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पंचायत सीज़न 2: ‘फुलेरा’ में दिल लगने की दिलचस्प दास्तान

जब आप कहानी के पात्रों के अभिनय को अभिनय समझना बंद कर दें, काल्पनिक गांव की गलियों से वाकिफ़ हो जाएं, जब पात्रों द्वारा कहे गए संवाद आपके हृदय में भी वही समान भाव उत्पन्न कर दें, तब समझ लीजिए कि निर्देशक ने अपना काम पूरी निष्ठा और कुशलता से किया है।

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पंचलाइट की रोशनी में ‘पंचायत’

‘पंचायत’ में गांव की सुबह 9 बजे वाली दोपहर का भी ज़िक्र है, शाम 7 बजे के सन्नाटे का भी और दो रुपए पीस बिकने वाले पेठे का भी। गांव के बाहर वाले पेड़ का भूत भी है, शादी में रुठ जाने वाला कमसिन उमर का शौकीन दूल्हा भी और रिंकिया के पापा यानी प्रधान-पति भी हैं। पंचायत में गांव के सारे बिंब उनको मनोरंजक बनाने वाली नज़र के साथ पेश किए गए हैं और यही वजह है कि इसे देखते हुए हिंदी के पाठकों को श्रीलाल शुक्ला के कालजयी उपन्यास ‘राग दरबारी’ की याद हो आएगी।

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