गुरुदत्त: बिछड़े सभी बारी-बारी…

Amitaabh Srivastava

गुरुदत्त जीवित होते तो आज 95 बरस के हो रहे होते… । सिनेमा के पर्दे पर बहुत कम समय में उन्होने जो कुछ रचा वो मील का पत्थर है- कैमरे के पीछे भी और सामने भी। गुरुदत्त के जन्म की बरसी 9 जुलाई पर उनके जीवन और काम पर एक नज़र डाल रहे हैं अमिताभ श्रीवास्तव। अमिताभ वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक, इंडिया टीवी जैसे न्यूज़ चैनलों से बतौर वरिष्ठ कार्यकारी संपादक जुड़े रहे हैं। फिल्मों के गहरे जानकार और फिल्म समीक्षक के तौर पर ख्यात हैं। न्यू डेल्ही फिल्म फाउंडेशन से बतौर अध्यक्ष जुड़े हुए हैं। 

गुरुदत्त का काम दो हिस्सों में बंटा हुआ है। एक तो वह दौर है जब गुरुदत्त कलकत्ता (अब कोलकाता ) में टेलीफोन ऑपरेटर से लेकर फिल्मों में कोरियोग्राफर का काम करने के बाद मुंबई में देव आनंद से टकराते हैं और दोनों युवा प्रतिभाओं की दोस्ती के साथ बाज़ी, जाल, बाज़,और सीआईडी जैसी हॉलीवुड स्टाइल की हलकी फुल्की शहरी थ्रिलर किस्म की मनोरंजक फिल्में पचास के दशक के हिंदी सिनेमा के इतिहास का उल्लेखनीय हिस्सा बनती हैं। इसमें आर-पार , मिस्टर एंड मिसेज़ 55 को भी जोड़ लें तो अभिनेता और निर्देशक के तौर पर उनके काम का पहला अध्याय तैयार हो जाता है। इन हल्की-फुल्की फिल्मों में गुरुदत्त की अभिनय और निर्देशकीय प्रतिभा का जो रंग मिलता है वह उनके बाद वाले बाकी काम से काफी अलग है जिसके लिए अब उनका नाम दुनिया भर के बेहतरीन फिल्मकारों में लिया जाता है।

यहाँ यह बताते चलें कि गुरुदत्त ने इसी दौर में वहीदा रहमान को दक्षिण भारत की एक तेलुगु फिल्म के ज़रिये खोजा और ‘सीआईडी‘ से उनका हिंदी फिल्मों कि पारी शुरू हुई। आज यह जानकर अजीब लग सकता है हिंदी फिल्मों से पहले वहीदा रहमान ने तेलुगु फिल्मों में मुख्यतः आइटम नंबर किये थे। गुरुदत्त ऐसी ही एक फिल्म की कामयाबी की पार्टी में उनसे मिले थे। बाद में वहीदा रहमान गुरुदत्त की तीन सबसे मशहूर फिल्मों – प्यासा, काग़ज़ के फूल और साहब बीबी और ग़ुलाम का हिस्सा रहीं। वहीदा रहमान ने हमेशा गुरुदत्त को अपना मार्गदर्शक और उस्ताद माना। हालाँकि उनसे गुरुदत्त के लगाव की कहानी फ़िल्मी दुनिया की नाकाम मोहब्बतों की सबसे चर्चित दास्तानों में गिनी जाती हैं । गुरुदत्त के निजी जीवन के अवसाद को इस मोर्चे से भी जोड़ा जाता है।

Pyasa 1957

प्यासा’ बनने से पहले दिलीप कुमार की फिल्म ‘देवदास’ आ चुकी थी और बिमल रॉय के निर्देशन में दिलीप कुमार ने शरत चंद्र के आत्म-विध्वंसी नायक को जिस तरह परदे पर जिया था, उसने त्रासदी के अभिनय के पैमाने बहुत ऊँचे तय कर दिए थे। ‘प्यासा’ की कहानी के नायक के किरदार में देवदास की बहुत साफ़ परछाइयां थीं लिहाजा गुरुदत्त दिलीप कुमार को ही ‘प्यासा’ के लिए हीरो लेना चाहते थे , बात भी हो गयी थी लेकिन फिर दिलीप कुमार के पीछे हट जाने के कारण गुरुदत्त को कैमरे के सामने भी आना पड़ा। फिर जो हुआ वह अच्छे सिनेमा का एक बहुत शानदार अध्याय है। गुरुदत्त, वहीदा रहमान , अबरार अल्वी, साहिर लुधियानवी और एस डी बर्मन ने हिंदी सिनेमा में मील का एक पत्थर रच दिया।

‘देवदास’ की त्रासदी गुरुदत्त पर इस कदर हावी थी कि ‘कागज़ के फूल’ में एक फिल्म निर्देशक के किरदार में उन्हें जो फिल्म निर्देशित करते दिखाया गया , उसका नाम ही देवदास था। फिल्म में वहीदा रहमान एक शॉट में जिस तरह पानी की गागर अपनी कमर पर टिकाये स्क्रीन पर आती हैं, वह बिमल रॉय की ‘देवदास’ की पारो सुचित्रा सेन के बिलकुल वैसे ही दृश्य की याद दिलाता है। ‘काग़ज़ के फूल’ की बॉक्स ऑफिस पर नाकामी के बाद गुरुदत्त इतने मायूस हो गए थे कि बाद में किसी फिल्म का निर्देशन नहीं किया।

Pyasa 1957

‘प्यासा’ अगर एक फिल्कार के तौर पर गुरुदत्त की सोच, प्रखरता और सामाजिक प्रतिबद्धता का शिखर है तो ‘काग़ज़ के फूल’ एक तरह से फ़िल्मी दुनिया के चाल-चलन , तौर तरीकों पर तीखी व्यंग्यात्मक टिप्पणी के साथ-साथ निजी ज़िन्दगी के उतार चढाव की भी झलक देती हुई आत्मकथात्मक फिल्म है। नकलीपन से भरी दुनियादारी से एक खामोश लेकिन तीखा परहेज़, दुनियादारी और कामयाबी के सब पैंतरे समझते हुए भी खुद को सारे तमाशे से अलग कर लेने की एक आत्मघाती किस्म की ज़िद और अवसाद प्यासा और ‘काग़ज़’ के फूल के किरदारों का ही नहीं, कहीं न कहीं उनकी निजी शख्सियत का भी हिस्सा था। यह अकारण नहीं है कि इन दोनों फिल्मों में निभाए गए गुरुदत्त के किरदारों को उनकी ज़िन्दगी और सोच का अक्स भी माना जाता है ।

शोहरत एक छलावा है, मरीचिका है । ‘कागज़ के फूल’ का गाना है-

उड़ जा उड़ जा प्यासे भँवरे
रस न मिलेगा ख़ारों में
काग़ज़ के फूल जहाँ खिलते हैं
बैठ न उन गुलज़ारों में
एक हाथ से देती है दुनिया , सौ हाथों से लेती है;
ये खेल है कब से जारी
बिछड़े सभी, बिछड़े सभी बारी-बारी

नींद की गोलियां खाकर चुपचाप इस दुनिया को अलविदा कह गए गुरुदत्त। कितनी गहरी कोई मायूसी रही होगी जिसने उन जैसे संवेदनशील इंसान का मन जीवन से इतना उचाट कर दिया होगा। नाम, पैसा, कामयाबी की जानलेवा दौड़ के मौजूदा दौर में गुरुदत्त के माध्यम से मिला फलसफा एक कड़वा सच याद दिलाता रहता है – ये दुनिया अगर मिल भी जाये तो क्या है ?

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