Sri Aurobindo Centre for Arts and Creativity

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TCOTF July Chapter: Visual Storytelling, Delhi Cinema Culture & Four Generations

Thoughts and tips on visual storytelling by acclaimed cinematographer Koustabh Mukherjee, emerged as one of the key takeaways from the July Chapter of Talk Cinema On The Floor (TCOTF). Veteran cinephile and cinema scholar Sandeep Pahwa, meanwhile, offered a fascinating view of how Indian audiences and cinema-going culture have changed—from the era of single-screen theatres to today’s OTT age, in the Ju;y Chapter of Talk Cinema on the Floor.

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विजुअल स्टोरीटेलिंग से दिल्ली की सिनेमा संस्कृति तक: TCOTF जुलाई चैप्टर

Talk Cinema on the Floor के July Chapter में जाने माने सिनेमैटोग्राफर कौस्तुभ मुखर्जी की विजुअल स्टोरीटेलिंग के बताए तरीके और टिप्स TCOTF के इस सत्र की सबसे बड़ी सीख बनकर उभरी। वहीं वरिष्ठ सिनेविद् संदीप पाहवा ने सिंगल स्क्रीन थिएटरों से लेकर OTT के दौर तक भारतीय दर्शकों की बदलती संस्कृति की ऐसी तस्वीर खींची, जिसने सिनेमा को सिर्फ फिल्मों की नहीं, बल्कि समाज की कहानी बना दिया।

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नॉर्थ ईस्ट के सिनेमा से रील्स में सिनेमा तक: TCOTF जून चैप्टर में रचनात्मक संवाद का नया अध्याय

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्मकार उत्पल बोरपुजारी और वरिष्ठ फोटोग्राफर श्याम प्रसाद की उपस्थिति में आयोजित Talk Cinema On The Floor (TCOTF) का जून चैप्टर कई मायनों में विशेष रहा। एक ओर उत्तर-पूर्व भारतीय सिनेमा की नई पहचान और संभावनाओं पर गंभीर चर्चा हुई, तो दूसरी ओर “Cinema on Reels” के माध्यम से डिजिटल दौर में सिनेमाई मूल्यों की प्रासंगिकता पर सार्थक संवाद सामने आया।

Filmmaking with AI
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AI के दौर में फिल्ममेकिंग: TCOTF में नई सीख, नए सवाल, नई संभावनाएं

“AI फिल्मकारों को रिप्लेस नहीं करेगा, बल्कि उन्हें रीडिफाइन करेगा।” इस अहम सार के साथ टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर के अप्रैल सत्र आयोजित किया गया, जिसमें सिनेमा और तकनीक के बदलते रिश्ते पर बातचीत के साथ-साथ सीखने-सिखाने का भी दिलचस्प सत्र चला।

Talk Cinema on the Floor
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सिनेमा, ‘साइंटिस्ट’और संवाद: दिल्ली में ‘टॉक सिनेमा- मार्च चैप्टर’

‘टॉक सिनेमा ऑन द फ्लोर’ सिर्फ़ फ़िल्में दिखाने या उन पर चर्चा करने तक सीमित नहीं है। यह एक ऐसा स्पेस बनाने के बारे में है जहां सिनेमा लोगों को साथ लाने का ज़रिया बन जाए — और जहां ये मुलाक़ात धीरे-धीरे एक क्रिएटिव कम्युनिटी में बदल जाए। एक ऐसे शहर में जो खुद को एक गंभीर सिनेमा हब के रूप में स्थापित कर रहा है, ऐसे स्पेस की अपनी अहमियत है और जिसकी आज बहुत ज़रूरत भी है।

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