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नाम में क्या रखा है : दिलीप कुमार के बहाने

हिंदुस्तानी सिनेमा की जो धर्मनिरपेक्षता और साझा संस्कृति की परंपरा रही है, दिलीप कुमार उसी परंपरा के महान आइकन हैं क्योंकि वे जितने दिलीप कुमार हैं, उतने ही यूसुफ खान भी हैं। वे जितने देवदास हैं, उतने ही शहज़ादा सलीम भी हैं, जितने मुंबई के हैं, उतने ही पेशावर के भी हैं और जितने उर्दू के हैं, उतने ही हिंदी के हैं

Alok Nandan
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गुरुदत्त के बिना वर्ल्ड सिनेमा की बात करना बेमानी है

फ्रेंच न्यू वेव के संचालकों की तरह ही गुरुदत्त ने भी सेकेंड वर्ल्ड वॉर के प्रभाव को करीब से देखा था। अलमोड़ा का उदय शंकर इंडियन कल्चरल सेंटर 1944 में गुरुदत्त के सामने ही सेकेंड वर्ल्ड वॉर के चलते बंद हुआ था। गुरुदत्त यहां पर 1941 से स्कॉलरशिप पर एक छात्र के रूप में रहे थे। बाद में मुंबई में बेरोजगारी के दौरान उन्होंने आत्मकथात्मक फिल्म प्यासा लिखी। इस फिल्म का वास्तविक नाम कशमकश था।

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ग्रहण: ‘चौरासी’ के ज़रिए नफरत की राजनीति पर टिप्पणी

डिज़्नी-हाॅटस्टार पर आई आठ क़िस्तों की सीरीज़ ‘चौरासी’ नई हिंदी के युवा उपन्यासकार सत्या व्यास के चर्चित उपन्यास चौरासी पर आधारित है। उपन्यास और ये सीरीज़ अस्सी के दशक में पंजाब में हिंसा की घटनाओं और इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में हुए सिख विरोधी दंगों की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

Rachit Raj
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Sherni: A Film Protecting A Bleak Hope Amid Chaotic Madness

The film is not marked by which ideological standpoint wins in the end of the film, instead it is about how the viewers see a savage tigress. In the hands of a lesser filmmaker, Sherni could have been a survival drama. But the film as we see it is more of a cautionary tale. It is a story that begs one to question what we strive for.

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