाज-सियासत का अक्स दिखाती फ़हद फ़ासिल की ‘आंखें’

आंखों से बेहतरीन अभिनय कैसे किया जाता है, फहाद लगातार उस कला में ख़ुद को फ़िल्म दर फ़िल्म मांजते हुए ‘मलिक’ में महारथी की तरह उभरे हैं। इरफान की अनुपस्थिति से ख़ाली हुई जगह को भरने की क्षमता है उनमें।

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नाम में क्या रखा है : दिलीप कुमार के बहाने

हिंदुस्तानी सिनेमा की जो धर्मनिरपेक्षता और साझा संस्कृति की परंपरा रही है, दिलीप कुमार उसी परंपरा के महान आइकन हैं क्योंकि वे जितने दिलीप कुमार हैं, उतने ही यूसुफ खान भी हैं। वे जितने देवदास हैं, उतने ही शहज़ादा सलीम भी हैं, जितने मुंबई के हैं, उतने ही पेशावर के भी हैं और जितने उर्दू के हैं, उतने ही हिंदी के हैं

Alok Nandan
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गुरुदत्त के बिना वर्ल्ड सिनेमा की बात करना बेमानी है

फ्रेंच न्यू वेव के संचालकों की तरह ही गुरुदत्त ने भी सेकेंड वर्ल्ड वॉर के प्रभाव को करीब से देखा था। अलमोड़ा का उदय शंकर इंडियन कल्चरल सेंटर 1944 में गुरुदत्त के सामने ही सेकेंड वर्ल्ड वॉर के चलते बंद हुआ था। गुरुदत्त यहां पर 1941 से स्कॉलरशिप पर एक छात्र के रूप में रहे थे। बाद में मुंबई में बेरोजगारी के दौरान उन्होंने आत्मकथात्मक फिल्म प्यासा लिखी। इस फिल्म का वास्तविक नाम कशमकश था।

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