Indian Cinema

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जॉन अब्राहम: बेबाक जन-सिनेमा के अमर विद्रोही फिल्मकार

76वें कान फिल्म फेस्टिवल (Cannes Film Festival) में जॉन अब्राहम की अंतिम फिल्म ‘अम्मा अरियन’ की विशेष स्क्रीनिंग आयोजित की गई। भारतीय या वैश्विक सिनेमा के इतिहास में ऐसे बहुत कम फिल्मकार हुए हैं जो अपने जीवनकाल के बाद भी जॉन अब्राहम की तरह एक जीवंत किंवदंती बने रहे। इसका कारण केवल उनकी फिल्में नहीं, बल्कि नए सिनेमा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता और जुनून था जिसने आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित किया।

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मृणाल सेन: हमें इतिहास को बार-बार नए सिरे से पढ़ना होगा

अपनी फ़िल्मों के बारे में ख़ुद मृणाल सेन का कहना था, ‘‘ग़रीबी, सूखा, अकाल और सामाजिक अन्याय मेरे समय का यथार्थ है, एक फ़िल्म निर्देशक की हैसियत से मेरी फ़िल्में इन्हें समझने और उनके कारण जानने का माध्यम हैं।’’ मृणाल सेन देश में ‘न्यू वेव सिनेमा’ आंदोलन या समानांतर सिनेमा के भी जनक माने जाते हैं। उनकी फ़िल्मों में सामाजिक यथार्थ तो है ही, ग़ौर से अगर इन्हें देखें, तो यह प्रतिबद्ध राजनीतिक फ़िल्में भी हैं।

Kaifi Azmi
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कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि: कलम से इंक़लाब लिखने वाला शायर

तरक़्क़ीपसंद तहरीक के अगुआ कैफ़ी आज़मी की पुण्यतिथि पर ज़ाहिद खान का लेख: शायरी, सिनेमा और इंक़लाब की दास्तान। ‘मकान’ से ‘आवारा सज्दे’ तक।

Satyajit Ray
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सत्यजित राय: ‘भारतीय फ़िल्मकार को जीवन, यथार्थ की ओर मुड़ना होगा’

सत्यजित राय मानवीय संवेदनाओं के चितेरे थे। जिन्होंने सेल्युलाइड पर अपनी फ़िल्मों से कई बार करिश्मा किया। उन्होंने हमेशा कलात्मक और यथार्थवादी शैली की ही फ़िल्में बनाईं। व्यावसायिक फ़िल्मों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। व्यावसायिक फ़िल्मों के बारे में उनका ख़याल था, ‘‘व्यावसायिक फ़िल्मों की कोई जड़ नहीं होती। वे झूठी होती हैं, एकदम ढाली गयीं, किसी गढ़े हुए संसार में लिप्त।’’

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सभी भूमिकाओं में श्रेष्ठ थे  बलराज- परीक्षित साहनी

डैड ने 1938 में एक साल के लिए महात्मा गाँधी के साथ सेवाग्राम में काम किया था। अगले साल उन्हें अन्य देशों में युद्धरत भारतीय सैनिकों के लिए हिंदी में कार्यक्रम प्रसारित करने के लिए भारत-भूमि को छोड़कर इंग्लैण्ड की उड़ान भरने के लिए कहा गया। डैड पल-भर के लिए भी नहीं झिझके। वह परिवार के किसी भी सदस्य से अलग थे। वे हमेशा नई-नई ख़तरनाक चुनौतियों की तलाश में रहते थे।

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एक इंडो-फ्रेंच लव स्टोरी का फ्रांस में ‘निर्वाण’

कान फिल्म फेस्टिवल के ठीक बाद फ्रांस में एक ऐसा अनोखा फिल्म फेस्टिवल होता है जो भारतीय संस्कृति और भारतीय सिनेमा को समर्पित है। दक्षिणी फ्रांस के समुद्री शहर सेंट ट्रोपे में भारतीय संस्कृति का निर्वाण फिल्म फेस्टिवल होना बहुत मायने रखता है।

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